" प्रभु की ओर "

 

मैं राजकुमार गुप्ता, लुधियाना वासी हूँ। मैं एक व्यापारी हूँ। मैं तीन साल पहले पिरामिड सोसाइटी के संपर्क में आया। इससे पहले मैंने मूर्ति-पूजा, नाम जाप, कीर्तन-भजन बहुत कुछ किया, बहुत से लोगों की शरण में गया। कोई साधु-सन्त, फकीर, पण्ड़ित नहीं छोड़ा। सब जगह कुछ-न-कुछ सीखने के लिए मिला पर कुछ खोजने की तलाश अभी भी जारी थी।

 

मैंने Spiritual Reality CD देखी और उसे देखते ही मुझे लगा कि यहीं मेरी तलाश का अन्त है। फिर भी देखने के लिए कि इस सोसाइटी के संस्थापक कौन है ? यह सोसाइटी किन सूत्रों पर चल रही है? यह सब जानने के लिए मैं पूना गया। उन दिनों मई 2005 में ब्रह्मर्षि पत्रीजी के ध्यान शिविर पूना में था। मैं अपनी पत्नी के साथ वहाँ गया।

 

जब मैं पत्रीजी से मिला तो मैं उन्हें देखता ही रह गया, उनके चेहरे पर इतना नूर है। मैंने उनके पैरों को छूआ तो उन्होंने मेरे पाँव छुए। मैं बहुत हैरान हुआ। उन्होंने मुझे " स्वामी जी " कह कर सम्बोधित किया। वह गुरु-शिष्य परम्परा के विरूध्द है। आप भी भगवान है, मैं भी भगवान, फिर हमारे में अन्तर कहाँ? सिर्फ अन्तर यह है कि मैंने अपने-आप को जान लिया है, आपको अभी जानना बाकी है। अब और देर मत करो दिन-रात ध्यान करो क्योंकि पूरे पंजाब को आप को ही सम्भालना है। आपको सब लोगों को ध्यान सिखाना है।

 

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मैं बहुत हैरान हुआ। मैं तो खुद कुछ खोज रहा हूँ, मैं लोगों को राह कैसे दिखा सकता हूँ। पत्रीजी के साथ हम सात दिन रहे। वह हर दिन 7-8 ध्यान शिविर लेते थे। उनका ध्यान कक्षा लेने का ढंग हर रोज नवीन होता है। पूना से वापिस आकर मैंने पहले चालीस दिन ध्यान करने के बारे में सोचा। चालीस दिनों में बहुत सारी विश्‍व ऊर्जा का संचार मैंने अपने शरीर के अन्दर अनुभव किया।

 

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मेरी काम करने की क्षमता में भी सुधार हुआ। मुझे पहले गुस्सा बहुत आता था। मैंने देखा कि अब जल्दी मुझे गुस्सा नहीं आता है। आगे मेरा ब्लड प्रैशर बहुत उच्च रहता था। वह भी नार्मल हो गया मैंने ब्लड प्रैशर की दवाई भी लेनी छोड़ दी। जब भी मुझे वक्त मिलता मैं आनापानसति ध्यान में बैठ जाता। पूर्णिमा को तो मैं पूरी-पूरी रात ध्यान करने लगा। चालीस दिन कब निकल गये पता ही नहीं चला। ध्यान तो एक नशे की तरह मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया।

 

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पत्रीजी जून में लुधियाना आये। मैंने उनके लिए बहुत सी क्लासें बुक कीं। स्कूल, कॉलेज, फैक्टरी, जेल, ट्रैफिक पुलिस इत्यादि में पत्रीजी ने जगह-जगह जाकर ध्यान सिखाया। वह मुझे भी स्टेज पर बुलाकर अपना ध्यानानुभव सुनाने के लिए कहते। इससे मेरी लोगों के सामने आने की झिझक खत्म हो गई। पत्रीजी जाते वक्त मुझे ध्यान शिविर लेने के लिए कह कर गये।

 

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मैंने भी स्कूलों, कॉलेज, जेल, घरों में जाकर, गाँव-गाँव जा कर ध्यान के लाभ के बारे में बताना शुरू किया। मैंने अनुभव किया कि जब आप किसी को सिखाते हो तो आपका ज्ञान भी बढ़ता जाता है और आपके पीछे एक दैविक शक्ति होती है जो आपका पथ-प्रदर्शित करती है।

 

इस तरह ध्यान करते-करते मुझे बहुत से अनुभव भी हुए। मैंने इसी ध्यान में सभी देवी देवताओं के दर्शन किए। ध्यान सिखाने हम लोग जम्मू, कश्मीर गए। वहाँ अलग-अलग जगह मिलट्री, पुलिस, स्कूल, कॉलेज और खीर भवानी मेले में लोगों को ध्यान सिखाया। ध्यान सिखाते-सिखाते मुझे बहुत से अनुभव भी आते रहे।

 

जम्मू जेल में 750 कैदियों को 4 घंटे लगातार अलग-अलग ग्रुप में ध्यान सिखाते हुए मुझे ऐसा अनुभव हुआ जैसे पत्रीजी खुद ही हर क्लास में मौजूद रहते हैं और ध्यान सिखा रहे हैं। फिर हम लोग अमरनाथ यात्रा में लोगों को पहलगाँव में बेस कैम्प में योगी, महायोगीयों को ध्यान सिखाते। 10-12 घंटे लगातार हर यात्री को 10-15 मिन्ट का ध्यान। इस ध्यान में बहुत से लोगों को शिव के दर्शन, शिवलिंग, यात्रा के दर्शन, इत्यादि बहुत से अनुभव हुए। मैंने भी इस यात्रा में बहुत ही ध्यान प्रगति की और शिव के दर्शन किए।

 

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इस तरह मेरी ध्यान यात्रा में मैंने यह पाया कि जैसे ही हम किसी को ध्यान सिखाते है तो हमारी भी प्रगति होती है और यह पाया इस से Amplification of Energy होती है। जैसे ही हम किसी को ध्यान सिखाते है, तो उसे हम उर्जा देते है। और उन से हमें ऊर्जा मिलती है, इस तरह बहुत जल्दी-जल्दी Amplification of Energy होती है। एक और बात, जब हम ध्यान कक्षा में किसी के सवाल का जवाब देते हैं तो लगता है कि कोई शक्ति हम में आ कर उस सवाल का जवाब दे रही है। बाद में जब उस पर विचार करें तो लगता है कि हमें उस सवाल का जवाब किस ने दिया। हमें उसका निरीक्षण करने पर अनुभव होता हैं कि, जब हम teach करते हैं तो हम भी learn करते हैं।

 

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दिसम्बर 2006 शिरडी ध्यान यज्ञम में पत्रीजी की ध्यान बैठक सुबह 6 बजे में मुझे ध्यान में बैठे अनुभव हुआ कि, मुझे किसी ने अन्दर ही कहा - " मैं ही राम हूँ, मैं ही कृष्ण हूँ, मैं ही साई हूँ। " इस ध्यान यज्ञम जिस में हजारों ध्यानियों के साथ ध्यान करने में जो ऊर्जा का अनुभव हुआ, वो अलग ही था। इस ध्यान यज्ञम से जीवन में परिवर्तन हुआ। इस दिन से ऐसा लगा जैसे पहले मैं करता था और " वो " देखता था। अब वो करता है और मैं देखता हूँ।

 

मेरी मैं ने तुझ से जुदा रखा,
मुझे बंदा और तुझे खुदा रखा।
जब मेरी मैं खत्म हो गई।
फिर बंदा की और मौला की।

 

जीसस क्राइस्ट से बातचीत, रमण महर्षि से संदेश, सत्यानन्द महाराज से संदेश, बहुत से अपने जन्म, मैंने इस ध्यान में देखे हैं। चालीस हजार लोगों को ध्यान सिखा चुका हूँ। ध्यान में बहुत सी Spirit को भी ध्यान सिखा चुका हूँ और उनके लिए भी मुक्ति का मार्ग यह ध्यान ही है।

 

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पत्रीजी की कही हुई तीन चीजों पर ध्यान दे रहा हूँ।


1. ध्यान 2. स्‍वाध्याय 3. सज्जन सांगत्य| बहुत से पिरामिड मास्टर्स से मिलने का अवसर हुआ। हर एक में बहुत ही अलग-अलग तरह की खूबियाँ देखने को मिली और सीखीं। हर एक में एक अलग शक्ति देखी-ध्यान की। मैंने पत्रीजी को कहा कि आप के पास तो कितने ही कोहिनूर हीरे हैं, उन्होंने कहा, मेरा हर एक पिरामिड मास्टर एक हीरा है और मेरे पास बहुत है।

 

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एक बहुत ही अच्छा अनुभव मुझे नरेन्द्र जी पिरामिड मास्टर की क्लास, जो हमारे घर पर हुई उसका वर्णन है। नरेन्द्र जी ने जैसे ही क्लास शुरू की उन्होंने गायत्री मंत्र का उच्चारण किया। जो कि उनका सिध्द किया हुआ है। मैंने देखा गायत्री माँ खुद विराजमान है और मंत्र बोल रही है। मैंने उनकी सूक्ष्म शरीर से चरण वन्दना की। फिर नरेन्द्र जी ने शिव के मंत्र उच्चारण किये। मैंने शिवजी को देखा, मुझे जोर से झटके लगे और मुझे लगा कि मैं ही शिव हूँ और शिव मेरे भीतर आ गए हैं। फिर एक प्रकाश नजर आया। मैंने प्रणाम किया और पूछा आप कौन है। तो उन्होंने कहा, " मैं ही हूँ जो सब कुछ करता हूँ। इस समय इस धरती पर मैं पत्री के रूप में हूँ। " मैंने मन ही मन कहा, " चरण वन्दना प्रभु। "

 

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इस ध्यान से मैंने जीवन जीने की कला सीखी है। अब ध्यान ही जीवन बन चुका हैं। तीन चीजें इस ध्यान से मिली। पहले से अच्छी सेहत, अच्छा काम, अच्छे सम्बन्ध, जैसे गुरुनानक जी ने उपदेश दिया था। मैं उस पर अमल करते हुए अपना जीवन निर्वाह कर रहा हूँ।

 

1. किरत कर, मैं अपना काम श्रध्दा से कर रहा हूँ।
2. नाम जाप, मैं ध्यान कर रहा हूँ।
3. बाँट खा, मैं ज्ञान ध्यान बाँट रहा हूँ।

 

अब जीवन को सही मायने में, जीने की कला मैंने सीखली है। इस ध्यान से पत्रीजी की छत्रछाया में चल पड़ा हूँ और इसी जन्म में सब जन्मों के कर्म बन्धनों से मुक्त होना है और लोगों को भी इसकी प्रेरणा देनी है। यही मिशन के साथ हर जगह पिरामिड की शक्ति जिसका मुझे पिछले कई सालों से ज्ञान था, लोगों को लगाने की प्रेरणा देता रहता हूँ। पत्रीजी ने पिरामिड शक्ति का ध्यान के साथ जोडने का कारण यही है कि इस से बहुत जल्दी सब ध्यानी बन सकेंगे। पिरामिड हमारे सारे रोग ठीक करने में सक्ष्म हैं।

 

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मैंने पिरामिड ऊर्जा को पहचाना है और जीवन में पत्रीजी की प्रेरणा से एक बहुत बड़ा पिरामिड जिस में बहुत सारी " Healing Power " होगी, लोग रोग मुक्त होंगे और ध्यानी बनेंगे, ध्यान जगत का निर्माण करने के उददेश्य से काम में जुटा हूँ।


ध्यान से ही मेरा उध्दार हुआ, आप का भी होगा ... जरूर।

 

राजकुमार गुप्ता
लुधियाना

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