" दुर्घटना जो यादगार बन गई "

 

मैं कान्ता जैन कटक, उड़ीसा में रहती हूँ। मैं 52 वर्षीय महिला हूँ। घर में मेरे पति, दो बेटे, दो बहुएँ और पोते पोतियाँ हैं, भरा पूरा परिवार है। ध्यान के प्रति मेरा आकर्षण शुरू से रहा है। मैं जब भी कोई आध्यात्मिक पुस्तक पढ़ती, कुछ ही समय बाद लगता कि आँखें बन्द कर कहीं गहरे में खो जाऊँ। भजन अथवा जप करती तब भी ऐसा ही होता, मुझे अन्दर गहरे में जा कर बहुत शांति मिलती। मैंने यह महसूस किया कि ध्यान ही में मेरी रुचि है तो मुझे किसी से ध्यान सीखना चाहिए। घर की जिम्मेवारियों से इतनी फ़ुर्सत नहीं मिलती थी पर किसी तरह समय निकाल कर मैं पिरामिड मेडिटेशन सेंटर जाने लगी। लगभग तीन वर्ष से यह क्रम चल रहा था। आने जाने में और ध्यान करने में लगभग दो घण्टे तो लग ही जाते थे। आश्‍चर्य यह कि जाने के उत्साह में सब काम जल्दी ही निपट भी जाता था।

 

इसी प्रकार ध्यान करते करते मुझे लगा कि कोई प्रशिक्षक मिल जाए तो बहुत अच्छा हो पर अभी तक ऐसा कोई मिला नहीं था। इसी कारण ध्यान में निरंतरता भी नहीं आ पा रही थी और लग रहा था अटक गई हूँ। एक दिन पिरामिड ध्यान परिवार के एक मास्टर ने मुझसे कहा कि मैडम अब आप सेंटर आना छोड़िए और दूसरों को ध्यान सिखाइए। मैं समझ नहीं पा रही थी कि यह काम कैसे करूँ। एक दिन हरीश भाई ने कहा कि आज हम भुवनेश्‍वर सुखदेव भाई के यहाँ चलते हैं। उनके यहाँ चालीस दिन की क्लास चल रही थी और अब दो दिन ही बचे थे। मैं दोनों दिन उनके साथ वहाँ गई, वहाँ कुछ मास्टर्स से मुलाकात भी हुई और उनके अनुभव भी मैंने सुने। इन दो ही दिनों में मैंने इतना आनन्द बटोरा कि हर वक्त आनंद में रहने लगी और अब इन्तज़ार करने लगी कि अगला प्रोग्राम कब होगा और वहाँ मैं किनसे मिल पाऊँगी।

 

धीरे धीरे घर की परिस्थितियाँ भी बदलने लगीं। बहुओं ने ज़्यादा ज़िम्मेदारी संभालना शुरू किया और मुझे अधिक समय ध्यान के लिए मिलने लगा। अब मैं दो घण्टे तक ध्यान करने लगी। 8 फरवरी 2011 को मैं अपने भानजे के साथ बाइक पर एक प्रोग्राम में सम्मिलित होने के लिए भुवनेश्‍वर जा रही थी। आधे रास्ते में हाइवे पर एक बाइक सवार ने wrong side से आकर हमारी बाइक के पिछले चक्के के पास, जहाँ मेरा पैर था, ज़ोर से टक्कर मारी। बाइक पूरी घूम गई। आगे का हिस्सा पीछे आ गया और पीछे का आगे। मैं उछल कर गुलाटी खाते हुए सड़क के किनारे जा गिरी। गिरते समय मैंने महसूस किया जैसे मैं हवा में उड़ रही हूँ और उस वक्त मुझे अपने गुरु जी (मैं जैन हूँ) और पत्री जी की याद आई और मुझे पूरा विश्‍वास है कि उन्होंने बहुत बड़ी दुर्घटना से मुझे बचा लिया। मामूली चोट से हमारा बहुत बड़ा संकट टल गया। मेरे भानजे सुमित को भी पैर में मामूली चोट आई। वह इससे पहले ध्यान नहीं करता था पर इस घटना के बाद उसने मान लिया कि पत्रीजी बहुत बड़ी हस्ती हैं, उन्होंने ही हमें बचाया है।

 

समय के साथ ध्यान के प्रति मेरा रुझान धीरे धीरे और बढ़ता जा रहा है। प्रशिक्षक पाने की मेरी बलवती इच्छा उस दिन पूरी हो गई जब अचानक एक सीनियर पिरामिड मास्टर हमारे घर आए। उन्होंने पूरे परिवार के साथ मुझे भी बिठा कर ध्यान कराया और मेरी शंकाओं का भी समाधान किया। उसके बाद से तो एक के बाद एक मास्टर मिलते गए और उनके अनुभवों से मैंने बहुत कुछ जाना भी।

 

एक दिन हैदराबाद से एक सीनियर पिरामिड मास्टर भुवनेश्‍वर आए थे। उन्हें सुनकर भी बहुत आनन्द मिला। वे स्वयं पहले नास्तिक थे पर ध्यान में आने के बाद उन्होंने अपने कई पूर्व जन्म देखे। हमें भी उन्होंने ध्यान में ले जाकर पूर्व जन्मों के दर्शन कराए। उनके निर्देशानुसार मैंने भी अपना पूर्व जन्म देखा जहाँ मैं एक पंजाबी महिला थी।

 

मैं अपने अनुभवों के आधार पर कह सकती हूँ कि ध्यान साधना द्वारा हम अपने ही जीवन के स्वामी खुद बन सकते हैं। मैं पत्री सर के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहूँगी जिन्होंने सभी को जीवन जीने की कला सिखाई है। मेरा उन्हें कोटिशः प्रणाम।

 

कान्ता जैन
कटक

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