पत्रीजी का धरती पर महान् आविर्भाव

 

मेरा नाम वरलक्ष्मी है। मैं विजयवाड़ा में रहती हूँ। 1998 में अस्वस्थता के कारण मैंने ध्यान प्रारम्भ किया। 24 घंटों में से 20 घंटों तक ध्यान साधना में मग्न रहकर मैंने सम्पूर्ण स्वास्थ्य को पाया। मैंने स्वयं मांसाहार को त्याग दिया, लाखों लोगों को ध्यान सिखाकर, उनसे भी मांसाहार को छुड़वा दिया। ध्यान के द्वारा अपने अन्तर्लोकों की यात्रा करते हुए मैंने अनेक लोकों के देवी देवताओं (मास्टर्स) से मिलकर, उनके ज्ञान बोध को आत्मसात् कर तथा टेलीपेथी द्वारा पत्री जी के संदेशों को पाते हुए भौतिक जीवन को आनन्द से जीना सीखा है।

 

पत्री जी एक अनन्त खान हैं

 

ब्रह्मर्षि पत्री जी को सम्पूर्ण रूप से समझना अत्यंत दुष्कर हैं। मैं उन्हें थोड़ा-थोड़ा सा समझती तथा जानकारी प्राप्त करती रही हूँ। "इस भूमि पर उन्होंने क्यों जन्म लिया हैं? दिव्य लोकों में उनकी स्थिति क्या है?" इन सबकी जानकारी प्राप्त करना, मेरे पूर्व जन्मों के पुण्यों का फल ही है।

 

एक बार ध्यान में मैंने पत्रीजी के जन्म के कारण को देखा था। यह संसार पूर्णत: अज्ञान में डूबा हूआ है। "मैं शरीर हूँ", ऐसी माया में स्थित मानव जाति को उबारने के लिए दिव्य लोकों के मास्टर्स ने अनेक प्रकार के प्रयत्न किए परन्तु असाध्य कार्य समझकर छोड़ दिया है। भूमि पर जीवों के अरण्य रोदन, पालतू पशुओं की मरण-वेदना, जल जन्तुओं के निस्सहाय रोदन तथा इन सभी के कारण संसार के विनाश हेतु भयंकर सुनामियों के प्रलय तांडव के समय, इस दिव्य कांतिमय देहधारी ने अपनी असीम करुणा से एवं विश्‍व प्रेम के कारण एक बार भूमण्डल का निरीक्षण किया तो....इस स्थिति का मूल कारण उन्हें अवगत हुआ।

 

संसार के विनाश के तथा सभी प्रकार के अनर्थों एवं मानव जाति के पतन, उनके अनेक कष्टमय जीवनों का मूल कारण, उनके मुँह में स्थित “चार अंगुल की जिह्‍वा” है। अत: इस जीभ के स्वाद के लिए इतनी जीव हिंसा वे कर रहे हैं। उनकी अपनी अपनी बौध्दिक स्थिति के अनुसार अनुचित वाक् अथवा वाणी से अपने विनाश का स्वयं आहवान कर रहे हैं। मानव जाति की जीभ को नाशक कृमि लग गया है। कीटकों से भरा है। अत: सर्वप्रथम कृमियों का नाश करना चाहिए। खेतों एवं बागों में कृमि-कीड़े लगने पर हम दवाइयाँ छिड़ककर, फसल को शुध्द कर बचा लेते हैं, नहीं तो सारे खेत उजड़ जाते हैं, फसल नष्ट हो जाती है। परन्तु जीभ को कृमियों से कैसे मुक्ति दिलाई जाए ?

 

“उध्द्र्रेदात्मनात्मानाम” अर्थात् अपनी आत्मा का उध्दार हमें स्वयं करना चाहिए। इसके लिए पहले अपने आपको जानना चाहिए। इसी प्रक्रिया में जीभ की शुध्दि भी करनी चाहिए। वरना खेतों की तरह समग्र मानव जाति ही नष्ट हो जाएगी। इसीलिए इस भूमि पर अत्यंत कांतिमय देहधारी का “महान् आविर्भाव” हुआ है।

 

कांतिमय देहधारी ब्रह्मर्षि पत्री जी, मानव जन्म लेकर “श्‍वास पर ध्यान” नामक महान् दवाई को सबसे पहले प्रयोग में ले आए। पिरामिड ध्यान का आविष्कार करके लाखों मानवों की जिहवा की सड़न को दूर किया। मांसाहार का त्याग कर, अपनी वाणी को सुधार कर, वाकशुध्दि द्वारा अनेकानेक लोग अपने आप की रक्षा कर, महाविनाश से मानवजाति की भी सुदृढ़ रक्षा कर रहे हैं।

 

पत्रीजी के आविर्भाव से आंध्रप्रदेश के साथ-साथ भारत देश भी पुनीत हुआ है। संसार के समस्त मानवों को “ध्यान” प्रादान कर, अपने आपको जानने के लिए, मानवों को महोन्नत स्थिति प्रदान करने के लिए प्रथ प्रदर्शक बनकर अनेक कष्टों एवं तानों को सहते हुए इतने दिनों तक ध्यान प्रचार करने वाले महान् ध्यानी अब “पिरामिड पार्टी ऑफ इंडिया” द्वारा ‘आध्यात्मिकों को ही शासन करने का हक होना चाहिए,’ यह जानकर प्रत्यक्ष राजनीति में भाग लेने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। इस पार्टी के लिए हमारे हिस्से के कार्यों द्वारा हमें योगदान देने से, इस देश के सौभाग्य के लिए हमारा परम उत्तरदायित्त्व भी सम्पन्न होगा। हमारे आत्म प्रयाण में यह अत्यंत विशिष्‍ट उत्तरदायित्‍व है। हमारे अंतिम जन्म में ऐसा सुअवसर देने वाले पत्री जी को सब कुछ देकर भी हम ॠणमुक्त नहीं हो सकते।

 

पिरामिड पार्टी की जय हो!
पिरामिड पार्टी जिन्दाबाद !!

 

के. वरलक्ष्मी
विजयवाड़ा 

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