" ध्यान हमें अंधकार से प्रकाश में लाता है " 

 

मैं ममता सिंह हूँ। एक मध्यवर्गीय परिवार में मैंने जन्म लिया। बाहरी दुनिया की बहुत सी बातों से अनभिज्ञ ही मेरी शिक्षा - दीक्षा हुई। मेरे पिता एक साधारण कर्मचारी हैं तथा मेरी माँ एक राजकीय विद्यालय में शिक्षिका। पाँच भाई बहनों में मैं सबसे बड़ी और बचपन से ही ज़िम्मेवार।

 

पढ़ने में मैं कुशाग्र थी। मेरे माता - पिता शिक्षा के प्रति श्रध्दा रखते थे इसलिए उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा पढ़ाई में ही खर्च होता था। मैं अपनी शिक्षा के प्रति काफ़ी गम्भीर थी लेकिन न जाने क्यों मंज़िल पर आते - आते मैं कहीं रुक जाती थी। बनना तो डॉक्टर चाहती थी पर मेडिकल में सिलेक्शन न होने के कारण ऐसा हो न सका। मैंने एम. एससी. किया जिसमें मेरा एक स्पेशल पेपर था organic chemistry का। आज मैं खुद एक शिक्षिका हूँ। मेरा आठ वर्ष का बेटा है और मेरे पति MNC में जॉब करते हैं और उनका स्वभाव बहुत अच्छा है।

 

अब मैं अपने स्वभाव की बात करती हूँ। मैं बचपन से ही बड़ी शांत रहती हूँ और हर चीज़ की परख करती रहती हूँ। मुझे हर व्यक्ति, जिसे ईश्‍वर ने बनाया है, अच्छा लगता है। मुझे कोई बुरा नहीं लगता, न ही मैं किसी को बुरा बोलती हूँ। शुरू से ही मुझे शांति में रहना और शांत जगह पर रहना बहुत पसन्द है। हमारे घर के बगल में एक जैन मंदिर था, मैं अक्सर वहाँ जाकर बैठती और कविताएँ लिखा करती थी। जब मैं एम. एससी. कर रही थी तो मेरे साथ एक अजीब घटना घटी। मैं अपने एक प्रोफ़ेसर के घर ट्‌यूशन पढ़ने जाया करती थी। रास्ते में एक चर्च पड़ता था। रविवार के दिन वहाँ प्रार्थना होती थी और मैं उसमें ज़रूर शामिल होती थी। चर्च के पादरी भी उसी कैम्पस में रहते थे। एक दिन मैंने देखा कि वे घर के बाहर बैठे पेपर पढ़ रहे थे। मैंने उन्हें अभिवादन किया किसका उत्तर उन्होंने सिर्फ़ सिर हिला कर दिया। मैंने देखा उनके चेहरे पर एक ऐसा तेज था जो आम आदमी के मुख पर दिखाई नहीं देता। मैं वहाँ खड़ी रही। सामने एक बाल्टी और एक मग पड़ा था। पादरी जी ने इशारे से पौधों में पानी डालने को कहा। मैंने डाल दिया। फिर तो यह प्रत्येक रविवार का काम हो गया। उन्होंने इसके अलावा मुझसे कभी कुछ और नहीं कहा। छुटिटयों में मैं अपने घर आ गई। मेरी छोटी बहन, जो खुद भी हॉस्टल में थी, को जब मैंने यह बात बताई तो उसने मुझे फिर से वहाँ जाने से रोका पर जब मैं लौटकर हॉस्टल गई तो फिर वही सिलसिला शुरू हो गया और तब तक चला जब तक मैं वहाँ ट्‌यूशन के लिए जाती रही।

 

मुझे यह बात कभी समझ नहीं आई कि मैं उस पादरी की बात को क्यों मानती हूँ? मैं क्यों उन पौधों में पानी डालती हूँ? आज इस बात को बारह साल हो गए हैं। जीवन बीतता रहा, घर - गृहस्थी के कामों में बहुत कुछ पीछे टूट गया पर मुझे उस शान्ति की तलाश अभी भी थी।

 

एक दिन मुझे पता चला कि हमारी सोसायटी में एक श्‍वेता मैडम हैं जो ध्यान सिखाती हैं। मेरा सात साल का बेटा वहाँ पहले गया और उसने मुझे वापिस आकर वहाँ जाने को प्रोत्साहित किया। मैंने श्‍वेता मैडम से ध्यान का तरीका सीखा और रोज़ करने भी लगी। दो - तीन दिन बाद ही मुझे बहुत अच्छे visions आने लगे। मेरे visions में अक्सर गौतम बुध्द आते। जब मैंने मैडम को बताया तो उन्होंने मुझे किसी monastry में जाकर आने को कहा। मेरे आसपास तो ऐसी कोई जगह थी नहीं पर मेरी इच्छा बहुत थी कि मैं वहाँ जाऊँ। अचानक हमारा प्रोग्राम काँगड़ा और धर्मशाला जाने का बन गया। मैंने वहाँ वह सब देखा जो कभी कल्पना भी नहीं की थी। ध्यान के द्वारा मेरा सपना पूरा हो गया था।

 

 मैंने अपने अनुभव मैडम से बाँटे। श्‍वेता मैडम तो लुधियाना लौट गईं, उन्होंने मेरा परिचय पल्लवी मैडम से कराया और आज मैं इस ध्यान से जुड़ी हुई हूँ।

 

 ध्यान में आने से पहले मेरी ज़िन्दगी मानो एक गुफा में चल रही थी जहाँ सिर्फ अंधेरा था लेकिन अब उसके अन्तिम छोर तक प्रकाश नज़र आ रहा है। ध्यान करने और उसे जीवन के हर पहलू में उतारने की आवश्यकता है।

 

ध्यान हमारे जीवन को पूरी तरह बदल देता है। बुरी चीज़ों, बुरी बातों के पीछे हम नहीं भागते। अब तो लगता है जहाँ से भी ज्ञान मिलता है, उसे अंगीकार करना चाहिए। मनुष्य की यही कमज़ोरी है कि वह जान ही नहीं पाता कि वह खुद है क्या? खुद को समझने में ही पूरी ज़िन्दगी बीत जाती है। ध्यान में आकर ही मैंने यह जाना कि हमें अपने जीवन को समर्पित कैसे करना चाहिए। मैंने अपने अन्दर अनेक बदलाव देखे। अब मुझे गुस्सा भी कम आने लगा, मैंने अपने फैसले खुद लेने शुरु किए, यह मेरी खुद पर एक जीत है। ध्यान की एकाग्रता से जीवन में भी एकाग्रता आती है। हम लोगों को उनकी विशेषताओं के साथ जोड़ते हैं। बोलते वक्त अब यह सोचते हैं कि उसे अच्छा लगेगा या बुरा। मैं तो ध्यान को पूरी तरह स्वीकार कर चुकी हूँ और आने वाले दिनों में इसकी शुभ फलदायिनी शक्ति को भी प्राप्त करूँगी।

 

 ध्यान क्या है !

जीवन की सत्य हैं साँसें
जिनसे हमारा प्राण बना है,
आत्मा उसी से जुड़ी है
इस विज्ञान को समझना ही ध्यान है।

 हम चाहे जिस भी रूप में जीते हैं
जीने की कला हमने नहीं सीखी अब तक।
जीवन के बाद मृत्यु, यही समझते रहे
लेकिन जीवन और मृत्यु दोनों सत्य हैं।
इस ज्ञान को समझना ही ध्यान है।

मृगतृष्णाओं के पीछे जीवन भर भागते हैं,
भौतिक वस्तुओं की आकांक्षा लिए जीते हैं।
कभी भी समझ नहीं पाते जीवन की ज़रूरत 
श्‍वास हमारे जीवन की सर्वोपरि ज़रूरत है
इस श्‍वास को समझना ही ध्यान है।

 

 

ममता सिंह
गुड़गांव

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