" मेरे जीवन की यात्रा - मंत्र जाप से ध्यान तक "

 

 

मैं अर्जुन कम्बोज हूँ। शैक्षिक दृष्टि से M.Com., M.Phil., M.A. (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) की डिग्रियाँ हासिल की हैं। मैंने मानव संसाधन विकास में विशेष योग्यता सहित एम.बी.ए. भी किया है और कॉमर्स के क्षेत्र में काम करने का मु्झे लगभग पच्चीस वर्ष का आनुभव है जहाँ मैने  सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं के Industrial Training तथा vocational welfare training activities में अलग अलग पदों पर काम किया है। इस समय मैं मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रायोजित जन शिक्षण संस्थान का डायरेक्टर हूँ और चण्डीगढ में काम कर रहा हूँ।

 

1983 से पूर्व मैं एक मांसाहारी व्यक्ति था। 25 दिसम्बर 1983 को मेरे मामा जी श्री ओम प्रकाश शर्मा, जो गुड़गाँव वाले गुरु जी के अनुयायी थे, हमारे घर आए। उन्होंने मुझसे मांसाहार त्याग कर शाकाहारी बन जाने को कहा। उन्होंने मुझसे यह भी कहा कि मैं इस दुनिय़ा में केवल जानवरों का मांस खाने के लिए और इस तरह अपने शरीर को एक कब्रगाह बनाने के लिए नहीं आया हूँ। मुझ पर उनके कथन का गहरा असर हुआ और मैंने यह प्रण किया कि आज ही से मैं मांस भक्षण छोड़ दूँगा। उन्होंने मुझे गले लगाया और शिवरात्रि के अवसर पर गुडगाँव आने को कहा ताकि वे मुझे गुरुजी से मिलवा सकें। 1984 में मैं गुडगाँव गया और गुरुजी से पहली बार मिला। मुझे ऐसा लगा जैसे गुरुजी से मेरा पिछ्ले जन्मों से कोई नाता है ज़रुर। उन्होंने मुझसे ज़रुरतमंदों और गरीब लोगों की मदद करने को भी कहा। मैंने उनकी बात को न सिर्फ ध्यान से सुना बल्कि उसे जिन्दगी में उतारा भी और अपने शिक्षण-कार्य में लगा रहा।

 

16 जनवरी 1991 को विभा से मेरा विवाह हुआ। वह स्वयं एक नेकदिल स्त्री हैं और मुझे भी अपने कर्त्तव्यों का पालन करने में मदद करती हैं, इसी कारण मैं अपने माता-पिता, संबंधियों तथा समाज के प्रति अपने कर्त्तव्‍यों का निर्वाह कर पाता हूँ। मेरे आध्यात्मिक विकास में भी उनका बड़ा हाथ है। हमारी दो बेटियाँ हैं - बड़ी बेटी है साक्षी जो अभी ग्रेजुएशन कर रही है और छोटी है सिरतत जो अभी ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ रही है।

 

1983 से ही मैं गुरुजी के बताए सिद्धान्तों का पालन कर रहा हूँ और नित्य मंत्र जाप भी करता हूँ। गुरुजी के अन्य अनुयायियों से भी मैंने बहुत कुछ सीखा, वे सब भी मंत्र जाप हमेशा करते रहे हैं। मंत्र जाप के साथ साथ मैं हर सोमवार को व्रत भी रखता हूँ। अपने घर में बने मन्दिर में बैठकर मैं रोज़ मंत्र-जाप करता हूँ। कई बार इस दौरान मुझे अपने शरीर में एक प्रकार की तरंगों के प्रवाह की अनुभूति हुई पर मैंने इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। सोचा शायद सभी को शरीर में इस प्रकार के अनुभव होते हैं 1994 में पहली बार ऐसा हुआ कि मंत्र जाप के  दौरान मुझे लगा जैसे मेरा शरीर कमरे में घूम रहा है। अब भी मैंने इसे अनदेखा कर दिया यह सोच कर कि यह मेरा भ्रम है।

 

हमारे गुरुजी ने 1991 में समाधि ले ली थी, मैं किससे इन अनुभवों के बारे में पूछूँ, समझ नहीं आ रहा था। लगता था कुछ पूछूँगा तो लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे। बहरहाल मैंने मंत्र जाप जारी रखा। इस नित्य अभ्यास से मैंने यह ज़रूर अनुभव किया कि एक क्षण ऎसा आता है जब मन बिल्कुल शून्य हो जाता है, कोई विचार मन में नहीं रहते। उसी समय मेरे शरीर में vibrations आती है और मुझे शान्ति भी मिलती है। अब समझ आया कि मन की यही स्थिति हमें ध्यान में ले जाती है।

 

सूक्ष्म शरीर यात्राएँ तथा अन्य अनुभव

 

स्‌न 2000 से लेकर अब तक मुझे अनेक बार सूक्ष्म शरीर यात्राओं का अनुभव हो चुका है जिनमें से कुछ का विवरण मैं यहाँ अवश्य देना चाहूँगा।

 

स्‌न 2000 में ध्यानाभ्यास के दौरान मुझे पहली बार सूक्ष्म यात्रा का अनुभव हुआ और तब से मेरा जीवन ही बदल गया। कुछ  डर भी लगा। उस समय मैं मोहाली में एक किराए के मकान में रहता था। एक दिन सुबह जब मैं ध्यान में बैठा था, अचानक मेरे शरीर में बहुत सी vibrations हुई और पलभर बाद मुझे अपने माथे में तेज़ रोशनी दिखाई दी। मुझे बहुत अच्छा लगा, उस खुशी का मैं वर्णन नही कर सकता। मुझे लगा कि मेरा शरीर तेज़ी से घूम रहा है, मेरा सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर से बाहर निकल कर खिड़की के रास्ते बाहर चला गया। अब मैं आकाश में उड़ रहा था। इस यात्रा में मुझे आकाश में चन्द्रमा, सितारे, सप्तऋषि - सभी के दर्शन हुए। एक समय तो ऐसा आया जब चारों ओर केवल धुंध ही दिखाई देने लगी । मैं डर गया , कैसे मेरी आत्मा शरीर में वापिस पहुँचेगी । सोचते ही मेरी आत्मा शरीर में लौट आई । इस अनुभव के कारण मुझे खुशी भी हुई, लगा मैं बहुत भाग्यशाली हूँ । इस सूक्ष्मयात्रा के समय मैंने जो मह्सूस किया, उसे बयान करना आसान नहीं, इसे केवल वही व्यक्ति समझ सक्ता है जिसने स्वयं इसका अनुभव किया हो । एक ओर मुझे खुशी  थी तो दूसरी ओर मन में एक डर भी था । मैंने अपने इस अनुभव के बारे में अपनी पत्नी से अवश्य बात की पर उन्‍हें भी लगा यह कोई भ्रम मात्र रहा होगा । 

 

मैं इस अनुभव को फिर से पाना चाहता था पर मन में डर बैठ चुका था। एक दिन फिर वैसा ही हुआ, ध्यान के दौरान फिर कम्पन हुए और मैं शरीर से बाहर निकल कर मोहाली की सड़कों पर घूमने लगा, मुझे नीचे घर और फ्लैट दिखाई दे रहे थे, हवा मुझे छूती हुई भी महसूस हो  रही थी। कुछ देर में मैं एक हरी भरी घाटी में पहुँच गया जिसमें खूबसूरत झरने बहते दिखाई दे रहे थे। मुझे फिर से डर लगने लगा, मैं शरीर में वापिस जाना चाह रहा था। क्षण मात्र में मैं शरीर में लौट आया। आँख खुलने पर देखा मैं तो घर में ही फर्श पर बैठा था। कुछ दिन बाद मुझे फिर एक ऐसा ही अनुभव हुआ। इस बार मैंने मानसरोवर देखा और एक प्राचीन हनुमान मन्दिर के दर्शन किए। मैंने देखा बहुत से साधु और तपस्वी एक बड़ी सी नदी के किनारे बैठे ध्यान कर रहे हैं।

 

मैंने अब ऐसा निश्‍चय किया कि मुझे सूक्ष्म यात्रा पर नहीं जाना है, सिर्फ़ मंत्र जाप ही करते रहना है। अब मैं दिन में कई बार मंत्र जाप करने लगा। जब शरीर में कम्पन होने लगता मैं आँखें खोल लेता ताकि सूक्ष्म यात्रा पर न जा पाऊँ। कुछ महीने बाद मन में आया कि अब कुछ डरने जैसा नहीं होगा, मैं मंत्र जाप द्वारा सूक्ष्म यात्रा में अपनी गति को नियन्त्रित करके रखूँगा।मैंने कई बार इसका अभ्यास भी किया। एक बार इसी प्रकार सूक्ष्म यात्रा करते हुए मुझे पानी का तालाब नज़र आया जिसके चारों ओर हरे रंग की कुटियाएँ बनी हुई थीं जैसा हमें अक्सर सूफी संतों की मज़ारों के आसपास नज़र आता है। तालाब के बीचों बीच मैंने एक शिवलिंग देखा जहाँ लोग जल भी चढ़ा रहे थे। मैंने भी उस शिवलिंग पर चल चढ़ाया। अब मुझे वापिस जाने की चिन्ता होने लगी। मैंने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए और उड़ने लगा। मेरी गति बहुत तेज़ थी और अब तो मैंने एक नई चीज़ भी सीख ली थी। पहले मैं दिशा नहीं बदल पा रहा था पर अब जब मैंने अपने हाथ बाँई ओर घुमाए तो मेरी दिशा भी बदल गई। जब मैंने हाथ दाहिनी ओर घुमाए तो मैं भी दाहिनी ओर जाने लगा। इसी तरह मैं खुद को ऊपर नीचे भी ले जा पा रहा था।

 

अब काफी समय हो गया था सूक्ष्म यात्रा करते हुए। मुझे भी अच्छा अनुभव हो चुका था पर फिर भी इस बात का भय बना रहता था कि मैं शरीर में सुरक्षित वापिस जा पाऊँगा या नहीं। मैंने फिर सूक्ष्म यात्राएँ करना बन्द कर दिया पर मेरा नित्य मंत्र जाप का अभ्यास चलता रहा और मैं भगवान शिव की पूजा भी करता रहा।अब ध्यानावस्था में मुझे लगने लगा जैसे सिर की ओर से कुछ मेरे शरीर में प्रवेश कर जाता था। मुझे अभी तक इस प्रश्‍न का उत्तर नहीं मिला था और मैं उस दिन की इन्तज़ार में था जब मुझे वह उत्तर मिलेगा।     

 

जीवन में दूसरा मोड़ 

 

फरवरी 2011 को मेरे एक मित्र श्री भूपेन्द्र जैन पिरामिड मास्टर श्रीमती शंपा जी के साथ मेरे ऑफ़िस में आए। उन्होंने शंपा जी से मेरा परिचय कराया और बताया कि वे जन शिक्षण संस्थान में ध्यान अभ्यास की कक्षाएँ लेना चाहती हैं। मैंने अगले दिन अपने ऑफ़िस में कक्षा लगाने का समय नियत कर किया। तब मेरा श्रीमती शंपा से वार्तालाप हुआ। उन्होंने ध्यान की प्रक्रिया के बारे में बहुत कुछ समझाया। उन्होंने यह भी बताया कि ध्यान करने पर शुरु में सात प्रकार के विभिन्न अनुभव होते हैं। एक एक करके जब उन्होंने इनके बारे में चर्चा की तो मैं मन ही मन उन अनुभवों के बारे में सोचने लगा जो मुझे मंत्र जाप के दौरान होते हैं। मैंने उन्हें अपने अनुभव सुनाए। उन्होंने मेरी कई भ्रान्तियाँ दूर कीं और स्पष्ट किया कि ध्यान के दौरान हमें कोई हानि नहीं पहुँचा सकता और मुझे निर्भय होकर अ६य़ात्म के रास्ता पर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने मुझे आनापानसति ध्यान की विधि बताई और तब से मैं उसी का अनुपालन कर रहा हूँ।

 

अगले दिन श्रीमती शंपा ने मेरे आफ़िस के प्रांगण में ध्यान की क्लास ली। हमारे चेयरमैन श्री आर.के. शर्मा भी वहाँ उपस्थित थे। कक्षा के बाद उन्होंने विद्यार्थियों से अपने अपने अनुभव बाँटने को कहा। कुछ बच्चों ने हरी वादियाँ देखीं, कुछ ने पर्वत देखे और किसी ने पेड़ पौधे या नदी-तालाब देखे। उस दिन मैंने पहली बार सबके सामने अपने अनुभव सुनाए। तभी से हमारे विभिन्न संस्थानों में ध्यान कक्षाएँ नियमित रूप से चल रही है और विद्यार्थी उनका लाभ उठा रहे हैं। पिरामिड मास्टर संजू तथा अनूप सभी केन्द्रों में जाकर ऎसी कक्षाएँ लगाने के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं। अब तो हमारे शिक्षक भी मास्टर बन गए हैं और खुद स्वतन्त्र रूप से भी ध्यान कक्षाएँ लगाते हैं ।

 

काफी समय बाद मैंने सूक्ष्म यात्रा फिर करने का मन बनाया पर अब मेरा आत्मविश्‍वास बढ़ चुका था। इस बार मैंने खुद को समुद्र व नदियों के आसपास ध्यान मग्न बैठे देखा। पानी के प्रवाह से कठिनाई तो हो रही थी पर मैंने ध्यान जारी रखा। मैंने वर्षा में भी खुद को ध्यानमग्न बैठे देखा।

 

एक दिन मैंने ध्यान में देखा कि कई शव पानी में बहते चले जा रहे हैं। मुझे लगा कि यह मेरे लिए एक संदेश है कि मुझे मरते लोगों की जान बचानी चाहिए। मैंने तब महसूस किया जैसे किसी ने मेरे कंधों पर अपने हाथ रख दिए हों पर वह कौन था, मैं देख नहीं पाया। ये मेरे दादा जी थे जिन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और ध्यानाभ्यास जारी रखने को कहा।

 

मैं ध्यान में अपने पूर्वजन्म भी देख चुका हूँ। एक जीवन में भारतवर्ष में था और एक पायलट था। एक जीवन में मेरा नाम था बलराम। मैंने खुद को अन्य साधु संतों के साथ बैठकर एक नदी के किनारे ध्यान करते हुए भी देखा। यह दृश्य मुझे कई बार दिख चुका है। 23 आग्स्त 2011 को जब पत्रीजी मेरे घर आए तो उन्होंने भी मेरी बात की पुष्टि किया और बताया कि एक जन्म में मैं श्रीकृष्ण का बड़ा भाई बलराम था।

 

ध्यान के दौरान मुझे एक स्त्री बार बार नज़र आती है जो मुझसे अपनी बीमारी को दूर करने की विनय करती है। मैंने उससे ऐसा करने को मना किया और कहा कि वह ध्यान द्वारा खुद ही अपनी बीमारी को दूर कर सकती है। मैंने उसे ध्यान विधि समझाई और अब वह नियमित रूप से खुद ध्यान करती है।

 

अब मैं निश्शंक होकर ध्यान करता हूँ और ध्यान के बारे में और अधिक जानने की कोशिश कर रहा हूँ। पिरामिड मास्टर श्री राम राजू ने मेरे घर पर ही एक ध्यान केन्द्र बना दिया है और आसपास के लोग वहाँ आकर ध्यान करते हैं। मुझे खुद भी कई प्रकार के अनुभव हो चुके हैं और मैं हर व्यक्ति को ध्यान सिखाना चाहता हूँ।

 

चण्डीगढ़ पिरामिड स्पिरिचुअल सोसाइटी की सहायता से बहुत से युवा लोग ध्यान सीख चुके हैं। चण्डीगढ़ तथा आसपास के हमारे अलग अलग vocational training centers में लगभग पाँच सौ छात्र-छात्राएँ ध्यान करते हैं। नौ सो से अधिक बच्चे ध्यान सीख चुके हैं और आगे और लोगों को सिखाने में हमारी मदद कर रहे हैं। मैं चाहता हूँ पंजाब के सीमावर्ती इलाकों में भी ध्यान का प्रचार हो। चण्डीगढ़ स्पिरिचुअल सोसाइटी की मदद से मैं ऎसा करपाने में सफल हो सकूँगा। ऐसा मुझे यकीन है।

 

अर्जुन कम्बोज
2540,सनी एंक्लेव, देसूमाजरा, खरड़, मोहाली
फोन : +91 9888609060, E-mail : This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.

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