" प्राणियों से मित्रता करने की शक्ति मुझे प्राप्त हुई "

 

मेरा नाम रजिता है। मैं हैदराबाद के मोती नगर में ई - सेवा में प्रबन्धक के पद पर कार्यरत हूँ। मार्च 2007 तक मैं ध्यान के विषय में अनभिज्ञ थी। मेरी चचेरी बहन सुजाता ने मुझे ध्यान के विषय से अवगत कराया। उन्हीं के प्रोत्साहन द्वारा मोती नगर में सीनियर पिरामिड मास्टर अनुराधा मैडम के द्वारा ‘ध्यान’ का परिचय प्राप्त हुआ।

 

मैंने पहली बार पत्री जी को एस.आर.नगर ग्राउण्ड में ध्यान के कार्यक्रम में देखा। उनको देखकर मन में एक विचार आया कि यदि यही वास्तविक रूप में गुरु हैं तो ये स्वयं मेरे पास आकर मुझसे हाथ मिलाएंगे। ध्यान कार्यशाला के समाप्त होते ही पत्री जी सीधा मेरे सामने आकर खड़े हो गए। मुझसे हाथ मिलाकर मेरे हाथों को अपने हाथों में काफी समय तक पकड़ कर रखा। यह देखकर मैं अचंभीत रह गई एवं मेरी प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं रहा। परन्तु एक भय भी मन में आया क्योंकि मैंने यह भी सुन रखा था कि पत्री जी बहुत जल्दी क्रोधित भी हो जाते हैं। इसीलिए दिसम्बर 2007 में ध्यान तिरुवन्नामलई महायज्ञ में मैंने पत्री जी से दूरी बना कर रखी। सच तो यह है कि मैं उनके उदार स्वभाव के विषय में ज्यादा जानती ही नहीं थी।

 

2008 में बुध्द पूर्णिमा के अवसर पर अपने मित्रों के साथ बेंगलूरु गई थी। उस समय हैदराबाद पिरामिड मास्टर राजशेखर से मेरी मुलाकात हुई और उसके बाद से मेरी आध्यात्मिक यात्रा का शुभारम्भ हुआ। एक बार राजशेखर सर ने मुझे बताया कि बुध्द के साथ उन्हें मेरा कोई सम्बन्ध दिखाई देता है। उन्होंने मुझे पूरे कमरे में अंधेरा करके केवल बुध्द की प्रतिमा पर प्रकाश डाल कर उसी की ओर देखते हुए प्रतिमा से संदेश प्राप्त करने का सुझाव दिया। मैंने इसी प्रकार ध्यान आरम्भ किया। कुछ समय के बाद बुध्द की प्रतिमा की जो आँखें बंद थीं वे मुझे खुली नज़र आई मानो बुध्द खुली आँखों से मुझे देख रहे हैं। मैं चकित रह गई। यह भ्रम है कि वास्तविकता यह मैं समझ नहीं पाई। लेकिन बुध्द की प्रतिमा ने पाँच बार आँखें बंद की एवं खोली केवल यह दर्शाने के लिए यह मेरा कोई भ्रम नहीं वरन्‌ एक प्रत्यक्ष सच्चाई है। अब हर दिन बुध्द की प्रतिमा आँखें खोलकर मेरी ओर देखती हैं। एक दिन मैंने प्रतिमा से पूछा कि क्या आप केवल मुझे देखते ही रहेंगे या कभी बात भी करेंगे? तब मैंने उनके होंठों को हिलते हुए देखा। लेकिन वह क्या कहते थे वह मेरी समझ में नहीं आता था। इस अनुभव को जब मैंने राजशेखर सर से शेयर किया तो उन्होंने बताया कि ज्यादा साधना की ओर यदि तुम अग्रसर होओगी तो तुममें विश्‍व शक्ति बढ़ेगी और इस प्रकार तुम उनसे बात कर सकोगी एवं उनकी बात समझ सकोगी।

 

उसके बाद से मैंने और अधिक ध्यान करना प्रारम्भ कर दिया। एक बार Spiritual India Magazine के प्रथम पृष्ठ पर पत्री जी की आँखें बंद करके बाँसुरी वादन करते हुए का चित्र छपा देखा। मैंने उस चित्र की ओर टकटकी लगाकर देखना आरम्भ कर दिया। अचानक से पत्री जी ने आँख खोलकर मेरी ओर देखा। उसके अगले ही दिन पत्री जी को मैं मिली और मैंने उन्हें अपना अनुभव बताया। साथ ही मैंने यह भी कहा कि मैं आपसे उसी चित्र के माध्यम से प्रतिदिन बात करना चाहती हूँ। पत्री जी ने कहा ‘आप जैसा चाहती हैं वैसा हो जाएगा।’ उस दिन के बाद से उनकी आँखों के भाव मुझे समझ आने लगे। लेकिन वे क्या बोलते थे समझ में नहीं आता था। अब मैं ‘तुलसीदल’ पुस्तक के कवर पेज से पत्री जी को भौतिक शरीर में देख पा रही हूँ और वो क्या कहना चाहते हैं वह भी मेरी समझ में भली-भांति आ जाता है। एक दिन पत्री जी मेरे स्वप्न में आए और मुझसे बोले कि गौतम बुध्द ज्ञान प्राप्त करने के बाद एक दिन स्वयं ध्यान में बैठे थे और उन्होंने स्वयं से प्रश्‍न किया कि यदि संसार में कोई और व्यक्ति है जो उन्हें ध्यान के विषय में ज्ञान दे सकता हो तो उन्हें नज़र आए। परन्तु गौतम बुध्द को केवल अपनी ही छवि नज़र आई। इससे यह प्रमाणित होता है कि बुध्द ने जो ध्यान मार्ग अपनाया वहीं ‘आनापानसति’ एक मात्र उचित ध्यान माध्यम है। साथ ही यह भी ज्ञान मिला कि घर में ध्यान करना तो ठीक है लेकिन सभाओं में जाकर सकल भाई-बंधु से प्रेम बढ़ाना चाहिए। उसके बाद मैंने हमारे घर के पास एक वृक्ष से बात करना प्रारम्भ किया। उससे मित्रता स्थापित करने के बाद आध्यात्मिक विषय पर पत्री जी की टीचिंग्स वृक्ष को बताई तो वह खुशी के साथ झूमता था। हमारी मित्रता अब भी कायम है। मुझे देखते ही वृक्ष की शाखाएँ झूमने लगती हैं और मुझे पास आने का निमंत्रण देती हैं।

 

एक बार राजशेखर सर ने मुझे बताया कि सभी जीवों को जीवन देने वाले सूर्य के साथ मित्रता करने से उनसे सौर शक्ति एवं विश्‍व शक्ति प्राप्त करके आध्यात्मिकता के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं। उसके बाद मैंने सूर्य की ओर देखना प्रारम्भ किया और उससे मित्रता स्थापित की। कुछ दिनों के बाद गर्मी के दिनों में कड़कड़ाती धूप में मैंने सूर्य की ओर देखना आरम्भ किया। लेकिन मुझे सूर्य में चंद्रमा की शीतलता मिलती थी। एक बार मैंने सूर्य से पूछा कि मुझमें जो बुरे कर्म हैं उन्हें जलाकर क्या आप उन्हें समाप्त कर सकते हैं? तुरन्त ही एक ग्रीष्म रश्मि मेरे पेट में प्रवेश हुई और अंदर कुछ भस्म होने जैसा मुझे प्रतीत हुआ। यह एक अद्‌भुत चमत्कार था। कुछ दिनों के बाद मुझे एक साथ आठ सूर्य दिखने आरम्भ हो गए। एक बार ध्यान के बाद आँख खोलकर देखा तो मैंने सामने कुर्सी पर चंद्रमा को बैठे पाया। एक बार मैंने पत्री जी से पूछा कि मैं आपके हाथ में जो बाँसुरी है उसकी तरह खाली रहना चाहती हूँ। उन्होंने हँसते हुए ‘तथास्तु’ कहा। तब से लेकर अब तक मुझमें बाँसुरी की तरह खालीपन समा गया है। कोई कुछ भी कहे मुझ पर उस बात का प्रभाव नहीं पड़ता। एक साक्षी की भाँति मैं सब कुछ स्वीकार करती हूँ।

 

एक बार ऑफिस के पैसे गबन करने का मुझ पर आरोप लगा दिया गया। मैंने जीवन में कभी किसी से पैसे का लेन-देन नहीं किया था। मुझे दुःख हुआ, मैंने पत्री जी के चित्र के पास जाकर उन्हें सारी बात बताई। मुझे आभास हुआ कि पत्री जी मेरे समक्ष आकर खड़े हो गए हैं और उन्होंने मुझे सांत्वना देते हुए कहा कि मैं हर क्षण तुम्हारे साथ हूँ। किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है। जाकर अपने अफसरों से मिलो। जब मैं अपने अफसर से मिली तो उन्होंने कहा कि वह जानते हैं कि मैं निर्दोष हूँ और चिन्ता न करूँ। पत्री जी ने मुझे प्रकृति के हर कण के साथ मित्रता रखने की शक्ति दिया हैं। हर श्‍वास में, हर वस्तु में, हर स्थान पर, पत्री जी के अस्तित्व को अनुभव करती हूँ। मैं यही कह सकती हूँ कि यदि वह हमारे साथ हैं तो हम जीवन में सभी कुछ प्राप्त कर सकते हैं।

 

रजिता
हैदराबाद 

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