" भगवान का साम्राज्य आपके अन्दर है "

 

मैं महेश चण्डीगढ़ से हूँ। मैं एअरफोर्स में आफिसर हूँ। मुझे साईनस (नाक की अलर्जी) की प्राब्लम थी। मुझे गले की इन्‍फ़ेक्शन भी रहती थी। उसके लिए मैं हर रोज एक घंटा प्राणायाम करता था। मुझे थोड़ी देर ठीक लगता फिर वही अलर्जी तंग करने लगती।

 

मैंने अपने-आप ही ध्यान में बैठने की सोची। पर दस मिनट से ज्यादा मैं बैठ नहीं पाता था। एक दिन मेरे दोस्त रामराजू जोकि मेरे साथ एअरफोर्स में है, मुझे ध्यान के बारे में बताया। मैंने उसकी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। मैंने सोचा जितने लोग उतनी बातें। उसने मुझे कहा कि उसके बाद बहुत सी आध्यात्मिक किताबें भी है।

 

उसने मुझे " हिमालयन गुरु " स्‍वामी रामा द्वारा लिखित और " तुलसीदल " ब्रह्मर्षि पत्रीजी द्वारा लिखित किताबें पढ़ने के लिए दी। जैसे ही मैंने " हिमालयन गुरु " किताब पढ़नी शुरू की मैं उसमें गुम होता गया। उस किताब ने मेरी जिन्दगी ही बदल डाली। 24 दिसम्बर को मैंने रामराजू के पास जाकर ध्यान सीखने की इच्छा जाहिर की। उसने मुझे ध्यान सिखाया। ध्यान करना इतना सरल है मुझे नहीं मालूम था। मैंने 40 मिनट ध्यान करना शुरू किया। तीन दिनों में ही मेरी साईनस (sinus) problem ठीक हो गई। मैं बहुत हैरान हुआ। दस दिन लगातार नियमित ध्यान करने से मेरी गले की इन्फेक्शन भी ठीक हो गई। मेरा ध्यान में विश्‍वास बढ़ने लगा। जब भी वक्त मिलता मैं ध्यान में बैठ जाता।

 

सात महीनों में मेरी रीढ़ की हड्‌डी सम्बन्धित विकार भी 90% ठीक हो गया। यह सब दवाईयों से नहीं आनापानसति ध्यान द्वारा ठीक हुआ। ध्यान करने से मेरी सोच-विचार की शक्ति में भी बदलाव आने लगा, नकारात्मक सोच की जगह, सकारात्मक सोच ने ले ली, सकारात्मक सोच की जगह, चमत्कारिक सोच ने ले ली। मेरी वाणी में अब आत्मविश्‍वास उजागर हो गया था। हर बात को मैं अब बहुत तोल कर बोलता, व्यर्थ की बातें मैंने बंद कर दी। एक बार मैं ब्रह्मर्षि पत्रीजी की सी.डी सुन रहा था, उनकी आवाज सुनकर मुझे लगा कि मैं उन्हें जानता हू। मैं आँखें बंदकर, ध्यान में बैठ गया। मैंने देखा कि मैं कई जन्मों में पत्रीजी के साथ था।

 

4 जनवरी रात को मैं ध्यान कर रहा था, मेरी साँस छोटी होती हुई बिल्कुल बंद हो गयी। मेरी धड़कन बहुत तेज हो गई। मेरा सारा शरीर काँपने लग गया। मैंने देखा मेरे ऊपर एक तेज सुनहरी रंग की रोशनी आ रही है, वह मेरे शरीर में प्रवेश कर रही है। मैंने डर से आँखें खोल दी, आँखे खोलने पर देखा कि मेरे कंप्यूटर स्क्रीन सी.पी.यू आदि सब में भी ऊर्जा प्रवेश कर चुकी है वह सब भी हिल रहे थे। कोई दैविक शक्ति ने मेरे अन्दर प्रवेश किया था और उसकी ऊर्जा से कमरे में जितनी चीजें थी उनमें भी ऊर्जा आ गई थी। पाँच मिनट बाद सब कुछ नार्मल हो गया।

 

फरवरी में मैं रामराजू के साथ लुधियाना पिरामिड ध्यान केन्द्र गया। वहाँ पर 11 बजे से शाम 5 बजे तक एक दिन की वर्कशाप थी, हैदराबाद से श्रीमति गिरिजा व श्री राजन जी आये हुए थे, हम लोग थोडी जल्दी पहुँच गये। तब तक हम लोग पिरामिड के नीचे बैठ गये और ध्यान करने लगे। ध्यान में मैंने अपना पिछला जन्म देखा, मैंने देखा मैं तिब्बत में हूँ और एक बौध्द भिक्षु हूँ। मैंने अपने साथियों में एक दो के चेहरे देखे जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा था।

 

जैसे ही मैं ध्यान से उठा मैंने ध्यान केन्द्र में औरत को देखा। मैंने रामराजू को बताया कि इस औरत को मैंने ध्यान में देखा है यह मेरे साथ तिब्बत में थी। इस जन्म में इनका नाम रचना हैं। रामराजू हैरान रह गया। उसने मुझे रचना जी से मिलवाया। मैं उनको मिलकर बहुत खुश हुआ। जब रचना जी ने अपना ध्यानानुभव सुनाया कि उन्होंने अपने पिछले जन्म देखे है और एक जन्म में वह तिब्बत में थी तो मेरी सारी शंकाएँ निकल गई, और मुझे अपने ध्यानानुभव पर और भी विश्‍वास हो गया।

 

एक दिन मैंने ध्यान में बहुत विशाल पीपल का पेड़ देखा। उस पर बहुत से धागे बंधे हुए थे, तिलक लगा हुआ था, दीपक जल रहा था। मैंने वृक्ष से पूछा क्या आपमें भगवान का निवास है, जोकि लोग आपको इतना पूजते हैं। आपकी परिक्रमा करते है, पेड़ हँसकर बोला " मेरे पत्तों से शुध्द आक्सीजन निकलती है, जोकि विश्‍व ऊर्जा है। हर प्राणी को जीवित रहने के लिए विश्‍व ऊर्जा चाहिए। मेरे नीचे बैठने से वह शक्ति भण्डार में मिलती है। जब लोग परिक्रमा करते हैं तो उनकी साँसे तेज हो जाती है और शुध्द वायु तीव्र गति से उनके अन्दर जाकर सारी बीमारियाँ बाहर निकाल देती है। यह ऊर्जा ही भगवान है।

 

अगर कोई ध्यानी मेरे नीचे बैठकर 40 दिन ध्यान करे तो उसके समस्त रोग ठीक हो सकते हैं। यह ध्यानानुभव के बाद मैं प्रकृति के और करीब हो गया। जब भी मौका मिलता है मैं पेड़ पौधों के समीप बैठ कर उनकी ऊर्जा को महसूस करता हूँ। प्रकृति से हमें बहुत सारी विश्‍व ऊर्जा मिलती है। 15 अप्रैल को मेरा जन्म दिन था। उस दिन मैं बहुत खुश दिया। मैं अपना जन्म दिन अपने दोस्तों के साथ मनाना चाहता था, मैं थोड़ी देर ध्यान में बैठ गया। तभी मेरे अन्दर से आवाज आई कि " कौन सा जन्मदिन मनाओगे? तुमने कितने ही जन्म लिए हैं, सही ढंग से जन्मदिन मनाओ कि दोबारा जन्म ही न लेना पड़े। जिस काम के लिए तुम्हारा जन्म हुआ है वह काम करो। आगे बढ़ो और लोगों को ध्यान सिखाओ। "

 

मैं ध्यान से उठकर बहुत बेचैन हो गया। मैं अपनी पत्नी के साथ " मनसा देवी " मन्दिर गया। वहाँ जाकर उपस्थित लोगों को ध्यान के बारे में बताने लगा और उन्हें भी ध्यान सिखाया। मुझे बहुत आनन्द आया। मुझे लगा मैंने आज अपने जन्म दिन को सार्थक कर दिया। यह मेरा सब से अच्छा जन्म दिन था।

 

एक बार मैं हरिद्वार गया। वहाँ पर मैंने गंगाजी में स्नान किया। जैसे ही मैं जल में उतरा मैंने जल की उर्जा महसूस की। जल मुझे ऊर्जा दे रहा था और मैं जल को। मैंने बहुत सी ऊर्जा महसूस की। मुझे ऐसा लगा कि गंगा में स्नान कर के मैं पवित्र हो गया हूँ। जब आप ध्यानी बन जाते है तो आपको हर चीज में ऊर्जा महसूस होने लगती है। स्नान के बाद मैं होटल में आकर ध्यान में बैठ गया। ध्यान में मेरे समक्ष गंगा-माँ एक काँसे के बर्तन में जल लेकर मुझ पर छिड़क रही थी और कह रही थी कि उन्होंने मेरा आना स्वीकार कर लिया है। मैंने हरिद्वार में भी लोगों को ध्यान सिखाया और मेरा हरिद्वार आना सफल हो गया।

 

जैसे यीशु (Jesus) ने कहा है कि " भगवान का सम्राज्य आपके अन्दर है, अन्दर आओ और देखों " यह बात मैंने अच्छी तरह समझ ली है। आँखे बंद करके अपने साँसो के साथ रहते हुऐ, अन्दर जायें और साक्षात उस साम्राज्य के दर्शन कीजिए। सब कुछ हमारे अन्दर है, यह सब के लिए है। सब को अन्दर जाना चाहिए। मैं आज शारीरिक रूप से, मानसिक तौर पर और आध्यात्मिक स्तर पर बहुत खुशहाल व्यक्ति हूँ। मुझे अपने जीवन का मकसद पता चल गया है। वह है लोगों को ध्यान के बारे में बताना और शाकाहारी बनने की प्रेरणा देना। जब तक हम आत्म-ज्ञानी नहीं बनेंगे, तब तक हमारा जीवन व्यर्थ है। अगर आप अपने जीवन को सार्थक करना चाहते है तो ध्यान कीजिए और ध्यान सिखायें।

 

 

महेश
चण्डीगढ़

संपर्क : +91 9257257207

Go to top