" ध्यानाभ्यास से जीवन सार्थक हुआ "

 

मेरा नाम जीवन्धर केतप्पनवर है। मैं कर्नाटक के बेलगाम जिले चिक्कोडी में महिला डिग्री कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक हूँ।

 

1999 नवम्बर में, मैं एक बार अपने कॉलेज के नाम के लिए बेंगलूरू गया था। वहाँ पर मैं अपने लॉज से ऑफिस के लिए जा ही रहा था, अचानक मेरी नजर न्यूज पेपर पर पड़ी। पेज़ पर लिखा था कि- " पूर्वजन्म सत्य हैं। " उसे उठाकर मैंने पढ़ा, उसमें लिखा था कि- " मैंने अपने सारे पूर्वजन्मों को देखा हैं। " इसे पढ़कर मुझे आश्‍चर्य हुआ कि " इस वैज्ञानिक युग में भी इस तरह दावे के साथ कहनेवाला यह महाशय कौन है ? आज भी है !

 

इस न्यूज को पढ़ते ही मैं अपना सारा काम छोड़कर उस होटल में जाकर डॉक्टर न्यूटन से मिला। उन्होंने मेरी आँखों में गौर से देखा और क्लास में बैठने के लिए अनुमति दी। अंदर जाते-जाते मैंने डॉक्टर न्यूटन से पूछा कि " आप एक ( M.B.B.S, M.D ) डॉक्टर हो कर इस क्षेत्र में क्यों आए? उन्होंने अत्यंत महत्वपूर्ण जवाब दिया- " I don't want to cure the disease from leaf level, I wanted to cure the disease from root level. "

 

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उस प्रथम ध्यान सत्र में मुझे कई ध्यानानुभव हुए, सूक्ष्मशरीर यान का अनुभव हुआ। उन्हें मैं डाँ.न्यूटन से बाँट लिया तो उन्होंने मुझसे कहा कि " कल मेरे गुरुजी बेंगलूरू आ रहे हैं, आप उनसे मिलकर अपना अनुभव बाँट लीजिए। जब पहली बार ब्रह्मर्षि पत्रीजी से मिला तो वे मुझे ओशो जैसे ही लगे। उनसे मिलने के बाद मैंने उनसे एक सवाल पूछा- " अब तक मैं ओशो की किताबें पढ़ रहा हूँ, क्या मैं सही हूँ ? तो पत्रीजी ने तुरंत कह कि- " It is only a right thing, you have done in your life " इस के बाद, पत्री जी के जन्म दिन-नवम्बर ग्यारह के अवसर पर आयोजित कर्नाटक के कुदुरेमुख ट्रेक्किंग में मैंने भाग लिया। वहाँ पूर्णात्मा के दर्शन हुए।

 

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उसके बाद मैं वापिस चिकोडी आया और ध्यान करता रहा। थोड़े दिनों के बाद ध्यानाभ्यास रूक गया। 2002 दिसम्बर में एक सपना देखा, उसमें पत्रीजी के साथ ट्रेक्किंग का अनुभव और उन सारे पिरामिड मास्टर्स के दर्शन हुए जो कुदुरेमुख ट्रक्किंग में साथ थे। उसी दिन बेंगलूरु से फोन आया कि " अपने कॉलेज के काम के लिए तुरंत आना चाहिए। " उसी दिन बेंगलूरु रवाना हुआ। वहाँ पर पत्रीजी ने लगातार चार घंटे के ध्यान के लिए बिठाया, उसमें बहुत श्रेष्ठ अनुभव हुए।

 

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आदिशेष ने मुझे अपने ऊपर बिठाकर सारी पृथ्वी की सैर कराई, अमेरिका के नयागरा फाल्स सहित कई स्थल दिखाए और अंत में शिवलिंग के पास ले जाकर मुझे वहाँ उसके सामने उतार कर आदिशेषजी शिवलिंग के आश्रय के रूप में अपने फन फैलाकर रह गए। मैंने परम आनन्द से शिवलिंग को गले लगाया और पूछा कि, What is the purpose of my life ? तब शिवलिंग पृथ्वी बनकर परिवर्तित हुआ और संदेश आया कि, " Global travelling " (ध्यान प्रचार-प्रसार के लिए) तब से मैं निरंतर ध्यान कर रहा हूँ।

 

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" बुध्द पिरामिड ध्यान केन्द्र " नाम से एक ध्यान केन्द्र का संचालन कर रहा हूँ। कर्नाटक के लगभग सभी जिले में ध्यान कार्यक्रमों के आयोजन में भाग लिया हूँ। ब्रह्मर्षि पत्रीजी के साथ कन्याकुमारी से दिल्ली-पंजाब तक ध्यान कार्यक्रमों में भाग लेने का सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ। पत्रीजी के आदेश से " ध्यान कर्नाटक " कन्नड़ मासिक पत्रिका का संपादक बनकर पत्रिका शुरू की, जो अब " ध्यान कस्तूरी "का नाम से जारी है। " ध्यान भारत " हिन्दी द्वैमासिक पत्रिका का संपादक के रूप में भी काम करने का मौका मिला।

 

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" ध्यान और शाकाहार " संदेश दुनिया के कोने-कोने तक मुफ्त में पहुँचाने के लिए कृत संकल्प "पिरामिड स्पिरिच्युअल सोसायटीस मूवमेंट, इंडिया" में सेवा करने का जो मौका मुझे मिला है; इसे मैं, अपने समस्त पूर्व जन्मों के सत्कर्मों का फल समझता हूँ। जनवरी-फरवरी 2008 " ध्यान भारत" के अंक का विमोचन होने के बाद पत्रीजी के आदेशानुसार ध्यान कार्यक्रमों में भाग लेने लुधियाना आया था। फरवरी 2008 पूर्णिमा के दिन विशिष्ट ध्यानानुभव हुआ।

 

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लगातार चार घंटे तक मृत्यु का अनुभव... बाद में धीरे-धीरे शरीर में जान आ गई। उसी अनुभव के साथ ऊर्ध्वलोक के एक मास्टर ने मुझमें प्रवेश किया। उसके बाद मेरे लिए जीवन का स्वरूप ही बदल गया। दिसम्बर 2008 में बेंगलूरू में आयोजित " अहिंसा-शांति-ध्यान महायज्ञ " में हुए एक ध्यानानुभव के साथ ध्यानियों को अपना संदेश देना चाहता हूँ। पत्रीजी ध्यान सत्र ले रहे थे, हम सभी लगभग 13,000 मास्टर्स ध्यान के लिए बैठे थे।

 

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उस ध्यान में मुझे अनुभव हुआ... " ध्यान मंडप के बाहर नरसिंह अवतार प्रकट हुआ। सभी उन्हें देखकर आश्‍चर्य चकित रह गए। उनके पास आंजनेयस्वामी गए और ध्यान मंडप की वेदी तक-जहाँ पत्रीजी बैठकर बाँसुरी वादन कर रहे थे- स्वागत ( Escorting) करके लेकर आए और पत्रीजी के पास आसीन होने के लिए निवेदन किए। नरसिंह स्वामी वहाँ पर आसीन हो गए। "

 

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पिरामिड मास्टर्स सभी प्रह्‍लाद हैं। उनकी रक्षा के लिए अब साक्षात्‌ नरसिंह स्वामी पधारे हैं; अब समाज की कोई भी हिरण्यकश्यपु शक्ति, ध्यानियों का बाल भी बाँका न कर सकेगी। मित्रों, सभी निर्भयता से ध्यानाभ्यास कीजिए और ध्यान का प्रचार-प्रसार कीजिए। हाल ही में मई 17 से जून 22 तक चालीस दिन का मौन का पालन किया।

 

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इससे मुझे ध्यानाभ्यास में बहुत सहयोग मिला। चालीस दिन के वाचिक मौन के साथ-साथ मन और शरीर का मौन भी महसूस हुआ। आम तौर से जिन गलतियों को मैं लगातार दोहराता रहता था, वे सभी अपने आप छूट गयीं। मित्रों, यथासाध्य मौन का भी पालन करते रहिए। दिसम्बर 2012 तक समस्त भूमंडल को " ध्यान भूमंडल " बनायेंगे। ब्रह्मर्षि पत्रीजी के दिव्य स्वप्न को साकार करेंगे और अपने जीवन के उद्देश्य को सफल बनायेंगे।

 

प्रो: जीवन्धर केतप्पनवर
संचालक, बुध्द पिरामिड ध्यान केन्द्र, चिक्कोडी
(बेलगाम, कर्नाटक)
संपर्क : +91 9342127540 

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