" एक ध्यान - आपका जीवन बदल सकता है - हमेशा के लिये "

 

मेरा नाम जी. राजशेखर है। मैं इंडियन नेवी में मेरीन इंजिनियर हूँ और मेरा रैंक है कमांडर| मैंने 1996 में ध्यान सीखा और मेरी ज़िन्दगी ही बदल गई। तब से ध्यान प्रचार में तन-मन लगाकर जुटा हूँ। भले ही सालों का सुख, वैभव और नाम का आनन्द जीवन में हो, दुख और पीड़ा का एक पल उनको तहस-नहस कर देता है। इसी दुख ने गौतम बुध्द को अपने राज भोग छोड़कर, उसका हल ढूँढने पर विवश कर दिया। उनके जीवन की कठोर खोज का फल था " आनापानासति " ध्यान। इस ध्यान की साधना से उन्हें दुख से मुक्ति मिली और जिसके फलस्वरूप उन्हें जन्म-मृत्यु से विमुक्ति मिली।

 

क्या आपके और मेरे जीवन में सुख-दुख की कहानी भी यही तो नहीं? जी हाँ ! यही है। तो फिर हम सब ध्यान की साधना क्यों नहीं करते? ध्यान सीखने के बाद, उसके फल भोगने के बाद, क्यों हम उसकी साधना छोड़ देते हैं। शायद ! ये हमारी मूर्खता है। मेरे जीवन में बहुत प्रश्‍न थे। दुख क्यों? भगवान कौन है? सही-गलत क्या है इत्यादि। किसी से इसके निवारण का मार्ग सुनने पर-उस पल के लिए सही लगता था, मगर कुछ समय बाद फिर वही पुरानी उलझन आ जाती थी। जिस दिन से मैंने- "आनापानासति" ध्यान प्रारंभ किया, उस दिन से, धीरे-धीरे उन सभी उलझनों का निवारण हुआ, सालों से ढूँढते हुए प्रश्‍नों के उत्तर मुझे मिले। दुख और पीड़ा के बादल छट गये और आत्म-ज्ञान (Knowledge of self) का सूरज रोशन हुआ। जब भी दुख के बादल वापस मेरे पास मँडराते हैं, मेरी ध्यान-साधना का प्रतिफल आत्म ज्ञान (Knowledge of self) उसे दूर कर देता है।

 

मेरा आत्म ज्ञान मुझे मार्ग-दर्शन करता है कि-तुम आध्यात्मिक जीव हो जो सांसारिक अनुभव के लिए आये हो। ये ज्ञान हुआ कि अच्छे कर्म से सुख और बुरे कर्मों से दुख और पीड़ा मिलती है। धन और शोहरत के रहते भी आदमी खुश नहीं, इसका मतलब सुख इनसे नहीं, अच्छे-कर्मों से प्राप्त होता है। श्री कृष्ण जी ने कहा है- " आत्म ज्ञान की एक किरण से सारे बुरे-कर्म धुल जाते हैं। ध्यान से ही आत्म ज्ञान की प्राप्ति होती हैं। " यह समझ आया कि- जीवन में कुछ करें तो धन या कीर्ति के लिये नहीं क्योंकि यह कुछ पल के लिए ही है, बल्कि अनुभव के लिये करें। ध्यान की साधना से मुझे ये समझ आया, कि हर चीज़ कुछ समय के लिये ही है, कि- सभी जीव-पक्षियों से हमारा गहरा सम्बन्ध हैं- हर इन्सान से, पेड़-पौधे से, हर जानवर से, सृष्टि के हर कण-कण से। हम किसी से अलग नहीं हैं, किसी को दोषी ठेहराना अपने को दोषी करार देना है। इसलिए जानवरों को मारना बंद करें और शाकाहारी बनें। ध्यान से यह अनुभूति हुई कि हम सदा चैतन्यरूप है जो इन्सानी अनुभव के लिए जन्मे हैं।

 

हम अपनी सचेतना (Awareness) और करूणा (compassion) को बढ़ाने के लिए जन्म लेते हैं। इसी ध्यान से हम जब जीवन व्यतीत करते है, फिर जन्म-मरण के चक्र से हम मुक्त हो जाते हैं।

 

इसीलिए मेरे प्यारे भाईयों और बहनों ध्यान की साधना से आपका जीवन बदल सकता है- हमेशा के लिये।

 

राजशेखर

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