" अपना रूप पहचान, वहीं है तेरे भगवान ! "

 

मेरा नाम आशा गुप्ता है। दिल्ली में रहती हूँ।

 

मेरा जन्म 1962 में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुआ। सौभाग्य है कि संस्कारी परिवार मिला जहाँ भक्तिभाव, भजन, सत्संग, हवन और संतों के प्रति विशेष सम्मान हमेशा बना रहा। मेरी माँ ने माँ मदालसा की तरह हम भाई-बहनों को स्वयं के प्रति जागररूक बनाया। रोज़ ही गायत्री मंत्र का जाप कराना, संध्या होते ही घर को मंदिर रूप में बदल देना और उसमें गूँजता उनका मधुर गायन, हमें अनायास ही उस निराकार सत्ता से जोड़ देता।

 

मेरे पिता मेरे प्राणाधार थे। उनके मन में असीम कृष्ण- भक्ति और गंगा माँ के प्रति अथाह प्रेम भरा था। समर्पण का गुण मुझे उनसे विरासत में मिला- ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण तथा हर जीव के साथ प्रेम, चाहे वह कबूतर हो या बन्दर, पड़ोसी हो या फूल, जड़-चेतन सबसे प्रेम करने मैंने उनसे सीखा। हर पूर्णिमा को बैग उठाते और हरिद्वार चले जाते, उन्हें लगता गंगा मैया उन्हें बुला रही है। आश्रम बनवाना, भंडारा करवाना और मुस्कुराते हुए सबको भोजन कराना उन्हें बहुत प्रिय था।

 

बाल्याकाल से ही मैं गार्गी, मैत्रेयी, महात्मा बुध्द, श्रीराम तथा श्रीकृष्ण के बारे में सुना करती थी। जब माँ महात्मा बुध्द की कथा सुनाती तो मैं कहती, ’माँ, मैं भी उनके साथ थी। उन्हें आसपास कई बार देखा भी है।’ एक बात और मैं उनसे पूछ्ती थी कि क्या उस युग जैसी ब्रह्म-विद्या या ब्रह्म-गोष्ठी इस युग में नहीं हो सकती? माँ के पास इस बालपन में मेरे मन में उठे सवाल का जवाब नहीं था। हमेशा की तरह गायत्री मंत्र का पाठ मेरे घर में चलता रहा, संध्या तथा नित्य हवन का नियम भी अटूट रहा।

 

1980 में ब्रेन ट्यूमर से छोटे भाई की जीवन लीला समाप्त हो गई। वैराग्य का भाव मन में पैदा हो गया। मन में प्रश्नों की झड़ी लग गई – जीवन क्या है? क्या मृत्यु के बाद भी जीवन है? अगर जगत मिथ्या है, सब कुछ नश्वर है तो फिर सत्य क्या है? जीवन बेरंग हो गया। सफेद वस्त्र धारण कर लिए, सखी-सहेली, मनोरंजन न जाने कहाँ छूट गया। पूरी पूरी रात छ्त पर तारों के साथ बिताना – यही जीवन रह गया ।

 

अब जीवन में स्वाध्याय का आगमन हुआ – स्वामी रामसुखदास जी, स्वेट माडेंन, बुल्लेशाह, गुरुनानक, स्वामी दयानन्द, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, चतुर्वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, अष्टावक्रगीता का बार बार अध्ययन किया। अभी मैं पढ़ाई ही कर रही थ। बी.ए. करने के बाद टेक्सटाइल डिज़ाइनिंग का कोर्स कर रही थी जब पिता जी को मेरी शादी की चिन्ता सताने लगी। मैं अभी शादी नहीं करना चाहती थी पर उनका तर्क था कि छोटी बहनों की भी तो शादी करनी है और मेरी एक संभ्रांत परिवार में शादी कर दी गई।

 

मेरे पति श्री अरूण गुप्ता शुध्द अंत:करण वाले व्यक्ति हैं। मेरे पिता उन्हीं दिनों अनेक बीमारियों से ग्रस्त हो गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। मैं रोज़ वहाँ जाती, उनकी हालत देखकर लगता कि बच पाना मुश्किल है। पिता को मैं बेटी होकर समझाया करती कि शरीर का छूट जाना कोई बहुत अजीब बात नहीं है। यह शरीर छूटेगा तो खूबसूरत सा नया शरीर मिलेगा, यह शरीर तो वस्त्र-समान है, बदला ही जाएगा। नया जीवन मिलेगा, नए काम होंगे इसलिए मृत्यु से भयभीत होने का कोई कारण नहीं है। उनकी जीवन्मुक्ति हो गई। स्वयं उन्होंने आकर मुझे यह बात बताई, वे अब प्रसन्न थे।

 

पिता की मृत्यु के बारे में जब मैं सोचती थी तो मुझे लगता था कि मैं जी नहीं पाऊँगी पर जब यह वास्तव में हुआ तो मैं एक आँसू भी नहीं बहा पाई क्योंकि मुझे लगा कि वे किसी अन्य रूप में मुझे फिर से मिलेंगे। मृत्यु के उपरान्त मुझे बहुत से अनुभव हुए जिन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया। लखनऊ से प्रमिला जी, जिन्हें प्रमिला भगवान के रूप में जाना जाता था, मेरे जीवन में गुरू रूप में आईं। उन्होंने मेरे जीवन में एक मित्र के रुप में प्रवेश किया और मुझे उनमें बार बार नारायण की छवि दिखाई देने लगी। गुरु शिष्य का नाता बना, ज्ञान मार्ग मेरे सामने खुल गया। मैं सोचती थी - श्रद्धा की कलियाँ चुन चुन कर सुन्दर हार बनाऊँ, निज की सारी भक्ति संजोकर गुरु चरणों में चढाऊँ।

 

मेरे गुरु ने भी मुझ अपात्र को अपनी कृपा का पात्र बनाया, सब विषय विकारों से ऊपर उठाया। दो मंत्र दिए- मुस्कुराते रहो और हमेशा कृतज्ञ रहो। श्वासों की माला के साथ ’सिमरन’ करना भी सिखाया। गुरु ने मुझ जीव का ब्रह्म से मेल करा ही दिया। मैं पहले भी सत्संग में जाया करती थी, फिर से जाने लगी। जीवन में कोई कामना शेष नहीं थी। मैं सोलह सालों से दादा भगवान के सत्संग से जुड़ी हूँ। सबको साथ ले जाने लगी, यही मेरा शौक हो गया। जीवन में सेवा, सुमिरन और सत्संग ही खून के साथ बहने लगे। पुरा जीवन दिव्य हो गया। बस जीवन-मुक्ति का आनन्द मिलने लगा। लगता- मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सब तेरा। तभी 7 अक्तूबर 2008 को सत्संग में मुझे आवाज़ आई कि बस यहाँ का कार्य पूरा हो गया, अब उठो। उसी दिन मुंबई में भगवान दादा, जो ’तुलसी माता’ के नाम से जाने जाते थे, शान्त हो गए, ज्योति जोत समा गए।

 

समझ नहीं आ रहा था, क्या करुँ, कहाँ जाऊँ लेकिर अंदर की आवाज़ सुनी। सारा समय प्रकृति की गोद में बिताने लगी। आवाज़ आई- तुम्हें कहीं नहीं जाना है, जिसे तुमसे कुछ चाहिए वह स्वयं आएगा। तभी जीवन में ’ओशो’ आए। लगा बस यही हैं जो सबसे करीब हैं। रात-दिन ओशो की कैसेट्स, म्युज़िक और किताबें। साथ-साथ सत्संग और स्वाध्याय चलता रहा।

 

19 दिसम्बर, 2008 कुछ योगियों के बीच चर्चा हो रही थी। अचानक कुछ ऐसा घटित हो गया कि भीतर करोड़ों सूर्यों का प्रकाश भर गया और मैं खिलखिलाते हुए हँसने लगी और हँसती चली गई। सबने कहा यह तो enlighten हो गई। दो-तीन शरीर भारी रहा और फिर तो प्रकृति के साथ ऐसी एकरूप हुई कि बस जन्म दिव्य और कर्म भी दिव्य। बस केवल गुरु वचनों को सुनना और सुनना ही काम रह गया। गृहस्थ तो जैसे शून्य ही हो गया। 13 जून 2009 को शिरडी में साई बाबा ने साक्षात दर्शन देकर आशीर्वाद दिया।

 

19 नवम्बर 2009 को गृहस्थ जीवन के पच्चीस साल पूरे हुए। लगा, अब हर पल सर्वहित ही है। जल्दी ही यह पता चला कि मुझे कुछ ऐसी शारीरिक तकलीफ हो गई है कि जीवन रहेगा कि नहीं, कह नहीं सकते। मैं मन ही मन प्रभु से प्रार्थना करने लगी कि हे शक्ति! अगर इस शरीर से कुछ काम लेना है तो इसे रख लो वर्ना ले लो। गुरुकुल के आचार्य जी ने कहा कि 125 शिष्यों के साथ हम मंत्र-जाप करेंगे इस दिव्य आत्मा को बचाने के लिए और मुझे जीवन मिला। ऑपरेशन सफल रहा। अब तो मैंने स्पष्ट कह दिया जो जीवन अब मिला है, यह सब ईश्वर के नाम ही है। फिर सत्संग शुरू हुआ पर अब एकान्त व मौन जीवन में आ गए थे, आँख खुलती ही नहीं थी। मन में बार बार यह बात आती, ’हे प्रभु, आपने अपना काम पूरा कर दिया, जीव का ब्रह्म से मेल करा दिया।’ अब ध्यान मेडिटेशन की तरफ खिंचने लगा।


गुरु पूर्णिमा से मेरे गुरु जी ने मौन धारण कर लिया। मैं नहीं जानती थी मेडिटेशन क्या होता है पर हर समय मन में उसी का ध्यान आने लगा। गुरु जी ने खुली आँखों से समाधि में बैठना सिखाया था। ओशो की ’ध्यान योग’ पुस्तक खोल कर ध्यान की विविध विधियों को पढ़ा और अभ्यास भी करके देखने लगी। अचानक श्वासों का आना-जाना देखने लगी। अच्छा लगा। अन्दर से आवाज आई बस यही विधि मेरे लिए उपयुक्त है। अगली पंक्ति में लिखा था, ’यह ध्यान महात्मा बुद्ध किया करते थे।’ बस मैं खो गई उनके नाम में।

 

21 अगस्त  2010 को मेरे छोटी बहन कविता गुप्ता भुवनेश्वार से दिल्ली आई। कहने लगी कि उसने ब्रह्मर्षि सुभाष पत्री जी को अपने जीवन में विचित्र ढंग से आते देखा है और अगले ही दिन वे दिल्ली आ रहे हैं, दोनों ध्यान सभा में जाएँगे। हम दोनों 22 अगस्त शाम के समय शास्त्री जी के मेडिटेशन सेंटर में गए और उसी रात मेरे गुरू जी ने अपना शरीर छोड़ दिया। एक तरफ मैं केक काट रही थी, उधर गुरू जी की अंतिम लीला चल रही थी। यह आना और जाना एक नाटक की तरह लगा। अगली सुबह मैं प्लेन से लखनऊ जा रही थी। आकाशवाणी हुई- ’मुझे कौन लेने को तैयार है?’ मैंने आसपास और लोगों से पूछा कि कुछ ऐसा सुनाई दे रहा है क्या? पर किसी की कुछ नहीं सुनाई दिया। मैंने हाथ ऊपर कर दिए, शक्ति शक्ति से मिल गई, एक अपार शान्ति प्राप्त हुई।

 

लखनऊ से लौटकर नित्य मेडिटेशन सेंटर जाना शुरू हो गया। सत्संग, स्वाध्याय,गीता-पाठ और संध्या मेडिटेशन। एक दिन वसंता जी ने मेडिटेशन के बाद ग्लोबल काग्रेस 2010 की सूचना वाला पेम्फ़्लेट मुझे दिखाया। पिरामिड की तस्वीर देखी, लगा मुझे बुला रहा है। मुझे तो जाने की रट लगा गई। कुछ लोगों ने मिलकर जाने का प्रोग्राम बना लिया। मुझे भी अन्दर से यह लग रहा था कि अब इस सीमित दायर से निकलकर oneness में जाना है।

 

मेडिटेशन के दौरान मुझे बहुत से अनुभव होने लगे। मुझे पूर्णिमा की रात्रि को पहले अपने गुरू जी, फिर विष्णु भगवान के दर्शन हुए। एक रोज़ तो ईजिप्ट में पिरामिड मास्टर्स के साथ पत्रीजी मुझे ध्यान करते दिखाई दिए। इन सब अनुभवों के साथ हम लोग पिरामिड वैली पहुँच गए। हर व्यक्ति, हर मार्ग, महात्मा बुध्द, पत्रीजी - सभी कुछ चिरपरिचित लगे। यह तो धरती, आकाश, ब्रह्माण्ड, उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम का अपूर्व मिलना था। मिलाने वाले थे ब्रह्मर्षि सुभाष पत्री जी। मेरा कोटि-कोटि वंदन स्वीकार करें।

 

1 अक्तूबर, 2010 को प्रात:काल एक अविस्मरणीय अनुभव हुआ। युँ तो मेडिटेशन के दौरान पत्री जी की बाँसुरी के साथ साथ शक्ति स्वयं कमलों के ऊपर नाचती है पर उस दिन तो दिखा कि एक नीलों रंग का कमल का फूल है जो निरन्तर बड़ा होता चला जा रहा है। उसका नीला प्रकाश चारों ओर फैलता जा रहा है और समस्त विश्व को उसने घेर लिया है। ऊपर एक प्रकाश प्रवाहित हो रहा है, मैंने नीचे देखा तो पाँव तो जमीन पर थे पर देखा कि समस्त विश्व उस आलोक से ही आलोकित हो रहा है।

 

मैंने पत्रीजी को अपना अनुभव सुनाया। बोले तेरा काम तो हो गया, सहस्रार खुल गया है, खुशी मनाओ। बस, वह पूरा दिन हँसते, खिलखिलाते, जश्न मनाते बीत गया। पता चला कि हम सब लोग बुध्द के समय भी एक साथ थे, बस यह पिरामिड ही नया है। सारी टीम फिर से एक साथ थी। मेडिटेशन में विचित्र अनुभव हो रहे थे। 2 अक्टूबर को गिरिजा मैडम से भेंट हुई, तय हुआ कि अगला दिन साथ बिताएँगे। 3 अक्टूबर को प्रात: जब मेडिटेशन में बैठी तो दिखा कि हज़ारों लोग इस पार से उस पार सुरंग के रास्ते प्रकाश की ओर जा रहे है पानी में सैंकड़ों छोटे छोटे गुलाबी कमल के फूल खिले हैं और असंख्य ऐसे फूल हैं। तितलियाँ उड़ रही हैं गिरिजा मैडम ने सुना तो बहुत खुश हुई, बोलीं अब तुम्हारा पुनर्जन्म नहीं हैं। हम लोग एक साथ समय बिताना चाहते थे लेकिन पाँच वषार्य आकाश जाने नहीं दे रहा था। हम वहीं बैठ गए, गिरिजा मैडम की कहानी भी मेरी कहानी से मिलती थी। हम पिरामिड के नीचे सीढ़ियों पर बैठ थे। अचानक अकाश ने बताया कि वह भी पहले बुध्द के साथ ध्यान किया करता था। मैं बोली, ’मैं भी तो वहीं थी।’ उसने ध्यान पूर्वक मुझे देखा ओर कहा, ’हाँ. आप भी वहीं थीं। अचानक उसने हमारा हाथ पकड़ा और ऊपर बने सुनहारे बुध्द के पास ले गया। उन पर चढ़ गया और गाल पर प्यार किया। गिरिजा मैडम बोलीं - ’तुम मेडिटेटर हो।’ वह बोला, ’मैं बुध्द हूँ।’ हमें हाथ पकड़ कर खींचता हुआ पिरामिड में ले गया और बोला,’ध्यान करो।’ वह भी खुश था,हम भी।


उस रात को जसमुहीन, गरीक, बारबरा जैसे महान मास्टर्स के साथ एंजिल मेडीटेशन में ढेरों अनुभव हुए। 4 अक्तूबर को पत्री जी ने मुझे स्टेज पर बुलाकर अपने अनुभव बाँटने को कहा। चलने से पहले यह भी बताया कि सीखने का सबसे अच्छा तरीका है - शाकाहार लेना तथा ग्रुप में सबको ध्यान करना और सिखाना। लगता है अब सारा जीवन पत्री जी के साथ सोसाईटी के काम में ही बीतेगा। हर रोज़ नए लोगों को लेकर सेंटर जा रही हूँ। अपने आसपास नए सेंटर खोल रहे हैं। पत्री जी की इस यात्रा में दो नए सेंटर और खुल गए हैं। पूरी दिल्ली में पिरामिड लगाने हैं| मेरा सपना Co-creating Paradise on Earth सच हो रहा है।

पत्री जी ने जीवन में आकर जीवन को ही बदल डाला है। बहुत कुछ हो रहा है पर वास्तव में...

 

ये तेरा नूर है जो पड़ रहा चेहरे पर
वरना कौन पूछ्ता हमें अँधेरे में।
  ब्रह्मर्षि पत्री जी को कोटि-कोटि नमन।

 

आशागुप्ता
दिल्ली

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