" ध्यान से बडा काम और कुछ भी नहीं हैं "

 

मेरा नाम नरेन्द्र मुदलकर है|

 

मैं हैदराबाद आन्ध्र प्रदेश का निवासी हूँ। मैंने एम.काम. किया हुआ है। मैं रेडिमेड कपड़ों का काम करता हूँ। मैंने 1989 से आध्यात्मिकता से जुडा हुआ हूँ। मैंने यह जानने के लिए कि आध्यात्मिकता क्या हैं, दो साल मुंबई में पांडुरंग शास्त्रि, तत्व ज्ञान विद्यापीठ, ठाणे से पढाई की। सर्टिफिकेट भी हासिल किया लेकिन उस डिग्री का भौतिक जीवन से कोई संबंध भी नहीं है क्योंकि मुझे बचपन से ही ‘आध्यात्मिकता क्या है’ यही प्रश्‍न मन में बार-बार आता था। मुझे लगता था कि मनुष्य जन्म केवल खाने, पीने, सोने के लिए नहीं है। इसके अलावा हमारे जीवन का कुछ और भी मकसद है। वह क्या मकसद है वो मैंने स्वाध्याय से सीखा।

 

आज मानव समाज पीड़ित है, परेशान है इसका कारण कुछ और नहीं है केवल हम ही हैं, क्योंकि हम ने कभी सोचा ही नहीं कि इस जगत से हमारा क्या संबंध है। जीव, जगत और जगदीश का आखिर क्या संबंध हो सकता है ? हमारा शरीर किस तरह से काम कर रहा है? उसका रक्त कौन बना रहा है? शक्ति कैसे आ रही है? नींद कैसे आ रही है। इन सब के बारे में जब मैंने सोचना शुरू किया तो मुझे इन सब सवालों के जवाब चाहिए थे।

 

मैंने गायत्री देवी से प्रार्थना की और विश्‍वास रख कर गायत्री जाप करना शुरू कर दिया कि गायत्री देवी आप ही मुझे इन सवालों के जवाब दोगी। जिस दिन पाँच लाख जाप पूर्ण हुआ, उसी अंतिम दिन सुबह करीब 3:45 बजे मैं जाप करते-करते गहरी सी शांति में चला गया, जैसे एक अजीब सी प्रकृति की गोद में समा गया। कब लेट गया पता ही नहीं चला और बेहोश सा हो गया। थोडी देर बाद एक स्त्री की पायल की आवाज सुनाई देने लगी और मुझे लगा कि वो स्त्री मेरी तरफ ही आ रही है फिर सोचा कि यह लड़कों का होस्टल है, यहाँ पर स्त्री कैसे आयेगी। थोडी देर में वो स्त्री मेरे पास आई और मुझे अपनी गोद में ले लिया। वह स्पर्श मुझे आज भी याद है।

 

फिर तुरन्त आवाज आई ‘आँखे खोलो बेटा’ पहले तो मैंने आँखे खोलकर देखने की कोशिश की मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया, फिर धीरे-धीरे आँखे खोलकर उनकी ओर देखकर कहा कि ‘आप कौन हो?’ उस तेजस्वी स्त्री ने कहा ‘मैं गायत्री देवी हूँ’ इस तरह उन्होंने तीन बार बोला। मैंने पूछा माँ ‘मैं किस लिए इस सृष्टि में आया हूँ ? मेरा जन्म किस लिए हुआ हैं ?’ गायत्री माँ ने कहा ‘बेटा तू माँग जो चाहिए मैं तुझे दूँगी।’ फिर मैंने कहा ‘माँ मुझे बंगला, गाडी, पैसा, नौकर, चाकर की जरुरत नहीं हैं वह तो कैसे भी आ जाएंगे। वह सब ऐसी चीजें हैं, जो कभी भी छीनी जा सकती है। मुझे ऐसा कुछ दो जिसे कोई भी मुझ से छीन न सके।

 

गायत्री माँ ने कहा, ‘तेरा जाप पूरा हुआ अब जाप करने की आवश्यकता नहीं, अब तुझे ध्यान की आवश्यकता हैं। तू बहुत ही उच्च स्थिति को पाएगा, तेरा बहुत बड़ा कार्य है इस सृष्टि पर। तुझ से लाखों लोगों का उध्दार होगा।’ मैंने फिर पूछा कि ‘माँ ध्यान कैसे किया जाता हैं?’ गायत्री माँ ने कहा ‘तुझे एक सदगुरु मिलेंगे जो तुझे मार्ग दर्शन करेंगे।’

 

फिर माँ ने खुश हो कर कहा ‘कुछ भी माँग, मैं दूँगी’ फिर मैंने कहा ‘माँ अगर आप को कुछ देना ही है तो ऐसा करो कि मैंने आध्यात्मिकता के लिए ही जन्म लिया है। मुझे तेरा संस्कृति माँ का काम करना है, बस यही विनती है कि तू मेरे साथ सदा रहना ताकि मैं तेरा काम अच्छी तरह से कर सकूं। ‘तुरंत ही माँ ने कहा ‘तू लेने वाला नहीं देने वाला है’ तथास्तु कह कर गायब हो गई, यह वाक्य 1993 जुलाई का है।

 

फिर मैंने 1995 में मुम्बई से पढ़ाई पूरी की। हैदराबाद वापिस आ गया 1995 मई में मेरी शादी हो गई 1996 में मेरे लड़का हुआ। लेकिन मेरी जिज्ञासा पूरी नहीं हुई। मेरे मन में हर दिन यही सवाल होता था कि गायत्री माँ ने कहा था तुझे सदगुरु मिलेंगे, वो गुरु कहाँ पर है? भगवान से प्रार्थना करता कि मुझे वो सदगुरु जल्दी मिलें।

 

हमारे पडोसी छुटिट्‌यों में कर्नूल गये। उन्होंने वहाँ पर ‘कर्नूल बुध्दा पिरामिड सैंटर’ में ध्यान किया। हैदराबाद से लौटने के बाद उन्होंने मुझसे कहा " हमने वहाँ पर ध्यान किया हमको बहुत अच्छा लगा। आपको आध्यात्मिक दृष्टिकोण पसन्द है आप जाकर देखिए। "

 

तभी मैं अपनी माताजी एम.प्रमीला, मित्र श्री निवासाचारी के साथ चावल दाल, खाना पीना, राशन लेकर 8-10 दिन के लिए कर्नूल निकल पड़ा।

 

" साधूनाम दर्शनम्‌, पुण्यम्‌, रूपदर्शनम पाप नाशनम्‌
सभाषणाम्‌ सर्व तीर्थानी, वंदनम्‌ मोक्ष दायकम्‌ "

 

16.6.97 को 8 दिन के बाद जब हम घर लौटने के लिए तैयार होकर पिरामिड के गेट के बाहर निकले एकदम सामने से एक कार में ब्रह्मर्षि सुभाष पत्री जी आ रहे थे। उनको देखते ही हम लोग रुक गये, फिर पत्रीजी ने हमें अंदर बुलाया| हम अंदर चले गये।

 

जब मैं पत्रीजी के सामने बैठा तो उनके चेहरे की तेजस्विता और मुस्कान को देखकर लगा वे कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। जरूर जो गायत्री माँ ने कहा था वही सदगुरु जी है। मैंने मन ही मन उनको बारम्बार नमस्कार किया। मेरे मन में एक ही भाव गीत गुन गुना रहा था। वह यह था कि-

 

" सृष्टि दाता पत्री, तुझको वंदन बारम्बार।
मेरे जीवन निर्माता। तुझको वंदन बारम्बार।
सदा दिवाली लगती हम को तेरे साथ में।
अंधेरा टिक न पायेगा अब ज्योति जगे हृदय में।
शांति दाता पत्री। तुझको वंदन बारम्बार "

 

फिर पत्रीजी की दृष्टि मुझ पर पड़ी उन्होंने कहा " कितने दिन पाठशाला में रहेगा? अब कालेज में आजा, तेरा बहुत काम है तू प्रोफेसर की तरह काम करेगा। लाखों लोगों को ध्यान सिखाएगा। तू Military Officer है। " मुझे कुछ समझ नहीं आयाः फिर बहुत से लोगों से तालियाँ लगवाईं, उन्होंने कहा कि ‘हमारी सोसाइटी में एक जबरदस्त शेर आया है, मैं उसका स्वागत कर रहा हूँ।’ लेकिन मेरी समझ में कुछ नहीं आया उसके बाद हम लोग हैदराबाद वापिस आ गये। फिर हम सब रोज 10-15 मिनट ध्यान करने लगे और पत्री जी की किताबें पढ़ने लगे। फिर भी ध्यान पर मेरा पूरा विश्‍वास नहीं बना।

 

एक दिन अचानक मेरे ढाई साल के बेटे को बहुत तेज बुखार हो गया। खाने के बाद हम उस को डाक्टर के पास ले जाने वाले थे। मैं खाना खा रहा था मेरे साथ बैठा मेरा बेटा बिना किसी के कहे ध्यानस्थ हो गया और एक घंटा बैठा रहा। जब लड़का उठ नहीं रहा था तो सभी लोग डर गये। मैंने तुरन्त ही डाक्टर न्यूटन को बुलाया तो डाक्टर ने कहा कि इस को परेशान मत करो, यह अभी कृष्ण भगवान के साथ Astral travel कर रहा है थोडी देर में उठ जायेगा। मेरी माताजी और मेरी पत्नी रोने लगे। थोडी देर बाद जब वो उठा तो उसके चेहरे का तेज, आँखों की चमक को देखकर सब दंग रह गये। बुखार भी कम हो गया।

 

तब एक दिन पत्रीजी घर आये उन्होंने कहा कि ये आपका बेटा दुनिया को ध्यान सिखाने के लिए आया है। तब मेरा माथा ठनका कि एक ढाई साल का बेटा एक घण्टे तक बैठ सकता है तो हम क्यों नहीं कर सकते। उसके बाद मैंने रोज 3 घण्टे ध्यान करना शुरू किया। 40 दिन किया बहुत अच्छा लगा और आध्यात्मिकता की समझ आने लगी। एक बार मैं 18 घण्टे ध्यान में बैठ गया। तब मैंने अपना पिछला जन्म देखा। मैं पिछले जन्म में जर्मनी में हिटलर के साथ दूसरे विश्‍व युध्द में Military Officer था। मेरे हाथों कई लाखों लोग मारे गये। वह मेरा Negative कर्म था। उसी कर्मों को धोने के लिए मुझे यह जन्म मिला। लाखों लोगों को ध्यान सिखा कर उन कर्मों को पूरा करने आया हूँ। " This is the only purpose of life " फिर मैंने ध्यान प्रचार आरम्भ कर दिया। 1998 से गाँवों में लोगों को ध्यान सिखा रहा हूँ। कभी भी किसी से कोई पैसा नहीं लिया है। इसमें लेना देना बन्द है फिर भी आनन्द है, यही मेरी धारणा है। आज मेरा पूरा परिवार ध्यान परिवार है। सोमवार से शनिवार तक भौतिक जीवन, रविवार को आध्यात्मिक जीवन जीता हूँ। पास के 100-200 कि.मी. तक के गाँवों में झोंपड़ी-झोंपड़ी में और खोपड़ी-खोपड़ी में ध्यान भर कर आता हूँ।

 

आज के इस वैज्ञानिक युग में एक ही शास्त्र ध्यान शास्त्र, आध्‍यात्म शास्त्र सही दिशा दिखा सकता है, दूसरा और कोई रास्ता नहीं है। समाज की दरिद्रता केवल ध्यान से ही खत्म की जा सकती है। हमारा विज्ञान इतनी तरक्की कर चुका है लेकिन आध्यात्मिकता आज भी वही है। हमारे पुर्वजों ने पत्थर की पूजा की है तो वही आज हम लोग कर रहें है। लेकिन किसी ने सोचने की कोशिश ही नहीं की कि हम लोग जो कर रहे है वह सही है या गलत। आज करोड़पतियों से लेकर भिखारियों तक सब परेशान है। सब के मन में एक महाभारत रची हुई है, उसको कौन शान्त कर सकता है ? पैसा, बंगला, गाडी, बैंक बैलेंस, नाम, कीर्ति, परिवार या समाज... कोई भी हमको शांति नहीं दे सकता। केवल आनापानसति ध्यान द्वारा ही हम मन की शान्ति पा सकते है।

 

मेरी एक ही घोषणा और विनती है कि आप सब लोग ध्यान करें और करवायें यह प्रभु का ही काम है इससे बडी प्रार्थना और भक्ति, और कुछ भी नहीं है।

 

नरेन्द्र मुदलकर
हैदराबाद

संपर्क : +91 9849514574

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