ध्यान है... आनन्द है "

 

मेरा नाम राजेश सराफ है। मैं 43 वर्ष का हूँ और भुवनेश्वर, उड़ीसा में रहता हूँ। मेरी जीवनसंगिनी हैं सुनन्दा, जो शुरू से ही ध्यान किया करती हैं और आज उन्हीं की वजह से मैं भी इस पथ पर पग रख चुका हूँ। मैंने कभी उन्हें ध्यान करने से रोका नहीं था पर उनके बार- बार कहने पर भी खुद कभी किया भी नहीं था।

 

एक बार हम दोनों मारवाड़ी समाज के एक प्रोग्राम में गए हुए थे जहाँ हमें कटक से आए हुए ध्यान शिक्षक हरीश भाई ने पत्री जी के आगामी पब्लिक प्रोग्राम की सूचना दी। सुनन्दा के कहने पर मैंने भी प्रोग्राम में जाने की स्वीकृति दे दी परन्तु माँ की तबियत खराब हो जाने के कारण मुझे कलकत्ता जाना पड़ा और मैं वह प्रोग्राम अटेंड नहीं कर पाया।

 

सुनन्दा ने कुछ समय बाद हरीश भाई को फ़ोन करके घर बुलाया। मैं नहीं जानता था कि यह तो योजना बना कर किया गया काम है, वह चाहती थीं कि मैं थी ध्यान करना शुरू कर दूँ और उनकी योजना सफल हुई। हरीश भाई ने मुझे ध्यान करना सिखाया तो बस पहले ही दिन मैं चालीस मिनट तक ध्यानमग्न बैठा रहा। मुझे बहुत अच्छा लगा। मेरे अनुरोध पर हरीश भाई रोज़ कटक से भुवनेश्वर आकर मुझे ध्यान कराते रहे जिसके लिए मैं उनका सदा आभारी रहूँगा।

 

कुछ समय बाद भुवनेश्वर में ही एक ध्यानी भाई के घर की छत पर 9*9 का पिरामिड बना। हम लोग वहाँ भी जाते रहे, हमारे बच्चे भी हमारे साथ बराबर जाते रहे और आनन्दित होते रहे। लगभग दो वर्षों से हम दोनों सभी को ध्यान सिखाते हैं, स्कूलों में भी नियमित रूप से यह काम चलता रहता है।

 

ध्यान में आने के बाद पत्री सर जब भी भुवनेश्वर आए हैं, मेरे यहाँ ही उनकी क्लास चलती है। अन्य मास्टर्स भी जब यहाँ आते हैं तो उनका सेशन भी यहीं पर होता है। ध्यान से प्राप्त होने वाले आनन्द से मैं इतना अभिभूत हुआ कि पिरामिड वैली, बैंगलौर भी गया और 2011 में विशाखापट्‌टनम के ध्यानमहाचक्र में भी। कुछ समय पहले चोट लगने के कारण मैं पैर मोड़ कर नहीं बैठ पाता था पर ध्यानमहाचक्र में स्टेज पर पत्रीसर के पीछे अन्य ध्यानियों के साथ मैं तीन चार घण्टे तक आराम से पैर मोड़ कर बैठा रहा।

 

आज मेरा पूरा परिवार ध्यान करता है और हम दोनों तो बहुत से लोगों को ध्यान सिखाने जाते हैं। घर में सब कुछ सुखपूर्वक चल रहा है, स्वास्थ्य है, शांति है, आनन्द है। मुझे यह सब करना बहुत अच्छा लगता है। जीवन में बस ध्यान ही ध्यान है, आनन्द ही आनन्द है। इस सबका श्रेय मैं देता हूँ आनापानसति ध्यान को, अपनी पत्नी सुनन्दा को और अपने गुरु ब्रह्मर्षि पत्री जी को।

 

राजेश सराफ़
भुवनेश्वर

संपर्क : +91 93387 30897

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