" ध्यान अनुभव "

 

मेरा नाम अल्का चौधरी है। मैं जिला सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) की रहने वाली हूँ। मैं चण्डीगढ़ के जी. सी. जी. कॉलेज में बी. कॉम तृतीय वर्ष की छात्रा हूँ। ‘ध्यान’ में मैं अपनी एक मित्र उमा की वजह से आई। एक बार राम राजू जी और विनय जी हमारे कॉलेज में ‘ध्यान’ सिखाने आए, उस समय उमा वहाँ उपस्थित थी। पहले उसने खुद ध्यान सीखा और फिर हमें सिखाया। उसके ध्यान के अनुभव इतने प्रेरणादायक थे कि हमें भी लगा कि ध्यान करना चाहिए। ‘ध्यान’ में आने से पूर्व मेरी जिन्दगी में बहुत सारी समस्याएं थीं। मैं साहसी थी परन्तु वो बात मुझमें नहीं थी जो होनी चाहिए थी। मैं छोटी - छोटी बातों से परेशान हो जाती थी और घबरा जाती थी। मैं अपनी परेशानी हमेशा अपने पापा से बाँटती और पापा मुझे समझा देते। लेकिन ‘ध्यान’ में आने के बाद मेरी जिन्दगी पूर्णतः बदल गयी। मुझे अपने में इतने सारे परिवर्तन नज़र आए कि मैं खुद हैरान थी। मैं हद से ज्यादा साहसी बन गई। सकारात्मक सोचना, सत्य बोलना और सबसे प्रेम पूर्ण व्यवहार करना मेरी जीवन शैली बन गई है। अब मैं वहाँ से सोचना शुरू करती हूँ जहाँ पर आम लोग सोचना बंद करते हैं आम लोगों से मेरा अभिप्राय यह है कि वे लोग जो सिर्फ उसी में विश्‍वास रखते जो दिखाई देता है। वे मुग्ध चक्षुओं के ज्ञान और आनन्द से परे हैं।

 

अब मुझे ज़िन्दगी का वास्तविक अर्थ उद्देश्य समझ आ गया है। अब सभी को यह समझाना है कि तुम ही भगवान हो, कोई दूसरा तुम्हें बचाने नहीं आएगा। मैंने पहली बार अपने कॉलेज के कॉमर्स डिपार्टमेन्ट में ‘ध्यान’ की सी. डी दिखाई और ‘ध्यान’ के बारे में काफी कुछ बताया और फिर सभी को ध्यान सिखाया। वहाँ पर लगभग 100 विद्यार्थी व कुछ एक अध्यापिकाएं उपस्थित थीं। मुझे अन्दर से बहुत अच्छा महसूस हो रहा था ऐसा लग रहा था मानो आसमान रूपी छत पर पहुँचने के लिए ध्यान रूपी सीढ़ी पर कदम रख दिए हों। दूसरी बार मैंने ‘ध्यान’ गुरुकुल में सिखाया जहाँ से मैंने बारहवीं पास की है।

 

अब मैं जैसा चाहती हूँ वैसा ही परिणाम प्राप्त हो जाता है। मैंने अर्ध्दवार्षिक परीक्षा से पहले अपने एक विषय का प्रश्‍न पत्र ‘ध्यान’ के माध्यम से देखा और अगले दिन जब मैं परीक्षा देने गयी तो मैं बहुत हैरान थी क्योंकि पूरा प्रश्‍न पत्र हूबहू वही था जो मैंने ध्यान के माध्यम से देखा था। जिस विषय का मैंने प्रश्न पत्र देखा उसके बारे में पहले से कोई ज्यादा जानकारी नहीं थी और न ही मेरे पास जानकारी प्राप्त करने का समय था, क्योंकि उस समय मेरी दिसम्बर अर्ध्दवार्षिक परीक्षा शुरू हो चुकी थी। मैंने उस विषय में सर्वाधिक 90% अंक प्राप्त किए।

 

मेरे पेट में एक बिमारी थी जिसके लिए मैंने चण्डीगढ़, सहारनपुर, यमुनानगर के कई अस्पतालों से दवाई ली परन्तु आराम नहीं मिला। लेकिन जब राम राजू जी, विनय जी ने बताया कि ध्यान के माध्यम से यह बीमारी ठीक हो सकती है, तो मैंने अपनी इस समस्या को ध्यान के माध्यम से ठीक किया।

 

एक रात मैं अपने परिवार वालों को ध्यान सिखाने के बाद खुद भी ध्यान करते - करते सो गयी। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरे शरीर से कुछ अलग हो रहा है और कुछ समय बाद मुझे मेरी आत्मा मेरे समक्ष दिखाई दी। मेरे पास ध्यान के बारे में बोलने के लिए कोई शब्द नहीं हैं। मैं सिर्फ इतना कह सकती हूँ कि ‘ध्यान’ एक खज़ाना है हम इससे जितना ज्ञान प्राप्त कर सकें उतना ही कम है। अब मैं ये समझ गयी हूँ कि हम ही भगवान हैं, हम ही शिव पुत्र हैं और हमें ही शिव बनना है। लेकिन अब ये दूसरों को समझाना है कि आज वे जो कुछ भी हैं वे खुद के कर्मों के फल की वजह से हैं उसके लिए दूसरों को दोषी ठहराना और किसी भी चीज़ के लिए दूसरों पर निर्भर रहना मूर्खता है। हम अपनी हर एक समस्या खुद सुलझा सकते हैं क्योंकि हम ही भगवान हैं। अब मैं सभी के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करती हूँ। अगर किसी को कोई परेशानी हो तो पहले ध्यान से सुनती हूँ और फिर ‘ध्यान’ के माध्यम से ठीक करने का सुझाव देती हूँ। मुझमें अजीब सी चमक आ गयी है जो दूसरों को दिखती है और वो मुझे इसके लिए बधाइयाँ भी देते हैं। मैं बहुत... खुश हूँ। मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगी

 

मनसा सततं स्मरणीयम्‌

वचसा सततं वंदनीयम्‌

लोकहितम्‌ मम्‌ करणीयम्‌

 

अल्का चौधरी

सहारनपुर (U. P.)

फोन : +91 9501457671

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