" ध्यान अनुभव "

 

मेरा नाम बुध्दिमती है। मैं हैदराबाद में रहती हूँ। मुझे ध्यान में आए पाँच महीने हुए हैं। मैं दिन में दो बार ध्यान में बैठती हूँ - प्रातः साढ़े चार बजे से छः बजे तक और रात को दस बजे से साढ़े ग्यारह तक।

 

एक बार ऐसा हुआ कि दो दिन से ध्यान में स्थिरता नहीं आ पा रही थी। बहुत प्रयत्न करने पर भी मैं नहीं समझ पाई कि कारण क्या है। अगले दिन जब ध्यान में बैठ रही थी, रात के साढ़े दस के करीब बजे थे, मैंने पत्रीजी से बहुत प्रार्थना की कि - " पत्री सर, मुझे गहरा ध्यान दीजिए, कृपया स्थिर ध्यान दीजिए। " ऐसी प्रार्थना कर ध्यान में बैठी। लगभग आधे घंटे के बाद मैंने अपने चारों ओर कदमों की आहट को महसूस किया। थोड़ी देर ऐसे ही मैं आनन्द लेती रही। बाद में मुझे लगा कि शायद मेरे पति उठकर आए हों। मैंने झट आँखें खोलकर देखा, कोई नहीं था। मेरे पति अपने कमरे में गहरी नींद में सो रहे थे। तब मुझे आभास हुआ कि - " प्रार्थना करते ही पत्रीजी आ गये। " उसके बाद मुझे कभी ध्यान में कोई कठिनाई नहीं हुई।

 

जब से ऐसा अनुभव हुआ, तब से मैं हर विषय में, हर समस्या में पत्रीजी से प्रर्थना करती रहती हूँ।

 

एक बार मैं ध्यान में थी कि अचानक मुझे कोई बात याद आ गई और मैं उसी सोच में रह गई थी। तभी मेरे गले से पत्रीजी की आवाज़ में ज़ोर से स्वर फूट पड़े कि - " कर ना! कर! " अर्थात्‌ ध्यान करने के लिए आदेश दे रहे थे। मैं चौंक गई। क्योंकि न मैंने मुँह खोला, न ही मेरी आवाज़ पुरुषों जैसी है। मेरे ओंठ तक नहीं हिले थे। मुझे इतना आश्‍चर्य हुआ कि मेरे गले से पत्रीजी की आवाज़ कैसे आई। आज तक मैं इस बात को समझ नहीं पाई।

 

मैं कुछ तेलुगु कहानियों को हिन्दी में अनुवादित करना चाहती थी। काफी दिनों से मैंने लिखने का कोई काम नहीं किया था। अतः अनुवाद करने के पहले मैं पत्रीजी से प्रार्थना करने लगी कि - " मैंने बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा। अभी मैं अनुवाद करना चाहती हूँ। मुझे शक्ति एवं धीरज प्रदान कीजिए। " ऐसा कह मैं ध्यान में बैठ गई। थोड़ी देर बाद ध्यान में मैंने देखा कि पालथी मारकर बैठी हुई मैं अर्थात्‌ मेरा सूक्ष्म शरीर कहीं जा रहा है। मैं सोचने लगी कि यह कहाँ जा रहा है। फिर मैंने देखा - आगे पत्रीजी दोनों हाथों को, पीछे को हाथ में हाथ धरे खड़े हैं और मेरा सूक्ष्म शरीर सीधा उनके पेट में चला गया। मैं अचम्भे में आ गई। कुछ समझ नहीं पाई। बहुत देर बैठी रही। ध्यान से उठने के बाद मुझे लगा कि पत्रीजी ने मुझे इस तरह शक्ति और धीरज प्रदान किया।

 

मुझे ऐसे आभास हुआ कि सदा उनकी कृपा दृष्टि मुझ पर है।

 

पत्रीजी को सदा स्मरण करती रहती हूँ। उन पर अटूट विश्‍वास रखती हूँ।

 

उनके स्मरण से हि मेरे अनेक प्रतिकूल कार्य भी अनुकूल हुए हैं। उनकी करुणा और प्रेम की बौछार में मैं आनन्द विभोर हो जाती हूँ।

 

 

M. बुध्दिमती

हैदराबाद

फोन : +91 8008063363

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