" महात्मा गांधी.... उस पार से "

 

 

मैं गिरिजा हूँ।

 

श्री एस. के. राजन मेरे पति हैं। हमारी दो बेटियाँ हैं... जयश्री और पूर्णिमा। दोनों बेटियाँ विवाहित हैं।

 

ध्यान में विधिवत्‌ आने से पहले एक साधारण व्यक्ति के रूप में मैं भी ध्यान के बारे में केवल यही जानती थी कि इसका मतलब है मन को विचार शून्य बनाना।

 

जब मैंने पिरामिड स्पिरिचुअल सोसाइटी के बारे में जाना, तब अभी मैं मैसूर में ही थी। उसके बाद महान आध्यात्मिक गुरु पत्रीजी से परिचय होने के बाद मेरा क्षितिज भी विस्तृत हुआ और मुझे पता लगा कि ध्यान द्वारा हम क्या कुछ पा सकते हैं।

 

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पाँच जुलाई 1998 के उस स्वर्णिम दिवस पर मुझे पहली बार ध्यान में कुछ अनुभव हुआ। यद्यपि मेरी आँखें बन्द थीं और मैं पूरी तरह सजग थी, मैंने हिमाच्छादित हिमालय पर्वत की चोटियों की पूरी शृंखला को साफ़ साफ़ देखा।

 

इस अनुभव से मुझे जो खुशी मिली उसके कारण मेरे मन में यह संकल्प और भी दृढ़ हो गया कि मुझे ध्यान की इस विधि का पालन नियमित रूप से करना है।

 

मैंने यह जान लिया था कि जीवन केवल दुनिया में आकर समय बिताने और फिर यहाँ से अनन्त में कहीं खो जाने का नाम नहीं है, इससे कहीं अधिक कुछ और है। ध्यान का लगातार अभ्यास करते रहने के परिणामस्वरूप मुझे कुछ और परिवर्तन भी नज़र आने लगे, कभी तो मैं शाब्दिक संदेशों को प्राप्त करती, कभी पूर्वजन्मों को देखती और कभी किसी बड़े मास्टर के विचारों को दुनिया तक पहुँचाने का माध्यम बनती।

 

15 अगस्त 2000 का दिन था। मैं कावेरी नदी के किनारे बैठी ध्यान कर रही थी। मेरे सामने महात्मा गांधी का एक बुत था, मैंने देखा कि धीरे - धीरे वह बुत एक जीते जागते हाड़मांस के व्यक्ति के रूप में बदल गया।

उसने मुझे बताया कि वह अब तक इस बात की प्रतीक्षा में था कि उसे पर्याप्त ऊर्जा मिल जाए और वह मेरे सामने उपस्थित हो सके। उसने मुझे एक अंतरिक्षयान में बैठाया, जहाँ से मैं अपने ध्यानमग्न शरीर को देख पा रही थी। वह मुझे ‘उस पार’ कई स्थलों पर ले गया। मैंने नेहरू परिवार तथा स्वतन्त्रता संग्राम काल के अन्य अनेक नेताओं को बड़े - बड़े खूबसूरत महलों में आनन्दपूर्वक रहते देखा। उसके बाद हम एक दिव्य नदी के तट पर बने गांधी जी के आश्रम में गए।

 

वह छोटा सा आश्रम बेहद साफ़ सुथरा था और साबरमती आश्रम जैसा ही था जैसाकि पृथ्वी पर हम देखते हैं।

 

गांधी जी वहाँ भी बड़े कामों में लगे थे और आत्मिक विकास कर रहे थे। वह मुझे एक अन्य लोक में भी ले गया जहाँ आत्माओं को अपने अपने कर्मों के हिसाब से कई कष्ट झेलने पड़ते हैं।

 

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सूर्यास्त होने पर हमने नदी में स्नान किया और हम सब ध्यान में बैठ गए। इस दौरान मेरे सामने महात्मा गांधी उपस्थित हो गए और उन्होंने मेरा स्वागत किया। वे मुझे वैकुण्ठ ले गए और वहाँ अन्य मास्टर्स से मेरा परिचय कराया।2001 में 10 मार्च को पूर्णिमा थी और मैं बहुत से पिरामिड सोसाइटी मास्टर्स तथा ध्यानियों के साथ पूर्ण रात्रि ध्यान के लिए कावेरी के किनारे पर गई थी।

 

उन्होंने पूछा कि क्या मैं उनसे कुछ पूछना चाहती हूँ ? मैंने तो अनेक प्रश्‍न पूछ डाले। वहाँ और कोई नहीं था, उन्होंने मेरे सभी सवालों के जवाब दिए और मेरे मन में सालों से घूमती कई शंकाओं का समाधान हो गया।

 

ये प्रश्‍न आज़ादी की लड़ाई, देश के विकास में नागरिकों की भूमिका, निजी स्वतन्त्रता आदि विषयों से जुड़े थे। एकाएके उन्होंने कहा कि वे मानवता के लिए कुछ संदेश देना चाहते हैं ताकि सबकी आध्यात्मिक प्रगति हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि वे अगले बयालीस दिनों में ये संदेश मुझे देंगे ताकि मैं मानवता तक उन्हें पहुँचा सकूँ।

 

अगले दिन मैं मैसूर में अपने घर पर ध्यान में बैठी। सूर्यास्त का समय था और मैं संदेश ग्रहण करने के लिए तैयार थी और यह लो - महात्मा तो मेरे सामने जीते जागते उपस्थित हो गए।

 

मैं महात्मा गांधी के संदेशों की संवाहिका बनी। उन्होंने जो सन्देश दिए वे मानव मात्र के लिए तब भी प्रासंगिक थे और आज भी हैं।

 

मेरी बेटी पूर्णिमा लिखती जा रही थी जो कुछ मैं बोल रही थी। न तो मैं तन्मयता की अवस्था में थी और न मेरा उन शब्दों पर कोई नियन्त्रण था। मेरे मुँह से ज्ञान के मोती झर रहे थे पर मुझे कुछ पता नहीं था, मैं तो सिर्फ़ ध्यान में बैठी थी। ऐसा लग रहा था जैसे मैं कोई श्रुतलेख लिखवा रही हूँ, महात्मा गांधी ही वह गाइड हैं जो मेरे माध्यम से मेरी ही सामान्य आवाज़ में कुछ बोल रहे हैं। परिवार के सभी सदस्य तथा मैसूर पिरामिड स्पिरिचुअल सोसाइटी के कुछ सदस्य सब कुछ देख और सुन रहे थे।

 

इस घटना के बाद मैं तो खुशी के मारे सातवें आसमान पर थी और चाहती थी कि पत्रीजी को जल्दी से जल्दी वह सब सुनाऊँ जो मेरे साथ घटित हुआ है। मेरे गुरु ने ही यह रास्ता मुझे दिखाया था, वे सब सुनकर उतने ही खुद भी खुश हुए और उन्होंने मुझसे यह सब छपवा कर सब मास्टर्स को बाँटने को कहा।

 

मैं यहाँ उन संदेशों की राशि में से कुछ संदेशों को प्रस्तुत करती हूँ जिनकी सभी को आवश्यकता है ताकि हर कोई खुद को पहचान सके और जातिविहीन समाज के उस स्तर तक पहुँच सके जिसका सपना गांधी जी ने देखा था। उस समाज में हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति तथा जानवरों के साथ भी दया और करुणा के साथ व्यवहार करता है और कोई किसी का गुलाम नहीं है। 

 

उस पार से महात्मा गांधी के संदेश
सत्य: सत्य, केवल सत्य ही मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जाएगा क्योंकि : 

 

* सत्य ही दिव्य है
* सत्य ही शांति है
* सत्य ही पवित्र है
* सत्य ही सरल है
* सत्य ही विजयी है
* सत्य सब चीजों को जोड़ता है
* सत्य शक्तिशाली है
* सत्य ही आसान है
* सत्य ही प्रकाश है
* सत्य शब्दहीन है
* सत्य सबके भीतर मार्गदर्शक शक्ति के रूप में विद्यमान है।

 

भक्ति का अर्थ प्रायः गलत समझा जाता है। भक्ति में बाहर दिखने को कुछ नहीं होता। सच्चा भक्त तो बनना चाहिए।

 

दिव्यता 

 

दिव्यता मनुष्य के अन्तस्‌ में होती है, बाहर वह हमें निस्वार्थता, सच्चाई, मन, वाणी तथा कर्म की शुध्दता एवं समर्पण में दिखाई पड़ती है। सम्पूर्ण विश्‍व में प्रत्येक जीव को एकता की भावना अनुभव कराना भी हमारी दिव्यता है। दिव्यता को भी अक्सर गलत समझा जाता है, वह पूजा - भक्ति का बाह्य प्रदर्शन नहीं है।

 

 मन

 

मानव मन आज टुकड़ों में बँटा है। जब ये टुकड़े जोड़ दिए जाएँगे, मनुष्य को मानसिक शक्ति मिल जाएगी। मन की स्थिरता और शान्ति मन को अन्तर्मुख करने से मिलती है। एक बार आदमी की मानसिक स्थिरता व शान्ति खो जाए तो वह नशीली वस्तुओं तथा मदिरा का सेवन करने लगता है और फ़िर तो उसका अपने मन व शरीर पर नियन्त्रण ही नहीं रहता।

 

 कर्म

 

मनुष्य को हमेशा किसी न किसी काम में लगे रहना चाहिए। उसे आलसी नहीं होना चाहिए, न ही उसे समय बर्बाद करना चाहिए। कर्म से अर्थ है - समाज के कल्याण हेतु किया गया सृजनात्मक कर्म। ऐसा काम हमें इसलिए भी करना चाहिए क्योंकि इससे हमारा उत्थान होता है। काम करते समय पूरी जागरूकता रहनी चाहिए, पूर्ण समर्पण होना चाहिए, ऐसा व्यक्ति ही सच्चा ‘कर्मयोगी’ होता है।

 

परिपूर्णता 

 

जो भी काम करो उसे आदर्श रूप में करना बहुत श्रेष्ठ है। परिपूर्णता को संकल्प तथा समर्पण के बिना पा लेना आसान नहीं है। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम कर क्या रहे हो। तुम्हारे मुँह से निकला शब्द... प्रत्येक शब्द... भी आदर्श होना चाहिए। यदि तुम कोई काम आदर्श रूप में नहीं करते हो इसका मतलब है कि तुम्हारे मन में स्पष्टता नहीं है। इसी स्पष्टता को पाने के लिए तुम्हें ध्यान करना चाहिए।

 

सरलता

 

सरलता और विनम्रता तुम्हें आत्मिक शांतिमय जीवन तक ले जाएँगे। विनम्र रहो और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए सरल शब्दों का प्रयोग करो। सरल सादा भोजन करो, वह कभी तुम्हारे पाचन तंत्र को कष्ट नहीं देगा। सादा वस्त्र धारण करो। ऐसे तो विलासिता का कोई अन्त नहीं है और अन्त में तुम्हें एक असन्तुष्ट जीवन ही मिलेगा। शुरु में चाहे तुम्हें इन चीजों से खुशी मिले पर विलासिता से केवल अस्थायी तसल्ली ही मिलती है। इसी प्रकार ध्यान का भी सरल तरीका अपनाओ, यह तो हर जगह सच ही माना गया है क्योंकि सच है ही बहुत सरल। जीवन भर एक आसान रास्ते पर चलो और महानतम संतुष्टि पाओ।

 

सहिष्णुता

 

 सहनशीलता का अर्थ यह नहीं कि तुम दूसरे के सामने झुक जाओ, वह तो दासता समान होगा। दूसरों की अच्छाई या बुराई को खुले दिल से स्वीकार करना चाहिए। यदि हममें कोई दोष है तो उसे दूसरे की अच्छाई से बदल डालना चाहिए पर इसका यह अर्थ नहीं कि हमारी अपनी पहचान खो गई या हम उसके अधीन हो गए। सहिष्णुता का अर्थ है हम दूसरों की अच्छाई - बुराई को समान भाव से स्वीकारते हैं।

 

अध्यवसाय 

 

अभ्यास व अध्यवसाय के बल पर मनुष्य अपने लक्ष्य को पा लेता है। इस प्रक्रिया में वह परिपूर्ण व दक्ष बन जाता है। मन में लक्ष्य स्पष्ट हो और फिर परिश्रम किया जाए तो सफलता ज़रूर मिलती है। लक्ष्य पा लेने पर या सफलता प्राप्त कर लेने पर हमें अपना संतुलन नहीं खो देना चाहिए। विफल होने पर या मुसीबत में भी अपना संतुलन नहीं छोड़ देना चाहिए। ऐसी संतुलन की स्थिति केवल ध्यान द्वारा प्राप्त की जा सकती है।

 

करुणा 

 

करुणा मनुष्य की सहज वृत्ति है। हमारे पास बहुत करुणा होनी चाहिए अगर हम अच्छी समझ पाना चाहते हैं। करुणा के द्वारा हम अपनी सारी नकारात्मकता को भगा सकते हैं। करुणा से करुणा ही उपजती है और इस तरह भाईचारा बढ़ता है। ऐसा करुणामय व्यक्ति ही अपना उत्थान करके एक श्रेष्ठ आत्मा बन सकता है।

 

 सहानुभूति

 

सहानुभूति एक अमूर्त चीज़ है। वनस्पतियों तथा जानवरों के प्रति इसका प्रदर्शन करना चाहिए। यदि हम अयोग्य व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं तो कई बार इसका दुरुपयोग हो जाता है। इसलिए इससे पूर्व कि हमारी सहानुभूति की धारा बह निकले, हमें योग्य व्यक्ति की परख कर लेनी चाहिए। यदि सहानुभूति न होती तो मानव जाति अब तक एक असभ्य, बर्बर जाति बन जाती।

 प्रेम

 

प्रेम भी एक अमूर्त परन्तु महत्त्वपूर्ण भाव है जो जीवन के लिए नितान्त आवश्यक है। प्रेम का रूप किसी भी परिस्थिति में नहीं बदलता। यह हृदय से निकलने वाला पवित्र प्रवाह है। यह बदले में किसी से कुछ भी पाने की कामना नहीं करता। इसमें सिर्फ देना ही है, लेना कुछ भी नहीं है। इसमें लेना - देना दोनों नहीं होते, जैसा कि कुछ लोग समझते हैं। एक बार अगर ऐसा प्यार फूट पड़ा तो उसका प्रवाह कभी रुकता नहीं। यह अपने आप में शान्ति प्रदान करने वाली अनुभूति होती है। जब यह प्यार प्रदर्शित होने लगता है या जब इसका बहना शुरू हो जाता है तो आश्‍चर्य की बात तो यह होती है कि यह कम होने की बजाय बढ़ता ही जाता है। दूसरे को बिना शर्त प्यार देने से देने वाला भी स्वयं पवित्र हो जाता है।

 

क्षमाशीलता 

 

यदि खुश रहना चाहते हो तो क्षमा करो और भूल जाओ। जो ऐसा कर सकता है उसमें निश्‍चय ही असीम करुणा भरी होगी। ऐसा ही व्यक्ति पूरी तरह शांतिपूर्वक रह सकता है। बिना क्षमाशीलता के शायद ही कोई उन्नति कर सकता हो। उसके रास्ते में अनेक बाधाएँ आएँगी जैसे अपनी ही बढ़ोत्तरी में मानसिक अवरोध आते रहेंगे। दूसरों से सम्बन्धित विचार उसके मन को हमेशा घेरे रहेंगे, अपने बारे में वह कभी सोच ही नहीं सकेगा। 

 

सीधापन 

 

सीधापन या सरलता भी एक अमूर्त चीज़ है। ज्ञान प्राप्त करने से पहले यह होती है या फिर जब पूरा ज्ञान प्राप्त हो जाए तब यह हमारे पास होती है। मध्य में इसकी स्थिति ही नहीं है। एक अबोध बालक तथा एक समस्त ज्ञान प्राप्त संत ही वास्तव में सरल और सीधे होते हैं। यह सरलता ही तुम्हें ईश्‍वरत्व देती है और तुम्हें ईश्‍वर के करीब ले जाती है। इसलिए ध्यान करो, अपनि सद्‌बुध्दि का विकास करो। ज्ञान - भण्डार को अपने में समेट लो और फिर देखो सरलता किस तरह तुम्हारे भीतर फूल की तरह विकसित होती है।

 

अलगाव 

 

 आध्यात्मिकता और धर्म के नाम पर किसी को भी अपनी सांसारिक संपत्ति की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी से बच निकलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। किसी वस्तु को हम केवल इसलिए फेंक सकते हैं कि हम तो आध्यात्मिक हैं, हमें इसकी क्या आवश्यकता। परन्तु इस श्रम के बारे में सोचिए जो उसके बनाने में व्यय हुआ है। असल में तो तुम्हें इस्तेमाल कर लेने के बाद फ़ालतू चीज़ों से छुटकारा पाना है तो उन कम भाग्यशाली लोगों को दो जिनके पास वे नहीं हैं। उन वस्तुओं को फेंक देने से यह कैसे अर्थ निकला कि तुम अपनी सभी सांसारिक वस्तुओं से अलगाव महसूस कर रहे हो? तो फिर ध्यान रहे, अलगाव का झूठा आवरण अपने ऊपर मत डालो।

 

 पर - निर्भरता

 

कोई भी व्यक्ति इस दुनिया में रहते हुए दूसरों की सहायता के बिना जी नहीं सकता पर यह भी सच है कि उसे दूसरों पर निर्भर नहीं हो जाना चाहिए और न ही परजीवी बन जाना चाहिए। दूसरों को अपने ऊपर आश्रित बना लेना भी उतना ही अवांछनीय है। जहाँ तक सम्भव है, मनुष्य को स्वावलम्बी ही होना चाहिए। अपना काम खुद करना ही सबसे श्रेयस्कर है।

 

ग़रीबी 

 

अक्सर ग़रीबी का मतलब समझा जाता है - भोजन की कमी। इस धरती पर जहाँ संसाधनों की प्रचुरता है, मुझे लोगों के लिए भोजन की उपलब्धता कम होने का कोई कारण नज़र नहीं आता। असली कारण तो है उनमें ज्ञान और सद्‌बुध्दि की कमी। यह गरीबी अगर न रहे तो शेष सब ठीक हो जाएगा। इसलिए अपने ज्ञान, जानकारी तथा सद्‌बुध्दि का विकास करो।

 

आत्महत्या

 

किसी भी व्यक्ति को आत्महत्या करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। यह तुम्हारी अपनी मर्ज़ी और संकल्प के विरुध्द है। जब तुम्हारा जन्म होता है तुम स्वयं ही अपनी विदाई का दिन भी निश्‍चित कर लेते हो। यह दिन तुम्हारी स्वाभाविक व कुदरती मृत्यु का दिन होता है जब तुम इस भौतिक शरीर का त्याग करते हो। अगर कोई व्यक्ति उस घोषित तिथि से पहले आत्महत्या करता है तो न केवल वह अपने शरीर को खत्म करने के अपराध - बोध से घिर जाता है बल्कि अपने शेष जीवन के कर्मों के बोझ से भी मुक्त नहीं हो पाता जो उसने जीवित रहकर कर लिया होता। अगर कोई व्यक्ति भूख से मरता है तो उसे यह अपराध बोध नहीं होगा परन्तु आत्महत्या करने पर यह बोझ बना रहेगा। अगर मुश्किलें हैं तो उनका डटकर मुकाबला करो। समझदारी के साथ किसी भी समस्या का समाधान किया जा सकता है। किसी को भी आत्महत्या का अपराध नहीं करना चाहिए।

 

कामना 

 

कुछ चाहना या इच्छा रखना अमूर्त भाव है जो इन आँखों को दिखाई नहीं देता। कोई भी कामना अच्छी या बुरी नहीं होती। व्यक्ति के विकास - स्तर के अनुसार यह इच्छा सबके लिए भिन्न - भिन्न होती है। सबसे कम विकसित आत्मा सबसे अधिक अभिलाषाएँ रखती है। आत्मा के विकास के साथ साथ इच्छाओं का रंग भी बदलता जाता है। एक ऐसा भी समय आता है जब इच्छाएँ रहती ही नहीं। यह हमारे विकास की परीक्षा है। इस प्रकार एक बहुत विकसित व्यक्ति अपने लिए कभी कुछ भी अभिलाषा नहीं रखता।

 

क्रोध

 

निम्न श्रेणी की अमूर्त्त भावनाओं में एक है क्रोध। इस क्रोध को अपनी इन्द्रियों के रास्ते निकाल फेंकना चाहिए। इसे दबाना नहीं चाहिए। दमित क्रोध हमारे भीतर घृणा के रूप में जमा हो जाता है। सही कारण हेतु तथा सही उद्देश्य हेतु स्वीकार करने योग्य होता है। अतः उचित बात के लिए ही क्रोध करें और दूसरों का सही क्रोध स्वीकार भी करें। अकारण या अनुचित क्रोध त्यागने योग्य है। किसी के अनुचित क्रोध का मुकाबला धैर्य और दृढ़ता से करें।

 

घृणा

 

घृणा भी अमूर्त भाव है पर निम्न श्रेणी का और नकारात्मक भी। घृणा से भरा व्यक्ति खुद से भी घृणा करता है। घृणा से घृणा ही उपजती है इसलिए इसे जड़ से खत्म कर देना चाहिए। इसके लिए व्यक्ति को ध्यान करना होगा और अपनी अन्तरात्मा को छूना होगा जहाँ उसका वास है। हम तो आत्मा हैं जो आनन्द का स्रोत है, वह प्रेम व घृणा से परे है। ध्यान के नियमित अभ्यास से कोई भी घृणा पर विजय पा सकता है।

 

ईर्ष्या

 

ईर्ष्या भी एक निम्न भावना है। आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में ही यह जन्म लेती है। यह नकारात्मक भावना उस व्यक्ति को भी जला डालती है। इस पर विजय पाने का उत्तम तरीका है - अपने और दूसरों के अन्दर दिव्यता को देखना। मनुष्य के इस ईर्ष्या भाव ने कई महायुध्द कराए हैं। इसलिए ध्यान करो, दिव्यता को चारों ओर पहचानो और ईर्ष्या से मुक्त हो जाओ।

 

अज्ञान... लालच 

 

समस्त विश्‍व में अशांति व उथलपुथल का क्या कारण है ? क्या यह मनुष्य के लालच की वजह से है? या मनुष्य के अज्ञान के कारण है ? या फिर दोनों कारणों से है ? एक बार अज्ञान का सथान ज्ञान ले ले तो फिर लालच बचेगा ही नहीं। यह अज्ञान ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। इस अज्ञान को कैसे दूर करें? सर्वप्रथम, मनुष्य यह स्वीकार करे कि वह अज्ञानी है। यह खुलापन बहुत ज़रूरी है। इसके बाद वह एक सच्चे महान्‌ गुरु की तलाश करे तथा बहुत सी पुस्तकें पढ़े। इसी तरह वह संपूर्ण ज्ञान पा सकता है। एक बार जब मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर ले तो लालच के लिए कोई स्थान बचेगा ही नहीं और धीरे धीरे शांति और स्थिरता हमारी इस प्यारी धरती को अपनी बाँहों में समेट लेगी।

 

गिरिजा राजन
संपर्क: +91 9600406369

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