" मिशन ध्यान चण्डीगढ़ - 2009 "

 

मेरा नाम है राम राजू। मैं मूलतः आंध्रप्रदेश का रहने वाला हूँ। अब चण्डीगढ़ में रह कर भारत सरकार की नौकरी कर रहा हूँ। बचपन में मेरे मन में कई प्रश्‍न उठा करते थे-यदि ईश्‍वर कि सृष्टि में सब लोग बराबर हैं तो क्यों कोई जन्म से ही अंधा होता है, कोई बेहद सुन्दर होता है। क्यों कोई तो धनवान माता-पिता के घर जन्म लेकर आजन्म सुविधाएँ भोगता है और कोई मज़दूरी करता मर जाता है, क्यों कुछ लोग अच्छे कर्म करने के बावजूद कष्ट सहते रहते हैं, और कोई पाप-कर्म करके भी सुखी जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसे कई सवाल मेरे मन में उठते रहते थे पर कोई उत्तर नहीं मिलता था।

मैं अपने माता-पिता की एक मात्र संतान हूँ। गरीबी और अकेलेपन ने मुझमें हीन भावना भर दी। मन में कई सपने संजोए। सोचा था, नौकरी होगी, पैसा होगा, तरक्की करूंगा। समय आने पर नौकरी भी मिली, मैंने साथ-साथ बिज़नेस भी शुरु किया। इच्छा थी कि खूब पैसा कमाऊं और नाम भी कमाऊं। मैंने अपने कमरे की दीवारों पर अपने सपने लिख कर पोस्टर के रुप में चिपका रखे थे-कब कार आएगी और कब बंगला, सब सपने मेरे भीतर से नहीं जन्मे थे, दुनिया की देखा-देखी मेरे मन में आ बैठे थे।

अपने बिज़नेस में मुझे कोई लाभ नहीं हो रहा था। मैं बहुत मेहनत कर रहा था, पत्नी को भी छोड़ कर दूसरे शहर में धक्के खा रहा था, पर कोई परिणाम न निकला। व्यापार में मेरी संलिप्तता देख मेरा ट्रांसफर भी इम्फ़ाल (मणिपुर) कर दिया गया। यह मेरे लिए कठिन समय था, मैं ज़िंदगी के बारे में गंभीरता से सोचने लगा। मेरे ही साथ ऐसा क्यों होता है, मेरा कसूर क्या है ! सभी खुश हैं पर मैं इस छोटी सी उम्र में न जाने क्या कुछ सहने को मजबूर हो गया हूँ, तभी मुझे लगा कि मुझे सकारात्मक सोच बढ़ाने के लिए अच्छी पुस्तकें पढ़नी चाहिएँ। मणिपुर पहुँच कर मैंने बाईबल पढ़ी, स्वामी विवेकानंद की कुछ रचनाओं को पढ़ा और धीरे-धीरे आध्यात्मिकता की ओर आकर्षित होने लगा।

कुछ समय बाद जब मैं अपने गाँव पहुँचा तो मुझे किसी ने पत्री जी के बारे में और उनके ध्यान के बारे में बताया। यह भी मालूम पड़ा कि ध्यान करने से हर प्रकार की बीमारी दूर हो जाती है। मेरी माँ दस साल से अस्थमा से पीड़ित थी। मैं ध्यान-सभा में गया यह देखने को कि किस तरह इससे रोग दूर हो सकते हैं।

वहाँ ब्रह्मर्षि पत्रीजी ने ध्यान की क्लास ली, बहुत कुछ सिखाया। मेरी समझ में कुछ नहीं आया और ठीक से ध्यान भी नहीं लगा। हाँ, एक चीज अच्छी लगी-पत्रीजी ने कहा कि जो मन में है वह बाहर आना चाहिए। हमें दिखावा नहीं करना है। मैंने सोचा मैं क्या कर रहा हूँ, मेरे भीतर कुछ और है और बाहर कुछ और। किसी पर आता तो गुस्सा है पर ऊपर से हंस कर बोलता हूँ तो मैं भी तो दिखावा ही कर रहा हूँ।

क्लास खत्म होने पर जब बाहर निकला तो बाहर स्टॉल पर पत्रीजी द्वारा लिखित पुस्तकें देखी। बहुत सी पुस्तकें थी पर मैंने एक पुस्तक खरीदी-तुलसीदल। इस एक पुस्तक ने मेरी ज़िन्दगी को ही बदल दिया। धर्म, आध्यात्मिकता, जीवन का लक्ष्य तथा स्वयं अपने बारे में पता चला। बस तब से मैं ध्यान मार्ग में आ गया।

आरम्भ में मैं दिन में तीन घण्टे ध्यान करता था, पत्रीजी द्वारा बताई गई पुस्तकों को पढ़ता था। उनकी CDs और Cassettes सुनता था। मेरी भीतर जो भी ज्ञान सोया था, वह धीरे-धीरे बाहर आने लगा। ध्यान करते समय अपनी ज़िन्दगी की समस्याओं का सामाधान करने के लिए मुझे सन्देश भी मिलने लगे। ऐसा ही एक सन्देश मुझे यह भी मिला कि तुम्हें यह जन्म क्यों मिला है- आध्यात्मिक जीवन बिताने तथा लोगों को ध्यान सिखाने के लिए । संयोग की बात-तभी मेरा ट्रांसफर चण्डीगढ़ हो गया।

यहाँ आकर देखा कि कोई आनापानसति ध्यान कर ही नहीं रहा और न ही कोई पिरामिड ध्यान केन्द्र है। आंध्रप्रदेश में ध्यान घर-घर पहुँच चुका और इधर कोई इस बारे में जानता ही नहीं। बस मैंने निर्णय लिया कि स्वयं ध्यान प्रचार करूँगा और चण्डीगढ़ के घर-घर में इसे पहुँचाऊँगा।

सबसे पहले मैंने अपने सहयोगियों और सहकर्मियों को ध्यान सिखाने का काम शुरु किया। सैंकडों घरों में जाकर उन्हें ध्यान सिखाने का काम किया और खर्चा भी खुद ही उठाया। धीरे-धीरे ध्यान सीख कर लोग अपने-अपने कष्टों से मुक्ति पाने लगे, बीमारियाँ ठीक होने लगी। मानसिक तनाव से मुक्ति मिलने लगी और वे सत्य की ओर बढ़ने लगे। सौभाग्य से 15 अप्रैल 2008 को पत्रीजी चण्डीगढ़ पधारे। उन्होंने स्वयं क्लास ली, उसके बाद से इस शहर में इसका प्रचार-प्रसार होने लगा। मैंने सीनियर मास्टर्स के द्वारा स्कूलों, मन्दिरों, कॉलेजों तथा अस्पतालों में कई क्लासें लगवाई तथा असंख्य लोगों को ध्यान करना सिखाया।

इस ध्यान प्रचार के द्वारा मैंने स्वयं बहुत कुछ सीखा है। व्यावहारिक जीवन में प्रत्येक परिस्थिति में मुझे ऐसा अनुभव हुआ। मैं चाहता था कि लोगों को ध्यान के द्वारा दुख से बाहर निकाला जाएं। मेरे इस प्रयास में अनेक मास्टर्स तथा समाज के अनेक शीर्षस्थ लोगों का सहयोग मिला।

मैं अपने जीवन में प्रतिक्षण दो बातों को याद रखता हूँ और उनका अनुपालन भी करता हूँ। श्रीकृष्ण ने " भगवद्‌गीता " में कहा है-

उध्दरेदात्मनात्मानं आत्मानमवसादयेत्‌।
आत्मैवह्मात्‍यनो बंधु: आत्मैवरि पुरात्मनः॥

अर्थात्‌- इस जीव आत्मा का और कोई दूसरा शत्रु या मित्र नहीं हैं, अपने द्वारा अपना उध्दार स्वयं करें और अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचाए। दूसरे- You create your own reality.

अर्थात्‌ तुम अपनी वास्तविकता का स्वयं निर्माण करो। अपने जीवन को मनचाहा रूप प्रदान करो, और ऐसा तुम कर सकते हो। इन दोनों बातों को मैंने अपने जीवन में व्यवाहारिक जामा पहनाया है।

अब मैं स्वयं अन्य लोगों को ध्यान सिखाता हूँ और इस प्रकार बहुत कुछ खुद भी सीखता हूँ। कहा जाता है कि Teaching is the best way of learning. सत्य है, ऐसा मैंने अपने अनुभव से जाना है। पहले मन में हीन भावना थी- अब मेरी सोच Miraculous हो गई है, आत्मविश्‍वास बढ़ गया है, लगता है सब कुछ कर सकते हैं। आज मैं अनेक शैक्षिक संस्थानों में जाता हूँ, स्कूलों-कॉलेजों के प्रिंसिपल से या निर्दशकों से खुद बात करता हूँ। किसी हॉस्पिटल के मुख्य कार्यत्यारी अधिकारी से पूरे आत्मविश्‍वास के साथ बात करता हूँ और फिर वहाँ ध्यान भी सिखाता हूँ।

मेरा लक्ष्य है " मिशन ध्यान चण्डिगढ़ 2009 "। चाहता हूँ दिसम्बर 2009 तक चण्डीगढ़ के हर सेक्टर में ध्यान पहुँचाना। कुछ समय पूर्व तक जहां किसी ने पिरामिड स्पिरिच्‍य़ुअल सोसायटी का नाम नहीं सुना था वहां सबको यह संदेश पहुँचाया कि साँस के साथ रहो, " ध्यान करो " स्वयं को जानों। आज मेरे जीवन में कोई दुःख नहीं है। हर स्थिति में एक-सा रहता हूँ, सुख दुःख विचलित नहीं करते। मैं जानता हूँ कि मैं मात्र यह शरीर नहीं हूँ, विश्‍व की चेतना हूँ, एक चमत्कारिक रचनाकार। इस ध्यान के कारण यह जीवन धन्य है।

मैं पत्रीजी का हार्दिक धन्यवाद करता हूँ जिन्होंने मुझे एक आसान किंतु प्रभावी रास्ता बताया और मुझे विश्‍व चेतना का बोध कराया।

राम राजू
चण्डीगढ़
संपर्क : +91 9216177107

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