" ध्यान के सिवाय कुछ अच्छा नहीं लगता "

 

मैं हूँ कैलाश रानी बब्बर। दिल्ली में रहती हूँ। इस समय मेरी उम्र 73 वर्ष है। मेरा जन्म एक अच्छे परिवार में हुआ था। जल्दी ही विवाह भी हो गया, दो बच्चे भी हुए पर अकस्मात्‌ पति की मृत्यु ने मेरे जीवन में कठिनाइयों का दौर शुरू कर दिया। उस समय मेरी बेटी की शादी हो चुकी थी पर बेटा अभी 12 साल का था। तब मुझे नौकरी करनी पड़ी पर बेटे को किसके पास छोड़ती। उस समय पड़ोसियों ने मेरी बहुत मदद की। मेरी बेटी और दामाद ने भी उस मुश्किल की घड़ी में मेरा बहुत साथ दिया। 

 

यूँ तो मुझे शुरू से ही ध्यान करना बहुत अच्छा लगता है पर इस परिस्थिति में मैं ऐसा ठीक ढंग से कर नहीं पाई क्योंकि मुझे यह बताने वाला ही कोई नहीं मिला था कि ध्यान करना कैसे है। जब मेरा बेटा बड़ा हो गया, उसका घर व्यवस्थित हो गया, तब मैं मंदिर जाने लगी। गुरु जी ने मंत्र दिया है, मैं उसी का जाप किया करती थी। एक दिन उस मंदिर में जसविंदर मैडम आईं। उन्होंने हमें ध्यान के बारे में समझाया। मुझे बहुत अच्छा लगा। तब से मैं ध्यान करने लगी। ध्यान के समय मुझे कई बार कई दृश्य भी दिखाई दिए। कभी कुछ प्राकृतिक दृश्य, कभी जलते हुए दीपक और कभी पवित्र आत्माएँ। एक बार तो भगवान श्री कृष्ण नज़र आए और लगा कि मैं एक छोटी सी बच्ची हूँ और कृष्ण जी मेरे चारों ओर चक्कर लगाते हुए मेरे साथ खेल रहे हैं। 

 

मैं दस दिन के लिए बैंगलौर गई थी। मुझे वहाँ ऐसे लगा जैसे मैं स्वर्ग में आ गई हूँ। किंग्ज़ चेम्बर में बैठकर ध्यान करने का भी अवसर मिला। वहाँ लगा कि एक पिरामिड से दूसरा पिरामिड निकलता आ रहा है और सभी पूरी पृथ्वी पर फैलते जा रहे हैं। यूँ तो कई बार तीर्थ यात्राएँ की हैं पर जितना आनंद मुझे बैंगलौर में मिला, ऐसा कहीं नहीं मिला था। वहाँ भी मुझे अकेले में बैठ कर ध्यान करना ही अच्छा लगता था। वहाँ मैडम जसमुहीन से मिली, उनसे गले मिल कर लगा कि मेरी सारी कालिमा ही घुल गई है। 

 

ध्यान करने से पूर्व मेरे घुटनों में दर्द रहता था। एक दिन जसविन्दर मैडम ने मुझे डाक्टर जी.के. से मिलवाया। उन्होने मुझे 40 दिन का मौन व्रत रखने को कहा और चार पाँच घंटे ध्यान करने को भी कहा। पूरी ईमानदारी से उनकी सलाह का पालन करने से ही मैं अब ठीक तरह से चलने लगी हूँ। 15 दिन के मौन व्रत से ही मुझमें फ़र्क पड़ना शुरू हो गया था पर अब मैं पूरी तरह से स्वस्थ हूँ। 

 

ध्यान में मुझे ऐसा एक संदेश मिला कि अपने अहम्‌ को छोड़ देना है, तभी जीवन में आने वाली बाधाओं को हटाया जा सकता है। मैंने इस संदेश पर भी अमल किया। परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ बिठा कर सबसे क्षमा माँगी और सबको खुद भी क्षमा किया। अब मेरा मन बिल्कुल हल्का रहता है और जीवन में कोई समस्या नहीं है। मैं सभी से यही कहती हूँ कि यदि सुखी रहना है तो यही एकमात्र रास्ता है। ध्यान को अपनाओ और सुख पाओ। मै पत्री सर और जसविन्दर मैडम की आभारी हूँ जिन्होंने हमें यह रास्ता दिखाया है। 



कैलाश रानी
दिल्ली

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