" मेरे जीवन के बुझे दीपक को फिर से प्रकाशित कर दिया "

 

मैं हूँ जसविन्दर कौर। दिल्ली में रहती हूँ और एक बैंक में कार्यरत हूँ। एक सिख परिवार में मेरा जन्म हुआ, मेरे पिता एक अमृतधारी सिख हैं। हमें भी बचपन से सिखी परम्परा के अनुसार जीवन जीने की शिक्षा दी गई। मैं अधिक समय अपनी दादी के साथ रही जो खुद एक third eye master थीं, इसलिए मुझ पर उनके व्यक्तित्व और उनके मार्गदर्शन का गहरा प्रभाव है।

 

मेरी दादी खुद भी गुरुद्वारे जाती थीं और मुझे भी साथ ले जाती थीं। मुझे वहाँ के कीर्तन बहुत अच्छे लगते थे। जल्दी ही मुझे भी कई प्रकार के अनुभव होने लगे। दादी भी अपने अनुभव हमें सुनाया करती थीं, घर में धार्मिक-आध्यात्मिक वातावरण था। मुझे मन में कई सवालों के जवाब भी मिलने लगे थे।

 

जनवरी, 2005 में अकस्मात्‌ दादी का निधन हो गया। मुझे लगा कि अब तो रास्ता दिखाने वाला ही कोई नहीं है। मुझे विवाह करने की कोई इच्छा नहीं होती थी, मेरी ज़िद पर दोनों भाइयों का विवाह भी कर दिया गया। मैं धीरे धीरे अकेलापन महसूस करने लगी और स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी। शारीरिक, मानसिक रूप से मैं अपने को थका हुआ पा रही थी। लगता था, कुछ बातें तो किताबों में ही अच्छी लगती हैं। इस लक्ष्यहीन, अंधकारमय जीवन का अर्थ ही क्या है? मानसिक परेशानी की वजह से मैं depression में रहने लगी, घुटनों में दर्द रहने लगा। 38 साल की अवस्था में घुटनों का हाल ऐसा हो गया जैसे मैं पचहत्तर साल की हूँ। दो साल तक मैं हर प्रकार की दवाई लेती रही और फ़ीज़ियोथेरेपी भी कराती रही पर लाभ नहीं हुआ। डॉक्टर ने बाताया कि घुटनों में gap कम होने की वजह से ऐसा हो रहा है, आपको तो सर्जरी करानी पड़ेगी। आप अभी दवा लेते रहो और योगा करो। यह सुन कर मैं बहुत हताश हुई। knee-cap लगाकर चल पाती थी, सीढ़ियाँ चढ़ना तो असम्भव था। कई साल यह सब झेलते कट गए।

 

जनवरी 2010 में मेरे एक मित्र ने मुझे ध्यान के बारे में बताया। मैं भी उसके साथ सफ़दरजंग वाले सेंटर में चली गई। तब तक क्लास तो खत्म हो चुकी थी। परन्तु वहाँ के मास्टर्स ने मुझे ध्यान के बारे में सब कुछ समझाया, ध्यान भी कराया, पिरामिड कैप दी, पत्रिकाएँ और एक सी.डी भी दी। ध्यान से पहले मेरा हाल ऐसा था जैसा किसी का अपनी कोई कीमती चीज़ खो जाने पर होता है पर उसके बाद लगा मानो कोई खज़ाना मिल गया है। तब से मैं हर रविवार को वहाँ जाने लगी। ध्यान के बारे में सब कुछ जाना, लोगों के अनुभव सुने और बस बैंक आते जाते बस में ही ध्यान करने लगी।

 

फरवरी 2010 में पत्री सर दिल्ली आए। मैंने उनका Flute Meditation Session भी अटेंड किया। बाद में पत्री सर से मिलने का समय मिला और मैंने उन्हें बताया कि दादी के जाने के बाद मैं अंधकार से घिर गई हूँ। मुझे अंधेरे से बहुत डर लगता है। उन्होंने मुझे समझाया - ‘अंधकार के बाद ही तो उजाला मिलता है, हलाहल के बाद ही तो अमृत मिलता है। अंधेरे से मत डरो, ध्यान को बढ़ाओ, प्रकाश को बढ़ाओ। सब कुछ तुम्हारे भीतर है, सब खुद प्राप्त करो।’

 

दो ही दिन बाद पूर्णिमा ध्यान होना था। बम्बई से डॉ. जी.के आए थे। उन्होंने ध्यान के बाद Spiritual Tablet तथा Astral Surgery से हीलिंग के बारे में बताया। वहाँ एक 18 साल का लड़का बैठा था जिसने बताया कि उसका brain tumor केवल चालीस दिन के ध्यान से ठीक हो गया। तब मेरे मन में यह बात आई कि अगर यह हो सकता है तो घुटनों का दर्द तो क्या चीज़ है। मैंने निश्चय किया कि मैं और अधिक समय तक ध्यान किया करूँगी।

 

उस दिन पूर्णिमा ध्यान में मैने विश्वशक्ति को अपने शरीर में महसूस किया जिसका असर एक महीने तक रहा। अब तो मैं ध्यान का एक अवसर भी हाथ से जाने नहीं देती थी। छः पूर्णिमा ध्यान के बाद मेरा घुटनों का दर्द ठीक हो गया और मैंने अपनी सारी दवाइयाँ फेंक दीं। मन को शांति मिली। आध्यात्मिक अनुअव भी होने लगे और शरीर भी स्वस्थ होने लगा।

 

दिसम्बर 2010 में मैं अमरावती में ध्यान महायज्ञ में भाग लेने गई। संध्यासेशन के समय गहन ध्यान करते हुए मेरा सूक्ष्म शरीर बाहर आ गया। मैंने देखा सूर्य के समान प्रकाशमान एक दिया जल रहा है और लाखों छोटे-छोटे दिए आसपास पड़े हैं। किसी एस्ट्रल मास्टर की आवाज़ आई कि दिए से दिए को जलाना बहुत आसान है, केवल अपने दिए को उस बड़े दिए के पास ही तो ले जाना है। मैंने जब एक दिया उठाकर उस प्रकाशमान दिए के पास रखा तो असंख्य दीपक जल उठे। उस आवाज़ ने तब कहा कि यह जलता हुआ दिया पत्री जी हैं और शेष दिए साधक हैं इस सबकी सामूहिक ऊर्जा को पत्री जी विश्वशांति के लिए प्रयोग करना चाहते हैं, इसलिए सभी को अपना योगदान देना चाहिए।

 

वहाँ से लौटकर मैंने मंदिरों, स्कूलों, कॉलेजों में जाकर ध्यान क्लासें लेना शुरू कर दिया। यह मेरा पिरामिड स्पिरिचुअल सोसाइटीज़ मूवमेंट में अपनी ओर से योगदान था। मेरा ध्यान कार्यक्रम जारी रहा और मैं पहले से बेहतर काम करने योग्य हो गई। अगले वर्ष विशाखापट्‌टनम्‌ में ध्यान महाचक्र में शामिल होने के लिए मैं अन्य मास्टर्स के साथ मिलकर वहाँ पहुँची।

 

महाचक्र के दौरान अचानक मुझे घुटनों में तेज़ दर्द हुआ। मैं बहुत कष्ट में थी, तभी मैडम सरोज मलिक ने मुझे बताया कि उन्होंने दोपहर के समय पत्रीसर को सीनियर पिरामिड मास्टर प्रेमनाथ जी से बात करते सुना था। वे कह रहे थे कि आप रोज़ यहाँ तेलुगु भाषा में एक वर्कशाप करके सभी को astral surgery के बारे में बता रहे हैं। उत्तर भारत से आए बहुत से लोग भी बहुत कष्ट व पीड़ा में हैं तो आज शाम को हिन्दी में वर्कशाप रखें और सभी उत्तरभारतवासियों को भी इसका लाभ दें। मैडम मलिक ने कहा कि आज शाम को तुम भी यह वर्कशाप अटेंड करो।

 

यह 26 दिसम्बर की बात है। मैं वर्कशाप के लिए गई। कुर्सी पर बैठते ही अजीब सी sensation टाँगों में होने लगी। ध्यान शुरू होते ही किसी astral master ने मेरी mind-body पर पूरा नियन्त्रण कर लिया। अचानक सिर की तरफ़ से ऊर्जा का तेज़ प्रवाह आने लगा और पूरे शरीर में फैल गया। मैं घबराहट के मारे बेहोश हो गई और साथ बैठी मैडम के ऊपर गिर पड़ी। उनके पूछने पर कि क्या हुआ है, मैं फिर से उठी पर बैठ न सकी और आगे की ओर झुक गई। तभी विशाखापटनम्‌ के सोमेश्वर सर और एक अन्य मैडम मेरे पास आए और मुझे कुछ बताने लगे। मैं कुछ होश में नहीं थी, जी मिचला रहा था पर मैं बेहोशी में ही जैसा वे कह रहे थे, करती जा रही थी। अचानक शरीर में एक ठण्डक सी महसूस होने लगी, अच्छा लग रहा था, आनन्दमय अवस्थी थी।

 

ध्यान की इस अवस्था में मुझे astral masters की आवाज़ आई कि आपके घुटने replace कर दिए गए हैं। आपरेशन हो चुका है। आप ICU में है, यह पहल सेक्शन है। दूसरा अखण्ड ध्यान का सेक्शन है जो private ward है और तीसरा general section है, जहाँ सब प्रकार के कार्यक्रम चल रहे हैं। आप रात के अखण्ड ध्यान में रहें, घर न जाएँ। हम दुबारा आएँगे। वर्कशाप खत्म हो गई। मुझसे अपना अनुभव बताने को कहा गया पर मैं तो अभी बेहोशी की हालत में थी। मैंने कहा, बाद में लिख दूँगी, अभी मुझे कुछ पता नहीं चल रहा है।

 

जब मैं कुर्सी से उठी तो दर्द बिल्कुल नहीं था, मुझे अपना शरीर भी बदला बदला सा लग रहा था। बहुत कमज़ोरी महसूस हो रही थी, अभी भी शायद एनेस्थीसिया का असर था। मैं साइड में पड़े एक सोफ़े पर लेट गई। घण्टे भर बाद मैं फिर उठकर ध्यान में बैठ गई और रात भर बैठी रही। ध्यान में मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने आकर मेरी टाँगों पर कोई सॉल्यूशन लगाकर ड्रेसिंग भी कर दी है।

 

27 दिसम्बर को हम वापिस दिल्ली आ गए। आने के बाद मुझे अपने घुटने और घुटनों से नीचे का भाग कुछ अलग सा लगता रहा। पत्री सर जब दिल्ली आए तो मैंने उन्हें अपना अनुभव बताया। महीने भर बाद हम सात ध्यानियों का एक ग्रुप महावतार बाबा की गुफा की यात्रा करने गए। वहाँ मैंने तीन किलोमीटर चढ़ाई चढ़ी। सालों से कभी आलथी पालथी लगाकर ज़मीन पर नहीं बैठी थी पर अब मैं आराम से एक घण्टा नीचे बैठकर ध्यान करती हूँ। मेरे जीवन में होने वाला यह चमत्कार ध्यान का चमत्कार ही है।

 

मैं सभी पाठक भाई-बहनों को यही सन्देश देना चाहती हूँ कि ध्यान करो और कराओ, खुशियाँ पाओ और बाँटो। मुझे अपने जीवन का लक्ष्य साफ दिख रहा है, अंधकार के बादल छँट चुके हैं। अब प्रकाश ही प्रकाश है। मैं पत्री सर की हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने मेरे जीवन का रूपान्तरण कर उसे अंधकार से प्रकाश की ओर मोड़ दिया। मैं धरती पर ही स्वर्ग का सृजन करने वाले इस महागुरु के सम्मुख नमन करती हूँ।

 

जसविन्दर कौर
दिल्ली
संपर्क : +91 92123 18775

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