" मार्गदर्शन के लिए शत - शत नमन "

 

मैं मनोज शुक्ला हूँ। मेरा जन्म रांची में 1967 में हुआ। आरंभिक शिक्षा वहीं पर हुई। मैंने भागलपुर यूनिवर्सिटी से तकनीकी क्षेत्र में ग्रेजुएशन किया और फिर एल.एल.बी. भी पास किया। अब कानपुर में रहता हूँ।

 

अपने बाल्यकाल में मैं अपनी पढ़ाई में जब एकाग्र होने की कोशिश करता था तब न जाने क्यों मन टिक नहीं पाता था। मैं कभी मंदिरों में जाता, कभी पीर बाबा की मज़ार पर जाकर मन्नतें माँगता पर मन की भटकन समाप्त नहीं होती थी। खैर, पढ़ाई पूरी की। अब सोचने लगा कि बस अब तो नौकरी करूँ और बस घर बसा लूँ। चक्रधरपुर स्थित ब्रिटानिया के प्लांट में नौकरी मिल गई। कुछ दिन बाद मन बेचैन हो गया। तभी इंडियन ऑर्डिनेंस फैक्टरी में मुझे काम मिल गया। वहाँ भी मन नहीं लगा। सोचा, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव का काम करता हूँ। वहाँ मैंने कुछ समय काम किया, इसी सिलसिले में मुझे अक्सर रांची, धनबाद, मुज़फ़्फ़रपुर, बक्सर का दौरा करना पड़ता था। मन फ़िर अपनी पुरानी चाल पर आ गया। नौकरी छोड़कर कानपुर आ गया जहाँ मैंने स्डर - स्कूटर फैक्टरी में काम करना शुरु किया। मेरे घर के लोग मेरे लिए परेशान थे। एक तो घर से दूर और मानसिक रूप से परेशान था, उन्हें भी मेरी चिंता सताती रहती। कभी मुझे झाड़ - फूँक के लिए कहीं ले जाते, कभी मंदिरों में पूजा - पाठ कराते, कभी मोती पहनाते। इसी तरह मैं Bihar School of Yoga, Mungher गया। वहाँ मैंने कुछ योग सीखा, कमरे में दीपक की लौ को देखते रहकर ध्यान का अभ्यास किया। इससे मुझे कुछ तो आराम मिला। समस्या यह भी थी कि नौकरी कानपुर में थी और मैं कहीं और। कभी वहाँ जाता कभी घर वापिस। कानपुर में एक नहीं, तीन - चार नौकरियाँ बदल डालीं। क्या करूँ, हार कर नौकरी का इरादा ही छोड़ दिया और ट्‌यूशन करने लगा। घर - घर जाकर बच्चों को पढ़ा कर जीविका चलाने लगा। पर क्या पूरी ज़िन्दगी इसी तरह भटकते बीतेगी? यह सोचकर मन और परेशान हो गया। एक प्राइवेट कम्पनी में नौकरी करने लगा।

 

वर्ष 2008 में मैं आगरा में श्री चंद्रशेखर रेड्‌डी से मिला। हम दोनों बैठे क्रिकेट - मैच देख रहे थे। अचानक उन्होंने मुझसे पूछा कि ध्यान करते हो क्या? मैंने कहा कि रोशनी की लौ को देखकर कभी - कभी ध्यान करता हूँ। उन्होंने मुझे आनापानसति ध्यान के बारे में विस्तार से बताया और उसी वक्त ध्यान करने को कहा। मैं बैठ तो गया पर आँखें बन्द कर साँसों को मन की आँखों से देखना व महसूस करना कठिन लग रहा था। मन विचलित होने लगा, क्यों बैठ गया मैं ध्यान में। अच्छा भला मैच देख रहा था पर आँखें खोलता कैसे जबकि चंद्रशेखर जी निरंतर कह रहे थे - आँखें नहीं खोलना, अपने भीतर - बाहर जाते - आते साँस पर ध्यान रखो। मरता क्या न करता। बैठा रहा, तभी अचानक मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मैं आकाश में तैर रहा हूँ, कभी नीचे आ रहा हूँ, कभी ऊपर जा रहा हूँ। मुझे कोई ध्वनि सुनाई नहीं दे रही थीं। फिर लगा कुछ लोगों के साथ पहाड़ों के बीच घूम रहा हूँ। कभी झील कभी जंगल नज़र आ रहे थे। समय का पता ही नहीं चला, पचास मिनट हो गए थे और श्री रेड्‌डी मुझे ध्यान से बाहर आने को कह रहे थे। उन्होंने निर्देश दिया कि आँखों पर हथेलियाँ रखो और आँखें खोलो पर मेरा मन ही नहीं हो रहा था कि मैं आँखें खोलूँ। मुझे ध्यान की शक्ति का पता चला। अब मैंने नियमित रूप से ध्यान करना शुरु किया। मेरे व्यक्तित्व में कई बदलाव आए - मेरा आत्मविश्‍वास बढ़ गया, सहनशक्ति बढ़ गई, मन एकाग्र होने लगा। मन का भटकाव समाप्त हुआ। मेरी प्रतिष्ठा बढ़ने लगी, कार्यक्षमता में वृध्दि होने लगी, घर का वातावरण सहज होने लगा और धीरे धीरे मन शांत और आनंदपूर्ण रहने लगा। अब मुझे लगने लगा कि मुझे और लोगों को भी ध्यान करना चाहिए ताकि वे भी आनंदपूर्वक रह सकें।

 

धीरे - धीरे मैंने अपने आसपास के लोगों तथा मित्रों को ध्यान सिखाया तथा कई लोगों को ध्यान के लिए प्रेरित किया। इन्हीं दिनों हैदराबाद से श्री रमैया जी सात दिनों के लिए कानपुर आए। उन्हें लेकर मैं कई स्कूलों, मंदिरों में गया जहाँ उन्होंने लोगों को ध्यान करना सिखाया। हम डिफेंस वालों के गेस्ट हाउस भी गए जहाँ अधिकारियों को भी ध्यानाभ्यास कराया। सभी को अच्छा लगा। मेरे मन में इच्छा हुई कि पत्रीजी को कानपुर बुलाया जाए, मैंने कार्यक्रम बनाना शुरु किया। जल्दी ही मेरा प्रयास सफल हुआ और उनका कानपुर आने का कार्यक्रम बन गया। पत्रीजी एक दिन के लिए आए। उन्होंने यहाँ सोसायटी के केन्द्र का उद्‌घाटना किया। स्कूल के बच्चों को ध्यान करना सिखाया और उनके हाथों को पकड़ कर उन्हें ऊर्जा प्रदान की। बच्चों के अनेक सवालों के जवाब भी उन्होंने दिए।

 

इसी दिन शाम को ध्यान का एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया जहाँ ऑर्डिनेंस फैक्टरी के महाप्रबंधक तथा अन्य अधिकारियों को परिवार सहित आमंत्रित किया गया। पत्रीजी ने स्वयं यह क्लास ली और सभी लोग आनन्दमग्न हो गए। धीरे - धीरे कानपुर में सोसाइटी के केन्द्र के साथ लोग जुड़ने लगे और मैं ध्यान प्रचार के कार्य को आगे बढ़ाने लगा। मुझे जब जब मौका मिलता मैं पत्रीजी के कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए पहुँच जाता। शोलापुर के कार्यक्रम में मैं सम्मिलित हुआ था, वहाँ मुझे तीन दिन के ध्यान यज्ञ के दौरान सम्मानित भी किया गया।

 

मैं न केवल कानपुर में बल्कि उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों में भी ध्यान प्रचार के कार्यों में भाग लेता हूँ। अभी अप्रैल के महीने में इलाहाबाद में मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कालेज में छात्रों तथा अध्यापकों को ध्यान के बारे में बताने के लिए मुझे बुलाया गया था। बहुत अच्छी तरह यह कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

 

आज मैं पीछे मुड़कर जब देखता हूँ तो खुद को ही यह यकीन नहीं होता कि क्या मैं वही इंसान हूँ जो शुरु में इतना भटक रहा था। आज मेरा जीवन पूरी तरह व्यवस्थित है। मेरी पत्नी तथा तीनों बच्चे भी ध्यान करते हैं और अन्य लोगों को भी सिखाते हैं। मैं गुरु जी के प्रति सदैव कृतज्ञ रहूँगा जिन्होंने न केवल मेरे व्यक्तिगत जीवन को सही रास्ता दिखाया बल्कि उसे प्रगति मार्ग पर आगे भी पहुँचाया। उन्हें मेरा शत शत नमन।

 

 

मनोज शुक्ला
कानपुर
संपर्क : +91 9839183424
 

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