" ध्यान एक अनमोल खजाना "

 

मैं राजिन्द्र कौल, मेरा जन्म एक पण्डित परिवार में हुआ। मेरे माता पिता ने अच्छे संस्कारों से हम चार भाई - बहनों की परवरिश की। 1984 में अचानक पिता जी की मृत्यु हो गई और सारा बोझ माँ पर आ गया। इसी बीच मेरी पढ़ाई भी ठीक से नहीं हो पाई।

 

एक दिन की बात है... मैं और मेरी माँ बातें कर रहे थे तो उन्होंने श्रीनगर जाने की इच्छा ज़ाहिर की जहाँ " खीर भवानी माँ " का मन्दिर है और हर साल वहाँ बहुत भारी मेला लगता है। अगले ही दिन 17.06.07 को हम " खीर भवानी मन्दिर " श्रीनगर पहुँचे।

 

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उस दिन अष्टमी का दिन था और मन्दिर में बहुत भीड़ थी, मानो सारा जम्मू श्रीनगर आ गया है। इसी भीड़ में कुछ लोग पिरामिड टोपी लगा कर घूम रहे थे और लोगों को ध्यान के leaf let बाँट रहे थे। कुछ लोग पेड़ के नीचे चादर बिछा कर लोगों को ध्यान करवा रहे थे। मेरी माताजी भी उन लोगों में बैठकर ध्यान सीख रही थी।

 

मैं बहुत हैरान हुआ और वहाँ जाकर सब जानकारी लेने लगा। दो तीन औरतें जिन्होंने (पिरामिड़ टोपी) पहनी हुई थी, मुझे ध्यान के बारे में समझाने लगी। उन्होंने मुझे एक पिरामिड़ टोपी, एक SPIRITUAL REALITY CD और एक VISITING CARD दिया।

 

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उनकी निःशुल्क सेवा देखकर मैं दंग रह गया। आज के युग में बिना पैसा माँगे, इतनी चीज़ भी दी और ध्यान के बारे में भी बताया, मैं बहुत हैरान था और नत मस्तक भी हुआ उन पिरामिड मास्टर्स के प्रति जो अपना कीमती समय लोगों के लिये निकालते है और अपनी कमाई का हिस्सा इस कार्य में लगा रहे हैं।

 

इसी के साथ मैं जम्मू आ गया। बहुत दिनों बाद मुझे सी.डी की याद आई जो श्रीनगर में मिली थी। मैनें वह सी.डी देखी तो मैं देखता ही रह गया। मुझे अनमोल खजाना मिल गया था। मैनें " खीर भवानी " माँ का धन्यवाद किया जिन्होंने मुझे पिरामिड मास्टर्स से मिलवाया।

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सी.डी खत्म होते ही मैनें रचना मैडम से फोन पर बात की। उनके अनुभव सुनकर मैंने भी फैसला किया कि मैं भी नियमित रूप से ध्यान करूगां और इस संस्था के साथ काम करूँगा।

 

रचना जी ने मुझे बताया कि पहलगाँव (अमरनाथ) में पिरामिड स्पिरिचुअल सोसायटी का ध्यान शिविर लग रहा है| अगर आप भी वहाँ आना चाहते हैं तो आ सकते हैं। मैनें अपनी ध्यान - यात्रा पहलगाँव के बेस कैम्प नंबर एक से शुरू की। मेरे साथ हैदराबाद के दो मास्टर शाम सुन्दर जी और विजय जी थे। दोनों के साथ मिलकर हमने हजारों लोगों को ध्यान शिक्षा दी। देखते ही देखते मुझे बहुत सुन्दर अनुभव आने लगे। मुझे यह अनुभव भी हुआ कि जब हम किसी को सिखाते हैं तो हमारी आन्तरिक प्रगति अपने आप होने लगती है इससे मेरे अन्दर और आत्म विश्‍वास प्रकट होने लगा। दस दिन कैसे निकल गए पता भी न चला।

 

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अब मैं अपने आप में बहुत से बदलाव महसूस कर रहा था। मेरा परिवार भी मेरे बदले रूप से बहुत प्रभावित था। मेरा काम करने का तरीका, बोल - चाल का ढ़ंग, सोचने का ढ़ंग आदि में तेजी से बदलाव आने लगा। मुझे लगा जैसे बहुत सी विश्‍व शक्ति मेरे अन्दर प्रविष्ट कर गई है और मुझे लोगों तक ध्यान पहुँचाने के लिये उकसा रही है।

 

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मैनें अपनी यह बात रचना जी को बताई। उन्होंने मुझे प्रोत्साहन दिया और जम्मू में एक पिरामिड केयर सैंटर खोलने की सलाह दी। वह दिन भी बहुत जल्द आ गया जब मुझे पताचला कि राजकुमार गुप्ता और किरण जी हमारे घर पिरामिड सैंटर खोलने आ रहे है।

 

16.12.07 का वह शुभ दिन या जब पिरामिड मास्टर्स, मेरा परिवार, मेरे दोस्त जम्मू के उच्च पदाधिकारी की उपस्थिति में जम्मू में पहला पिरामिड ध्यान केन्द्र खुल गया।

 

26.12.07 को ब्रह्मर्षि पत्री जी को मिलने की लालसा में मैं तिरुवन्नामलाई (तामिल नाडू) ध्यान यज्ञन्‌म में गया।

 

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ब्रह्मर्षि पत्री जी को देखकर मन में जो भी प्रश्‍न थे वह भूल गये। उन्होनें मुझे बड़े प्यार से गले लगाया। जम्मू के बारे में पूछा और वायदा किया कि जल्दी वह जम्मू आयेगे। तिरुवन्नामलाई का ध्यान यज्ञन्‌म मेरी जिन्दगी का यादगार हिस्सा रहेगा। वहाँ इतने महान मास्टर्स से मेरा मेल - जोल हुआ| वहाँ पत्रीजी ने मुझे शॉल और एक शील्ड से सम्मानित किया।

 

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ध्यान यज्ञन्‌म के बाद मैं बैंगलौर पिरामिड वैली देखने गया। वहाँ भारत का सबसे बड़ा पिरामिड 160 x 160 जहाँ पाँच हजार लोग इकट्‌ठे बैठकर ध्यान कर सकते हैं। पूरा पिरामिड विश्‍व शक्ति से भरा हुआ है। वहाँ की उर्जा शक्ति को मैं महसूस कर रहा था। किसी भी बीमारी को आप कुछ ही दिनों में उस पिरामिड के अन्दर ध्यान करके दूर कर सकते हैं। इस विशाल पिरामिड को देखना मेरे लिये तो एक सौभाग्य की बात थी।

 

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मैं बैंगलोर से दिल्ली आ रहा था तो रेलगाडी में भी मुझे जो लोग मिले, मैनें उन्हें भी ध्यान के बारे में बताया। इन्ही लोगों में धूरी (पंजाब) के श्री बिमल मुनी और उनकी पत्नी भी थी।

 

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पंजाब आ कर वह लुधियाना का " पिरामिड केयर सैंटर " देखने गये। वहाँ रचना जी मिले और उनके प्रोत्साहन से उन्होंने धूरी में भी एक ध्यान केन्द्र खोला है।

 

इन सब घटनाओं से मेरी आत्म विश्‍वास और बढ़ता गया, तब अन्जनय शर्मा जी ने मुझे और श्रीनगर की लक्ष्मी मुरलीधर मैडम को ग्वालियर में C.R.D.F की ध्यान क्लास लेने के लिये भेजा। इतनी बड़ी संख्या में लोगों को ध्यान सिखाने का मेरा पहला अनुभव था। पर मुझे हर पल लगता कि क्लास मैं नहीं ले रहा मेरे पीछे एक विशाल शक्ति है जो मुझसे यह महान कार्य करवा रही हैं।

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14.04.08 को ब्रह्मर्षि पत्रीजी जम्मू आये। हमने पूरे दिन की ध्यान वर्कशाप रखी थी। काफी लोग आये थे और सबसे ध्यान शिक्षा का लाभ उठाया। पत्रीजी भी हमारे कार्य से बहुत खुश थे। उन्होंने हमें और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

 

जब तक मेरी जिन्दगी रहेगी मैं ध्यान का प्रचार करता रहूँगा| जो ज्ञान मैंने पत्रीजी से लिया है लोगों तक बाँटता रहूँगा।

 

राजिन्द्र कौल
जम्मू
संपर्क : +91 9419174799

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