" ध्यान युग "

 

मैं, किरन अग्रवाल, पंजाब में रहने वाली हूँ। सन्‌ 1959 में मेरा जन्म पंजाब के लुधियाना जिले में हुआ। मैं एक गृहिणी हूँ। मेरे दो बेटे और एक बेटी है। मैं बचपन से आत्म विश्‍वासी हूँ और हर काम बड़े दृढ़ संकल्प के साथ करती हूँ। मेरे माता-पिता भी बड़े संस्कारी और सेवा भाव वाले थे। शादी के बाद घर भी धार्मिक संस्कारों वाला मिला। हम अपने परिवार में बहुत खुश थे। मुझे सत्संग में जाना बहुत अच्छा लगता था, लेकिन पाठ करने के लिए एक स्थान पर मैं दस मिनट भी नहीं बैठ सकती थी। बस ज्योत जलाई, माथा टेका, बस हो गई पूजा। राधा स्वामी सत्संग पर जाना शुरू किया, मन को शांति मिल जाती, वहाँ पर जाकर लगा कि हमारा जीवन है क्या ?

 

इसी तलाश में अपने आप से प्रश्‍न पूछने शुरू कर दिए कि अगर सब कुछ हमारे अन्दर है तो बाहर हम माथा टेककर किसको ढूँढते है ? अपने अन्दर देखने की हमारी तीसरी आँख नहीं है, भगवान ने जो ये दो आँखें दी हैं, यह बाहर की दुनिया देखने के लिए दी हैं। हम बाहर के नजारों में ही खो जाते हैं। अन्दर देखने का समय ही नहीं नकाल पाते। फिर मेरे मन में बार-बार विचार आया कि मैं अन्दर यात्रा कैसे कर सकती हूँ ? और इस सुन्दर सृष्टि के पीछे किस महान शक्ति का हाथ है?

 

फिर अचानक एक दिन 30 जनवरी, 2006 को मैडम पद्‌माजी और मैडम सत्याजी की क्लास मोती नगर, लुधियाना में हुई और मैंने क्लास रचना गुप्ता के कहने पर मैंने लगाई। 40 मिनट की क्लास करके मुझे लगा कि आज से मेरा जीवन ही बदल गया। और मैंने 40 दिन लगातार आधा घंटे से शुरू करके कई घंटों तक ‘आनापानसति ध्यान’ किया। रोज नए-नए अनुभव होने लगे। कई दृश्य दिखाई दिए, कई तरह के रंग दिखाई दिए, शिरडी बाबा के दर्शन हुए और भी बहुत सारे। मेरे को एक लालच सा हो गया, मैं जब भी समय लगता ‘आनापानसति ध्यान’ में बैठ जाती। मेरी माईग्रेन 20 साल पुरानी थी, वह भी ठीक हो गई, हाई ब्लड प्रेशर था, रोज की 10-10 दवाइयाँ खाती थी, सब छूट गईं। इससे मुझे आनन्द आने लगा।

 

जब कभी मन में कोई विचार होता है या कोई परेशानी, उसका सुझाव भी मुझे ध्यान में मिलने लगा। फिर मेरे मन में विचार आया कि क्यों न यह संदेश मैं लोगों तक पहुँचाऊँ ? क्यों कि जिसका शरीर स्वस्थ है, उसके पास दुनिया की दौलत है। हम घर-घर घूमकर भिखारी क्यों बने? हमें तो अधिकारी बनना है।

 

एक दिन मैं अमृतसर से लुधियाना के लिए आ रही थी। रात के 8 बजे थे, मैं बिल्कुल अकेली थी, ड्राइवर गाड़ी चला रहा था। मैं अमृतसर से बाहर निकलकर ‘आनापानसति ध्यान’ में बैठ गई। मैंने सोचा कि वह गाड़ी चला रहा है, मैं ध्यान कर लेती हूँ। हम जब ध्यान में बैठते हैं, तो हमारा शरीर भी एक पिरामिड बन जाता है, उससे इधर-उधर की कोई भी चीज का उस पर असर नहीं होता, यही मेरे साथ हुआ। लगभग 40-50 मील आगे जाकर हमारी गाड़ी की टक्कर हो गई और गाड़ी की छत नीचे आ गई, गाड़ी आगे-पीछे से सारी टूट गई, सारे शीशे टूट गए। सारा सामान और सारा काँच मेरे ऊपर आ गया। मैं ध्यान में ऐसे बैठी रही और एकदम से जब मेरा ध्यान टूटा, मैं ड्राइवर से पूछने लगी कि क्या हुआ है? जब मैंने उसको देखा तो वो खून से लथपथ था। उसको लोग हस्पताल ले गए, सिर में 100 टाँके लगे। पुलिस आ गई, लेकिन मुझे जरा सी चोट भी नहीं आई। वहाँ पर सभी लोग कह रहे थे कि, " बहन जी, यह तो चमत्कार हो गया। इतनी जबरदस्त दुर्घटना हुई और आपको जरा सी भी खरोंच नहीं आई ! " यह है ध्यान की दिव्य अनुभूति !!!

 

एक दिन मैंने फ्लूट मैडिटेशन की सी.डी लगाई और ध्यान में बैठ गई, ध्यान में ऐसी गहराई में चली गई कि अपने आपका भी होश नहीं रहा। इतने में मैंने देखा कि कोई सफेद दाढ़ी वाला आदमी कुर्ता-पज़ामा पहना हुआ है, वो मुझे ध्यान करवा रहा है। मैंने सोचा कि यह पता नहीं कौन है? इसको मैंने पहले तो कभी देखा नहीं| मैं बहुत हैरान हो रही थी। इतने में मैंने रचना को अपना अनुभव बताया। उन्होंने मुझे पत्रीजी की फोटो दिखाई, जब मैंने फोटो देखी तो एकदम हैरान हो गई, कि यही तो थे। क्यों कि मैं अभी पत्रीजी से मिली नहीं थी। फिर थोड़े दिनों के बाद पत्रीजी लुधियाना आए और मैंने 8-10 दिन पत्रीजी से क्लास ली। उनके साथ ही रहने से मेरे को इतना आनन्द आ गया कि मैं बता नहीं सकती। अगर हम विश्‍वास के साथ ध्यान करें तो हम अपनी इच्छाओं को खुद पूरा कर सकते हैं। और इससे हमें इतना ज्ञान हो जाता है कि हमारे लिए क्या अच्छा है, क्या नहीं। अपने जीवन के बदलाव को देखकर मैंने लोगों को सिखाना शुरू कर दिया। मैंने सोचा कि प्रभु की कृपा से पत्रीजी ने जो हमें अमृत पिलाया है, हम भी लोगों को पिलाने की कोशिश करते हैं। ताकि लोग भी इस अमृत का आनन्द ले सकें।

इस दुनिया में हर इंसान इतना थका हुआ है, इतना परेशान है कि जीवन में आराम नाम की कोई चीज ही नहीं है। बचपन खेलने में, शादी के बाद बच्चों के पालन-पोषण में, बुढ़ापे में शरीर ही जवाब देना शुरू कर देता है। अपने लिए तो उसके पास समय ही नहीं निकलता।

 

हमें अपनी जिन्दगी नीरस और बेरंग सी लगने लगती है। हमें अपनी जिन्दगी को खुशहाल बनाना चाहिए। अगर अभी भी हम अपनी आँखें नहीं खोलेंगे, तो जैसे आए हैं, वैसे ही दुनिया से चले भी जाएँगे। जैसे समुद्र अपार जलराशि के लिए एक छोटा सा प्याला उपयुक्त पात्र नहीं है। उसी प्रकार यह सीमित मानव मन अपने में, सार्वभौमिक, कूटस्थ चैतन्य को समाविष्ट नहीं कर सकता। किन्तु जब ध्यान के द्वारा कोई अपने मन का विस्तार करता जाता है तो अन्त में वह सर्वज्ञता प्राप्त कर लेता है। वह उस दिव्य ज्ञान से एकाकार हो जाता है, जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। जब हम अपने लिए नहीं, बल्कि ईश्‍वर के लिए कर्म करते हैं तो वह भी ध्यान की भाँति उत्तम है। तब कर्म हमारे ध्यान की और ध्यान हमारे कर्म की सहायता करता है।

 

जब हम आँखे बन्द करके ध्यान में बैठते हैं, तो यह शरीर एक ब्रह्माण्ड हो जाता है। क्यों कि अन्दर से हमारी चेतना इतनी विस्तृत हो जाती है कि हमारी सारी अज्ञानता नष्ट हो जाती है और इनको बन्द आँखों के अंधेरे के पीछे दिव्य ब्रह्माण्डीय प्रकाश दिखना शुरु हो जाता है। जो हमारी जिन्दगी में उजाला कर देता है।

 

मैंने जो कुछ पाया है, मैं आज आप सब लोगों तक यह सन्देश देना चाहती हूँ कि ध्यान ज्यादा से ज्यादा करके अपने मन को शांति पाकर सन्तुष्ट करो और प्रभु के आनन्द की भूख को और बढ़ाओ। अगर गहरे ध्यान में डूब जाओगे, यह मन आध्यात्मिकता की ओर झुकता जाएगा। मन शांत हो जाएगा तो हर काम शीघ्र, अधिक एकाग्रता तथा कौशलता से कर सकोगे। अपनी अन्तरात्मा को जगाओ, ध्यान करके ! हमारा सूक्ष्म शरीर जो सोया पड़ा है उसको हम ज्ञान और ध्यान से जगाकर मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं !!

 

मैं तो पत्रीजी का बहुत धन्यवाद करती हूँ। जिन्होंने मुझे यह रास्ता दिखाया और उन्होंने जो यह लक्ष्य रखा है कि ध्यान आन्ध्र प्रदेश 2004, ध्यान भारत 2008 और ध्यान जगत के लिए 2012 का, मुझे पूर्ण विश्‍वास है कि ब्रह्मर्षि पत्रीजी का यह महान लक्ष्य जरूर पूरा होगा। मैं भी पत्रीजी से यह प्रण करती हूँ कि जब तक मेरी जिन्दगी रहेगी, मैं ध्यान करती रहूँगी और ज्यादा से ज्यादा करवाती रहूँगी।

 

मेरे सभी ध्यानी मित्रों और पाठकों के लिए यह संदेश है कि अपने दिव्य चक्षु में गहरी डुबकी लगाकर तुम अन्तर्जगत्‌ के आश्‍चर्य में मग्न होकर चतुर्थ आयाम के दर्शन करो। वहाँ पहुँचना कठिन तो है, लेकिन बहुत सुन्दर है !

 

किरन अग्रवाल
लुधियाना

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