" ‘ आनापानसति ध्यान ’ ही ध्यान का सही तरीका है ! "

 

मैं, रचना गुप्ता, पंजाब की लुधियाना स्थित सुगृहिणी हूँ। मेरा जन्म जलंधर के एक राजपरिवार में हुआ, हम चार भाई-बहन हैं। सब कुछ मौजूद होने के बावजूद भी मैं कुछ अनजाना खालीपन महसूस करती थी। बचपन में अपनी खराब मानसिक एवं शारीरिक तबीयत के कारण मैं आनंद न ले सकी तथा विचलित वृत्ति की रही।

 

मेरे पिताजी का भविष्य शास्त्र में गहराई से विश्‍वास होने के कारण उन्होंने मुझपर रत्न उपचार (Gem Therapy) पध्दति कई बार आजमायी। मैं पढ़ाई में बहुत अच्छी थी और अपना ग्रेजुएशन मैंने distinction के साथ पास किया। मेरी शादी लुधियाना के श्री राजकुमार गुप्ताजी के साथ हुई जो वाकई एक हीरा हैं!

 

छोटे बेटे के जन्म के पश्‍चात्‌ मुझे अस्थमा के अटैक परेशान करने लगे। कई डाक्टरों की सलाह-उपचार के बाद भी सारे प्रयास अल्पकालीन रहे। मुझे साईनस की व्यथा थी और मैं नेज़ल ड्राप्स का सहारा लेती थी। कई बार मैं इस सबसे काफी परेशान होकर उदासीन हो जाती थी कि जिन्दगी खत्म करने के बारे में सोचती थी; क्योंकि सब इतना दर्दनाक होता था।

 

फिर मैं आध्यात्मिकता की तरफ मुड़ गई।

 

मैंने ‘राम शरण’ में श्रीश्री हंसराज महाराज से दीक्षा ली। राम मंत्र जाप से मन को कुछ सुकून मिला। 12 साल से मैं उनकी शिष्या हूँ।

 

फिर मुझे ‘रेकी’ के बारे में ज्ञान मिला और जलन्धर के एक रेकी मास्टर मैडम पूजा जैन से मैंने रेकी सीख ली। उससे मैं बहुत उत्तेजित थी।

 

मगर मेरी जिन्दगी का महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब मैडम पूजा जैन ने एक फोन करके ध्यान सत्र के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने बताया कि पिरामिड स्पिरिच्युअल सोसायटीस मूवमेन्‍ट के मास्टर्स हैदराबाद से उनके घर आने वाले हैं, और उसने अपने रेकी प्रशिक्षणार्थियों के लिए एक ध्यान-सत्र आयोजित किया है !

शुरू में मैं अनुत्सुक थी, मगर पता नहीं... किस कारण मेरे मन में बदलाव आया... मैंने ध्यान सत्र में शामिल होने के लिए लुधियाना से जलन्धर तक यात्रा की।

30 जनवरी, 2006... यह दिन मेरी पूरी जिन्दगी में यादगार रहेगा। जलन्धर में पूजा के घर गई, जहाँ उसने मेरी मुलाकात महान पिरामिड मास्टर श्री आंजनेय शर्माजी से कराई।

 

शर्माजी ने आस्था पूर्वक मेरी पूछताछ की। मेरी व्यथा मैंने व्यक्त की... । मैं मंत्र-जाप का अभ्यास निरंतर करती हूँ, मगर उससे संतुष्ट नहीं! मुझे कुछ और पाने की इच्छा है! मैंने पढ़ा है कि सबकुछ अपने भीतर है। कब मैं अपने भीतर झाँक सकूंगी? भीतर जाने का कौन सा सही उपाय है ?

 

इस पर प्रसन्नता से जवाब देते हुए शर्माजी ने कहा ‘आनापानसति ध्यान’ ही सही उपाय है! आप अब तक नर्सरी क्लास में क्यों बैठी हैं ? जबकि आपके लिए ‘डॉक्टरेट’ के दरवाजे खुले हैं !

 

आन्ध्र प्रदेश के अनुभवी पिरामिड स्पिरिच्युअल मास्टर्स ध्यान सत्र ले रहे थे। उन्होंने हमें ध्यान सिखाया। हमने आधा घंटा ध्यान का अभ्यास किया, मुझे इतनी ऊर्जा और हल्कापन कभी भी पहले महसूस नहीं हुआ था। यह मेरे लिए एक नया अनुभव था और मुझे तुरंत इच्छा हुई कि मेरे परिवार के सदस्य तथा मित्रगण भी ऐसा सुन्दर अनुभव लें।

 

मैंने पिरामिड मास्टर्स से पूछा कि क्या वे लुधियाना आ सकेंगे... मैं दूसरों को ध्यान के लाभ उपलब्ध कराने के लिए इतनी उतावली थी। उन्होंने आने के लिए सहमति प्रकट की।

 

1 फरवरी, 2006... वे लुधियाना में मेरे घर पधारे ! ध्यान-सत्र इतना सफल रहा, सबको पसंद आया! श्री शर्माजी से विस्तृत बातें करने का मौका मुझे मिला। एक मास्टर, मित्र और तत्वज्ञानी की तरह उन्होंने मुझे सही आध्यात्मिकता की ओर मार्गदर्शन किया। मेरी शंकाओं का समाधान किया। उन्होंने मुझे प्रतिदिन 3 घंटे का ध्यानाभ्यास करने की सलाह दी। यह मेरे लिए थोड़ा कठिन था... मगर मैं गम्भीरता से ध्यान में परिपक्व होना चाहती थी। उस दिन से लेकर ... उचित आध्यात्मिकता में मेरी यात्रा सही मायने में शुरू हुई। मैं हर दिन 3 घंटे ध्यान करने लगी ! एक समय में एक घंटा... तीन बार... एक ही दिन में ! पहले ही दिन मैंने जाना कि... मेरा श्‍वास बिल्कुल सहज था... नेज़ल ड्राप्स की मदद के बिना !! यह एक आश्‍चर्य था... मेरी 20 साल पुरानी एलर्जी पहली ही बैठक में ठीक हो गई थी !

 

मैं इतनी उत्तेजित थी, जो इलाज मुझे दवाइयाँ न दे सकी, वह आनापानसति ध्यान ने दिया था ! मेरे जीवन में पिरामिड मास्टर्स को भेजने के लिए मैंने भगवान का धन्यवाद किया !

 

मैंने 40 दिन का ध्यान गंभीरता से करने की ठान ली। मेरे 40 दिन 10 मार्च को खत्म हुए। इन 40 दिनों में मैंने कई बदलाव अनुभव किए... मेरे अस्थमा के अटैक पूरी तरह से खत्म हो गये थे। मेरे डाक्टर्स पूरी तरह से दंग रह गये थे। घुटनों का दर्द मिट गया ! मैंने ज्यादा वजन भी घटाया !

 

मैं पूरी तरह से अलग महिला बन गई ! बच्चों और परिवार सदस्यों के प्रति मेरा दृष्टिकोण बिल्कुल बदल गया! बीमार, शर्मीली, झंझलाई महिला से... मैं सहज, मित्रतापूर्ण, प्यारी और स्वस्थ महिला बन गई !

 

मुझमें आया यह बदलाव देखकर, मेरे नजदीकी परिवार के सदस्य ‘ध्यान’ को गंभीरता से लेने लगे।

 

पहले मेरे खाली समय की रुचियां भी फिजूल गपशप करना, टी.वी. सिरियल देखना, आलस्य से सोना आदि आदतें, आध्यात्मिक आदतों में बदल गई ... जैसे सही आध्यात्मिक किताबें पढ़ना, ध्यान करना और ध्यान सिखाना।

 

मेरे अन्तर्मन ने मुझे, पहने हुए सारे रत्न, अंगूठियाँ वगैरह निकाल देने की सलाह दी। क्योंकि अब मुझे उनकी जरूरत ही नहीं थी। मैंने रेकी भी बन्द कर दी ! मैंने मंत्र-जाप वगैरह भी बिल्कुल छोड़ दिया !

 

अब मेरे जीवन में एकमात्र अर्थपूर्ण बात रह गई है... वह है ध्यान ! पूर्ण ज्ञात है - ध्यान करो ... और वह सब ठीक कराएगा !

 

मार्च 2006 में पिरामिड मास्टर्स फिर से पंजाब आये। इस समय मैंने भी कुछ ध्यान सत्र आयोजित किए और आनन्दपूर्वक ध्यान प्रचार में हिस्सा लिया।

 

मुझमें हुए बदलाव को देखकर मेरे पति और नजदीकी परिवार के सदस्य भी ‘ध्यान’ के लिए उत्साहित हुए। हमारा एक बड़ा एकत्र परिवार है। सभी ध्यान करने लगे और सभी पूरे लुधियाना में ध्यान सत्र आयोजन करने में उत्साहपूर्ण सहयोग देने लगे। सारे सत्र बहुत सफल रहे। उन दिनों श्री शर्माजी मुझे उनके महान गुरु ब्रह्मर्षि पत्रीजी के बारे में बताते रहे कि कैसे उन्होंने शर्माजी की जिन्दगी बदल दी। जितना ज्यादा वे बताते रहे, उतनी ही पत्रीजी से मिलने की चाह बढ़ती गई मुझे !

 

अप्रैल 2006... मैडम सत्या ने मुझे फोन करके बताया कि वह पत्रीजी के साथ 4 दिन के दौरे पर पूना जा रही है। उन्होंने मुझे शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। मैं उत्‍सुकता से पत्रीजी से मिलना चाहती थी। मैंने अपने पति से पूछा तो उन्होंने तुरंत हामी भर दी !

 

1 मई 2006 मैं अपने पति के साथ पूना आई। पूना एयरपोर्ट पर हमारे स्वागत के लिए मैडम सत्या, उनके पति श्री राजशेखर और श्री विजय कुमार सभी महान पिरामिड मास्टर्स मौजूद थे। हम पिरामिड मास्टर्स के साथ रहे और उनके आश्‍चर्यजनक अनुभव ज्ञात हुए। हम दंग रह गए कि पत्रीजी इतने सारे मास्टर्स बन रहे हैं !

 

3 मई ... यह दिन मैं जिन्दगी में हमेशा याद रखूँगी। सफेद दाढ़ीवाले, दमकती आभा वाले पत्रीजी से मुलाकात हुई ! मुझे वह एक महान देवता की तरह महसूस हुए ! उनसे मैं अपनी नज़रें हटा नहीं पा रही थी !

 

उन्होंने मुझे और मेरे पतिदेव को हमारे बारे में बताने के लिए कहा। हमने हमारे अनुभव बताते हुए, हमारा पूना आने का कारण स्पष्ट किया ! उन्होंने हमें पूना, शिरडी और अहमदनगर के ध्यान सत्र में उनका साथ निभाने के लिए कहा।

 

पहला सत्र पूना के सैन्ट्रल जेल में था। पत्रीजी ने ध्यान सत्र बहुत सुन्दरता से संचालित किया ! उन्होंने बाँसुरी वादन किया, कैदियों को ध्यान सिखाया और उन्हें शाकाहारी बनने की सलाह दी ! मुझे व्यासपीठ पर बुलाकर कुछ शब्द बोलने के लिए कहा ! रात तक हम पत्रीजी के साथ अलग-अलग जगहों पर कई ध्यान सत्र में साथ रहे।

 

पत्रीजी इतने सक्रिय थे, इतने जीवन से भरपूर और इतने विनोद बुध्दि स्वभाव के भी ! अगले 2 दिन हम पूना में थे। फिर उनके साथ शिरडी, अहमदनगर और कई छोटे-छोटे गाँवों में गए। हरेक ध्यान सत्र में हमें अलग-अलग परिकल्पनाएँ - Concepts - सीखने को मिले !

 

7 मई ... हमने पत्रीजी से विदा ली और हिमालय जैसी विशाल आध्यात्मिक शक्ति, जीवन के लिए नया दृष्टिकोण और प्रचुर ज्ञान लेकर पंजाब वापस लौटे ! अपने पति के साथ तुरंत ही मैं ध्यान प्रशिक्षण में जुट गई, जैसे पत्रीजी ने सलाह दी थी। हमने जेल, पाठशालाएं, योग केन्द्र, घर, ट्रैफिक पुलिस, डाक्टर्स आदि सब जगह ध्यान प्रशिक्षण दिया। जितना ज्यादा हमने सिखाया उतना आध्यात्मिकता का रोमांच हमने महसूस किया !

 

19 जून 2006 ... पत्रीजी पंजाब पधारे ! कड़कती धूप का महीना था... मगर उनके आने से ठंडी हवा चलने लगी ! एक सप्ताह तक पत्रीजी ने पूरे पंजाब का दौरा किया। उन्होंने लुधियाना, जलन्धर, अमृतसर, चण्डीगढ़, होशियारपुर, कपूरथला ... और कई गाँवों में ध्यान सिखाया। जहाँ जाते वहाँ अलग जलवा पैदा करते !

 

हरेक प्रशिक्षण में उन्होंने मुझे व्यासपीठ पर बुलाया और जो महत्व व सम्मान मुझे मिला, मैं कभी भूल नहीं सकती ! उन्होंने एक अलग ही आत्मविश्‍वासी, नयी, सक्रिय और उत्फुल्ल ‘रचना’ की रचना की।

 

मैं कृतज्ञ हूँ कि पत्रीजी मेरे जीवन में पथ प्रदर्शक बनकर आये और मेरे जीवन के उद्देश्य को स्पष्ट किया !

 

रचना गुप्ता
लुधियाना

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