" पत्रीजी हर पल हमारा ख्याल रखते हैं "

 

 

मेरा नाम नवकान्त है। मैं बचपन से नास्तिक हूँ। इसकी वजह हैं, मेरे नानी, दादा - दादी, चाचा - चाची; वे कम्युनिस्ट हैं। मैं बचपन से उनसे यही सुनता आ रहा हूँ कि भगवान कुछ नहीं होता, आत्मा की कोई चीज़ नहीं है, गुरु आदि सब बकवास है। गुरु माने अहंकारी, धोखेबाज, आलसी और निकम्मा आदमी, यही मैं समझता आया हूँ।

 

इन्हीं विचारों के साथ ही 1998 में मुझे पत्रीजी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, मैं तब आठवी का छात्र था। जिस समय मुझे गुरु की महिमा का कोई ज्ञान ही नहीं था, उस समय महबूब नगर डिस्ट्रिक्ट कोल्हापुर में डॉ. परमेश्‍वर रेड्‍डी के द्वारा पहली बार पत्रीजी से मिलने का मौका मिला।

 

मैं पहली बार उनसे मिलकर चकित रह गया था। गुरु शब्द सुनते ही, गेरुआ वस्त्रधारी, विभूतिधारी कोई व्यक्ति की तस्वीर मेरे सामने आती थी, जो कुर्सी पर बैठता हो और उसके शिष्य उसके पैरों के पास ज़मीन पर बैठते हों। वह लोगों को नींबू, यन्त्र - तन्त्र आदि से उपाय करवाता हो; पर पत्रीजी में यह सब कुछ भी न देखकर मैं हैरान रह गया। उधर पत्रीजी शांति से बैठकर हँसते रहे। वे सभी के साथ बैठे। कोई बाहरी आडंबर नहीं, सबसे हाथ मिलाते जा रहे थे। उनके लिए कोई विशेष खाना नहीं, वह भी वही खा रहे थे जो सभी खा रहे थे। किसी को भी कोई धर्म विशेष थोप नहीं रहे थे। वे साथ ही बोले कि मैं गुरु नहीं आप शिष्य नहीं हम सभी मित्र है। यह सब कुछ चकित कर देने वाला था।

 

बस मैंने तय कर लिया कि यही मेरे गुरु है। मुझे अंतःप्रेरणा हुई कि यही मेरे मार्गदर्शक है। फिर भी कहीं कोई शंका थी, " कहीं इस मित्रता की आड़ में कोई धोखेबाजी तो नहीं करेगा? " यह कोई नई प्रवृत्ति तो नहीं ? अब तक गुरु के विषय में जो धारणा बनी थी यह शंका उसी का परिणाम था। मैं उनकी हरेक गतिविधि को ध्यान से देख रहा था। पत्रीजी के साथ परिचय होने के पहले दिन ही वे बोले चलो सिनेमा देखते हैं। मुझे लगा गुरु तो सिनेमा देखता नहीं है, यह पक्का धोखेबाज़ ही होगा। हम सिनेमा देखने गए, तब तक फिल्म शुरु हुए आधा घंटा हो चुका था और फिल्म खत्म होने के आधा घंटा पहले ही हम बाहर आ गए। मुझे और मेरे मित्र, दोनों को ही यह बात पसंद नहीं आई, फिल्म के बीच में उसे देखने जाना और फिर बीच में ही बाहर आना। हॉल से बाहर आने के बाद पत्रीजी ने पूछा कि अभी हमने क्या देखा? मैं बोला " सिनेमा। " मेरे सर पर एक धौल मार कर उन्होंने कहा मैं भी तो वही देख रहा था, लेकिन उससे क्या सीखा? मैं फिल्म की कहानी बताने लगा। फिर से मेरे सिर पर धौल जमाकर उन्होंने कहा फिल्म की कहानी क्यों बता रहे हो। मुझे रोना आ गया, यह तो हर बात पर मार रहे हैं। कुछ देर के बाद उन्होंने कहा कि आप सब लोग फिल्म देखते समय भावुक हो जाते हैं अगर हिरोइन रोती है तो तुम भी साथ में रो पड़ते हो। हीरो घायल हो गया तो आपको भी दुःख होता है। जब फिल्म में असमंजस की स्थिति आती है तो आप भी तनाव में आ जाते हो। आप लोगों को क्या यह पता नहीं कि यह फिल्म है, यह सब कुछ झूठ - मूठ का दिखावा है और ग्लिसरिन के आँसू है। फिल्म में जो भी है वह सच्चाई नहीं है फिर भी आप लोग भावुक हो जाते है। आप लोग एक प्रयोग कीजिए। अगली बार जब आप फिल्म देखने जाएँगे तो उसे इस होश में रहकर देखिए कि यह सब नाटक है, निर्देशक निर्देश दे रहा है, अभिनेता अभिनय कर रहा है तब आपके न तो आँसू बहेंगे न ही तनाव होगा, खूब मज़े करेंगे। वैसे ही हरेक फिल्म में जो हम जानते नहीं, वैसा कुछ नयापन रहता है, कई बार जानकारी देने वाली बातें, कई पालन करने वाली बातें भी होती है, सिर्फ उन्हें ले लीजिए बाकी भूल जाइए।

 

इसी तरह से यह जान लीजिए कि यह जीवन एक नाटक है, आप सब जानते हैं, फिर भी मेरा पैसा है, मेरा परिवार है इसी के पीछे भाग रहे हैं। जब आप इस सोच के साथ रहेंगे कि जीवन एक नाटक है तो कभी भी रोना नहीं आएगा, आँसू नहीं बहेंगे। इस नाटक के मज़े ले सकते हैं।

 

पत्रीजी हॉल से बाहर आने के बाद इस विषय पर काफी देर तक बात करते रहे। उनके इस भाषण के बाद से मैं पत्रीजी को बहुत पसंद करने लगा। इस तरह से 10 साल पहले जब मैं पत्रीजी से मिला तो उन्होंने मेरे जीवन की रूपरेखा को समझकर उस पर चलना सिखाया।

 

इस पहले दिन के पहले पाठ ने मुझे ‘श्‍वासा’ नाम से तेलगु डॉकुमेन्ट्री फिल्म बनाने की प्रेरणा दी। ऐसा होता है पत्रीजी का प्रशिक्षण।

 

ये हैं हमारे पत्रीजी !

 

इस पाठ के अगले दिन, पत्रीजी को कोल्हापूर से करनूल जाना था। इसलिए परमेश्‍वर रेड्‌डी जी टेक्सी का इंतज़ाम कर रहे थे। पत्रीजी ने कहा टेक्सी किस लिए? मैं बस से जाऊँगा ना। उनके इस सादगी ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया। उस दिन से अब तक मैं पत्रीजी के साथ रहते हुए ध्यान का प्रचार कर रहा हूँ और उनसे बहुत कुछ सीख रहा हूँ।

 

पत्रीजी में ‘ध्यान को सभी तक’ पहुँचाने की जो ज्वलन्त अभिलाषा है, वह मुझे बहुत पसंद है। पत्रीजी एक अनंत किताब हैं, जितना पढ़ो एक नया अध्याय जुड़ता जाता है...

 

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एक बार मैं पत्रीजी के साथ श्री शैलम ट्रेकिंग के लिए गया था। उन्होंने मुझे सबके साथ अपना ध्यान अनुभव बाँटने को कहा। मेरे अनुभव सुनकर सबने ताली बजायी और तारीफ भी की। मैं सबसे छोटा था इसलिए सभी ने मुझे ‘किस’ भी किया। इससे मुझे लगा मैं तो हीरो बन गया। मैं अहंकार से भर उठा, जो मेरी बातों और आचरण से झलकने लगा। दूर से पत्रीजी ने यह सब कुछ देखा और मुझे बुलाकर कहा कि सारी जूठी प्लास्टिक प्लेटें, जूठे प्लास्टिक गिलास, जो जंगल में फैले हुए हैं, उन सभी को तुम्हें अकेले ही निकाल कर नष्ट कर देना है। मुझे तो रोना आ गया। सभी आराम से खा - पीकर कर प्लेट - गिलास फेंककर गए हैं उन्हें मैं ही क्यों उठाऊँ? वो भी अकेले। मुझे पत्रीजी पर बहुत गुस्सा आया। लेकिन मैं लग गया काम पर, बहते हुए आँसुओं के साथ। मुझे समझ आया कि मेरे अंदर अहंकार हैं, सबके सामने मुझे हीरो भी किया। उसके बाद ज़ीरो भी किया। उन प्लेटों और गिलासों को नष्ट करने से पहले ही मेरा अहंकार नष्ट हो गया। ऐसी बहुत सारी परिस्थितियों में, जब हम बड़े - बड़े काम करते हैं, तब हमारी तारीफ़ करना और अहंकार को निकालने के लिए कुछ न कुछ करना। ऐसा कौन - सा गुरु है जो इस प्रकार हर पल हमारा ख्याल रखता है?

 

ये हैं हमारे पत्रीजी !

 

उसके बाद मैं अपने अहंकार को हर दिन जाँच करके कम करता था। मैंने देखा है कि पत्रीजी जो कुछ भी बताते हैं उसका पालन अवश्य करते हैं और सबसे पालन करवाते भी हैं। अगर उन्हें किसी बात की जानकारी नहीं है तो छोटे से छोटे व्यक्ति से भी जानकारी लेने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती है। ऐसे निर - अहंकार हैं पत्रीजी।

 

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एक बार दिल्ली के एक हिन्दी चैनल को साक्षात्कार देकर पत्रीजी वापस आ रहे थे। कार में बैठते समय पत्रीजी ने मुझसे पूछा " मेरा चश्मा कहाँ है " मैंने कहा " मुझे पता नहीं है। " इस पर पत्रीजी ने कहा, " लगता है उसे मैं स्टूडियो में ही भूल आया हूँ। सचेत नहीं होने के वजह से भूल गया। मेरे बोध की परीक्षा लेने के लिए मेरे चश्मे का अच्छी तरह इस्तेमाल हुआ। " इस घटना को मैंने दो विभिन्न कोणों से देखा - जगत गुरु होते हुए भी अपने आप की जाँच करते रहना और अपनी भूल को भी मेरे सामने मानना। ये हैं हमारे पत्रीजी !

 

मुझे लगता है कि पत्रीजी में कोई अहंकार नहीं है। इसलिए वह किसी से भी घुलमिल जाते हैं। शतरंज की बिसात पर जैसे एक घोड़े की चाल के चारों अंशों पर ध्यान रहता है, वैसे ही उनकी हरेक बात का, हरेक कार्य का चार - पाँच अर्थ और चार - पाँच उद्देश्य रहते हैं। वे हरेक काम, बहुत सोच - समझ कर करते हैं। हरेक बात बहुत विवेकपूर्ण कहते हैं, लेकिन किसी को भी इसका विश्‍लेषण नहीं देते। कितनी ही रुकावटें आईं उनकी राह में, पर अपने सिध्दांत और कर्त्तव्यपरायणता को भी वे कभी नहीं भूले। सबको लगता है कि वे किसी को डाँटते हैं, किसी पर गुस्सा होते हैं, किसी को मारते हैं। पर वे इस बात को समझ नहीं सकते कि इसी तरीके से वे विश्‍व - कल्याण कर रहे हैं। पत्रीजी को समझना बहुत मुश्किल है।

 

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मैं कभी - कभी पत्रीजी के साथ उत्तर भारत में ध्यान - प्रचार के लिए जाता हूँ तो पत्रीजी के साथ समय बिताने का मौका मिलता है। मैं उनको बहुत ध्यान से देखता हूँ। एक बार भी उन्हें अपनी तारीफ़ करते हुए नहीं सुना। वे बहुत ही सामान्य और सहज रूप से रहते हैं। हम 12 घंटे यात्रा करें तो बहुत थक जाते हैं। लेकिन वे हमेशा यात्रा करते रहते है, हर दिन कोई न कोई क्लास, उद्‌घाटन समारोह.... उसके साथ - साथ खाना भी बनाते हैं सबको खिला भी देते हैं। उनके निरंतर मेहनत को देखकर आँखों में आँसू आ जाते हैं। वे कभी यह नहीं बोलते कि मैं थक गया हूँ या कहीं दर्द है। उनकी नज़र निरंतर अपने लक्ष्य पर रहती है। अपनी वचनबध्दता को वह कभी नहीं भूलते। यह सब देखकर, उनके सामने मैं अपने आप ही नतमस्तक हो जाता हूँ।

 

एक व्यक्ति का अपने परिवार को, नौकरी को छोड़कर विश्‍व कल्याण के लिए निरंतर मेहनत करना सबके लिए आश्‍चर्य का विषय है। निरंतर सीखना और सिखाना उनके गुण हैं। पत्रीजी का कहना है कि हम किसी से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं।

 

पत्रीजी बहुत अच्छे संयोजक और प्रबंधन कला में पारंगत व्यक्ति हैं। " किसको क्या काम देना है " इस बात में वे पारंगत हैं। हरेक परिस्थिति को अपने तरीके से बदलना, पत्रीजी की विशेषता है। हरेक बात को सकारात्मक रूप से लेना पत्रीजी का गुण है। सरलता का दूसरा नाम है पत्रीजी !

 

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मैंने बहुत बार ध्यान दिया है कि हमारे पूछने से पहले ही वे हमारी शंका का समाधान कर देते हैं। सन्‌ 2000 में करनूल में ध्यान यज्ञ हुआ था। मैं अपने चप्पल और बैग को एक जगह रखकर 20 गज़ की दूरी पर बैठकर ध्यान कर रहा था। पत्रीजी स्टेज पर थे लेकिन मेरा ध्यान उसी बैग और चप्पल पर था। मैं सोच रहा था कि ध्यान में बैठकर भी मैं उन चीजों के बारे में क्यों सोच रहा हूँ। तुरंत ही पत्रीजी ने कहा, ‘रहना है तो रहेगा, जाना है तो जाएगा।’ मुझे लगा कि बैग को रहना है तो रहेगा, जाना है तो जाएगा, क्या पता कोई उसमें एक करोड़ रुपए ही डाल जाए। सैंकड़ों बार मैंने देखा है कि मेरे पूछने से पहले ही पत्रीजी मेरे प्रश्‍नों का उत्तर दे देते हैं।

 

ये हैं हमारे पत्रीजी !

 

पत्रीजी के पास अपार ज्ञान का भंडार है। पर इस भंडार के रहते हुए भी घंटों इसकी चर्चा करते हुए मैंने उन्हें कभी भी नहीं देखा। मुझे यह शंक नहीं है कि पिरामिड स्पिरिचुअल सोसाइटीज़ मूवमेन्ट पूरे विश्‍व में फैलकर ध्यान जगत का निर्माण करेगा क्योंकि किसी धर्म विशेष की प्रपंचना इसमें नहीं है। 18 आदर्श सूत्र में भी नहीं है। हरेक चीज़ के पीछे एक वैज्ञानिक अनुकूलता है। इसलिए बहुत ही जल्दी दुनिया के सभी देश हमारा स्वागत करेंगे।

 

इसलिए हम सब ध्यान करते हुए, ध्यान सिखाते हुए, ज्ञान पाते हुए, ज्ञान बांटते हुए, पत्रीजी का सपना ‘वसुधैव कुटुंबकम्‌’ का बहुत जल्दी ही निर्माण करेंगे।

 

नवकान्त
हैदराबाद

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