" पिरामिड़ मेरी आत्मा है "

 

मैं आलोक जैन हूँ। मेरे पिता का नाम नेमीचन्द जैन और माता का नाम विद्या जैन है। मेरा जन्म 25 सितम्बर 1963 में हुगली डिस्ट्रीकट में हुआ जो कि पश्चिम बंगाल में है। मैंने कई तरह के व्यापार किये लेकिन सबमें असफल रहा। परिणाम कई तरह की बीमारियों ने मुझे घेर लिया जैसे हाईपरटेन्शन, ब्लड प्रेशर, बोन टीवी इत्यादि। मैं अपनी जिन्दगी से परेशान हो गया था पर बोझे की तरह जीये जा रहा था। मेरी जिन्दगी अक्टूबर 2010 में दिवाली के बाद और ज्यादा मुश्किल तथा नरक दायक बन गई जब मैंने अपनी आँखें खो दी। दुनिया जो रंगीन थी। अंधेरी हो गई। कोई रंग नहीं कोई सम्पर्क नहीं। दुनिया खत्म सी हो गई। कई डाक्टर को दिखाया कई टेस्टिंग भी करवाई पर कुछ सुधार नहीं हुआ। सारे डाक्टरों के पास एक ही जवाब था कि उनके पास मेरी बीमारी का कोई इलाज नहीं। सभी डाक्टरों ने मुझे हाथ जोड़कर कहा कि Wait & Watch!! उन्हें शक था कि मैं ठीक हो पाऊँगा या नहीं। बीस दिसम्बर 2010 को मैं भुवनेश्वर गया वहाँ मेरा L.V.Prasad Hospital में Dr. J. P. Das के साथ appointment था। मैं जहाँ ठहरा वहाँ पर मनीष टोंक के साथ मेरी लम्बी बात हुई। उन्होंने मुझे आनापानसति ध्यान के बारे में समझाया और यह विश्वास दिलाया कि इससे मेरी आँखों ठीक हो जायेगी। सच बोलू दोस्तों मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ जहाँ इतने डॉक्टरों ने मना कर दिया वहाँ सिर्फ ध्यान क्या करेगा। जब मैं डॉक्टर से फिर मिला और मुझे वही जवाब मिला। पहली बार ध्यान किया और बहुत अच्छा लगा। मुझे इतना अच्छा लगा कि मैंने वहीं निर्णय कर लिया कि कलकत्ते में भी पिरामिड बनाऊँगा। मैंने आध्यात्मिक दुनिया में कदम रख लिया था तथा मुझे महसूस हुआ कि इसको फैलाना ही होगा। 

 

28 मार्च 2011 का होली थी उसी दिन मेरे पिरामिड को भी रंग लगाया गया, मैं बहुत खुश था पिरामिड हमारे घर का एक सदस्य बन गया था। पिरामिड में से बहुत ऊर्जा निकलनी शुरू हो गई। मैंने कॉलोनी के लोगों को, दोस्तों को तथा सगे-सम्बन्धियों को भी ध्यान सिखाने में कामयाब हुआ। 

 

मैं फिर से देखने लग गया मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा मैंने फिर से अपना व्यापार चालू किया मैं अभी कपड़ा का व्यापारी हूँ। अब गाड़ी भी चला लेता हूँ। ध्यान को धन्यवाद। 

 

28 मार्च पिरामिड का रंग होने के बाद मैंने पिरामिड में बैठकर प्रार्थना की कि इसे पूरा करने में मुझे शक्ति दो और सारी व्यवस्था भी मुझे ही करानी है आखिरकार 7 फरवरी 2012 को पूर्णिमा के दिन पिरामिड का उद्‌घाटन हुआ। 

 

पिरामिड में काफी संख्या में लोग आ रहे है मुझे बहुत खुशी मिलती है। यह पिरामिड सिर्फ पिरामिड नहीं है यह मेरी आत्मा है। इसी में पुरा ब्रह्माण्ड समाया हुआ है। यह मेरे दिल के हर कोने में बसा हो यहा ऊर्जा से भरा हुआ है तथा यह अपने आकार से बीस गुना ज्यादा ऊर्जा फैलाता है जो भी इस पिरामिड में बैठता है मुझे लगता है की वह मेरी आत्मा के अन्दर बैठा है। सभी से मेरा तहे दिल से निवेदन है आप सब इस पिरामिड में आये तथा इस पिरामिड का लाभ उठायें। इसका मैंने नाम दिया है "दिव्य शक्ति पिरामिड ध्यान केन्द्र" जो भी इस पिरामिड में आना चाहे तो वो आ सकते हैं। 

 

                                                         आलोक जैन
हुगली, बंगाल

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