" भगवान बुध्द के पास ’आनन्द’ जैसे हैं "

 

ब्रह्मर्षि पत्री जी के निजी सचिव हैं श्री ए.वी. साई कुमार रेड्डी। पिछले कई वर्षों से उनके साथ हैं। उनकी हर सुख – सुविधा का ध्यान रखते हैं। उनकी हर यात्रा का प्रबन्ध करते हैं । खुद कभी सामने नहीं आते पर पत्री जी का हर कार्यक्रम वे ही विचारपूर्वक निश्‍चित करते है और उसे सफल बनाने का हर उध्योग भी करते हैं। आइए उनसे मिलें।

 

श्री साई कुमार रेड्डी, निरहंकारी, नित्यसंतोषी, आनन्द योगी, ब्रह्मर्षी पत्री जी के अत्यंत करीबी मास्टर्स में से एक हैं। 1996 से पत्री जी के साहचर्य में उनके “पेर्सनल सेक्रेटरी’ बने रहते हुए उत्तर भारत मे पी.एस.एस.एम. के कार्य निर्वाहक है। “ध्यान-जगत” के कार्यक्रमों में भाग लेने दुबई, इंगलैंड, ईजिप्ट जैसे देशों में भी पत्री जी के साथ ध्यान प्रचार कार्यक्रमों की व्यवस्था कर रहे हैं। श्री साई कुमार रेड्डी जी, पिरामिड स्पिरिच्‍युअल मूवमेंट में एक अति मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। पिरामिड मास्‍टर्स से सान्निध्य रखने वाले, सदा हँसमुख, मिलनसार स्वभाव वाले साई कुमार रेड़डी जी ने पत्री जी के चारों ओर परिभ्रमण करते रहना ही अपना जीवन ध्येय बना लिया है। “स्पिरिच्युअल इंडिया” द्वैमासिक पत्रिका के सारथी हैं। प्रति दो मासों में, बिना किसी अवरोधों के, संसार को, पत्रिका पहुँचाने में कर्मरत हैं। अंग्रेजी ब्रोचर्स छपवाना आदि उनकी इतर मुख्य सेवाएँ है।

 

ब्रह्मर्षी पत्री जी से, “श्री साई कुमार रेड़्डी जी का इंटरव्यू लेना चाह्ता हूँ सर।“ जब मैंने कहा तो पत्री जी ने कहा, “श्री ए.वी. साई कुमार रेड़्डी जी के बारे में पूछ्ना है तो वे बुध्द के पास आनान्द जैसे हैं। आनन्द स्वयं बुध्द के समीप सहचर बनने के पहले दो शर्तें लगाता है। वैसे ही मेरे सेक्रेटरी बनकर रहना, दूसरा उन्हें कभी भी चले जाने के लिए नहीं कहना अर्थात मुझसे दूर न करें, ऎसी दो शर्तें लगाकर मेरे साथ चलने वाले महानुभाव है ।“ पत्री जी के हाव-भाव, आदतें, विभिन्न प्रवृत्तियाँ तथा अनंतज्ञानपूर्ण संदेशों को अति निकट से ग्रहण करते तथा देखते हुए श्री साई कुमार रेडडी जी धन्य हैं।

 

मारम शिव प्रसाद : श्री साई कुमार रेड्डी जी ! आपका पत्रि जी से परिचय कैसे हुआ ? आपने सर्वप्रथम कब और किसके द्वारा ध्यान सीखा ?

 

साई कुमार : 1996 ई. में तिरुपति शहर में सर्वप्रथम “अन्नामलै” नामक पिरामिड मास्टर के द्वारा मैंने ध्यान पध्दति को सीखा था। तिरुपति में ध्यान शिक्षण की क्लास चलते समय अन्नामलै जी मुझे कंची रघुराम जी के पास ले गए। इस तरह मैंने “पिरामिड स्परिच्युअल सोसाइटी” में प्रवेश किया। उसके दो महीनों के बाद 1996 में “भीमास होटल” में पत्री जी से भेंट हुई। पहली बार मिलने पर उन्होंने मुझसे पूछा - “क्योंजी आप ध्यान में क्यों आना चाहते हैं ? ” " सर ! मेरे परिवार की परिस्थिति ठीक नहीं है। मैंने बहुत बड़ी मार खाई है सर ! “मैंने कहा। “जो गया सो गया। तुच्छ पैसा। तुम आ ही जाओ। “ सर ने कहा। ऎसी सांत्वना भरे शब्दों को सुनकर मैं ’सेक्रेटरी’ सा उनसे संलग्न हो गया।

 

पत्री जी ने एक शिला को शिल्पा के रूप में परिवर्तित किया। एक सूखता वृक्ष नव पल्लवित होकर फूल तथा रसमय आम दे रहा है अर्थात यह सब उनकी सहचारिता का ही फल है। ऎसे ही साहचर्य में पका हुआ मैं, उनका ’पर्सनल सेक्रटरी” बन गया, अपने जीवन के परम ध्येय को मैंने पूरा कर लिया।“

 

मारम शिव प्रसाद : आपको पुस्तकें बेचने की प्ररणा कहाँ से मिली ?

 

साई कुमार : पत्री जी से पहली बार मिलने के बाद, मानसिक व्यवस्था में निचोड़ा हुआ, मुझमें

 

एक नया उत्साह भर गया। “मैं फिर से साधारण मनुष्य बन सकता हूँ तथा साधारण जीवन भी चला सकता हूँ।“ ऎसा मुझे लगने लगा। पत्री सर से परिचय होने के बाद वे पुस्तकें देते थे, पढ़ने के लिए। उसके बाद हमारे कुछ मित्रों में यह चर्चा सुनने में आई कि – “पुस्तकें कहाँ मिलेंगी ?” कुछ पुस्तकें जो उपलब्ध हैं, उनके ज़ेराक्स निकालकर पढ़ना, कभी ठीक से प्रिंट न होना, ऎसी तकलीफ होती रहीं। मैं पहले पुस्तकों का व्यापार कर चुका था। मैंने सोचा - “मैं आर्थिक दृष्‍टि से भी स्थिर नहीं हूँ। ये पुस्तकें लाकर बेचूँगा तो ठीक रहेगा। तुरन्त पत्री जी से मिलकर पूछा –  सर ! ये सारी पुस्तकें कहाँ मिलती हैं, मुझे पता है । उन्हें खरीद कर लाऊँगा और आपके साथ घूमते हुए उन्हें बेचूँगा।“ उन्होंने स्वीकृति दे दी।

 

उस दिन से आज तक मैं शनै:शनै: अंग्रेजी पुस्तकें बेचते हुए, कर पत्र भी प्रिंट कराके बाँटते हुए, पत्री जी के पर्सनल सेक्रेटरी सा उत्तरभारत पूरा घूमता हुआ, ध्यान का प्रचार करता हुआ अपना जीवन सार्थक कर रहा हूँ।“

 

मारम शिव प्रसाद : योगी गण विलक्षण स्वभाव के होते हैं। यह तो सबको विदित है। किन्तु पत्री जी की शैली के बारे में आपके क्या अनुभव हैं ?

 

साई कुमार : पत्री सर की अपनी शैली है। ज़ेन मास्टर के पास ग्रेट अवेयरनेस होता है। ज़ेन मास्टर्स इनडायरेक्ट तरीके से बताते हैं। गुर्जिफ़ हैं वे अपने पास आने वालों को तुरन्त स्वीकार नहीं करते हैं। बहुत बार डाँट-फटकार कर उनकी सहन शक्ति का परीश्रण करके “सत्यान्वेषण के लिए उचित है या नहीं।“ इसका निश्‍चय करके ही उन्हें स्वीकार करते हैं। सूफी परंपरा में एक इम्मेन्स पेशंस है। एक शिष्य के चयन के लिए “मार्पा”,” मिलारेपा” का कितना परीक्षण किया गया, यह तो हमें मालूम ही है।

 

पत्री सर में, सारे गुरुओं, अनेकानेक महानुभावों, योगियों की सम्मिलित विलक्षण शैली को हम देखते हैं। एक-एक मास्टर से एक-एक रीति में व्यवहार करते हैं, पत्री सर एक मास्टर से अत्यंत सहन यिक्त होकर बर्ताव करते हैं कई तो अहंकार से आते हैं। किन्तु उनके पूर्वजन्मों के सुसंस्कार एवं महानता को पहचान कर,”अभी इन वासनाओं से ग्रस्त होने के कारण वे ऎसे हैं इन्हें मोल्ड करें तो, पूर्व संस्कार स्मृति में आ जायेंगे तब वे सन्मार्ग में आएँगे।“ ऎसे उनके साथ उनके ही स्टाइल में, उनसे व्यवहार करके,अत्यंत सहिष्णुता से यथाक्रम उन्हें मोल्ड करके उन्हें अपने ट्रैक में ले आते हैं। इतनी अदभूत निपुणता पत्री सर में है। बोधन में भी वे ऎसे ही है।

 

मारम शिव प्रसाद : पत्री जी ने नवरसों में सफलता पाई है। आपने कितने कोणों में उनको आँबज़र्व किया है ?

 

साई कुमार : बीभत्स सहित सभी रसों में उन्होंने सफलता पाई है। यदि कोई एक गलती करे, तकलीफदायक परिस्थिति हो, फिर भी एक बिभ्त्सता की सृष्टि करके, वे परन्तु उस परिस्थिति को अपने अधीन लाने में समर्थ हैं। एक पात्र से दूसरे पात्र में स्वयं को तुरन्तु बदल सकते हैं। फिर यदि उन्हें क्लास लेना पड़े तो तुरन्त अत्यंत शांत एवं प्रसन्न भाव से क्लास भी लेंगे। ऎसे ही ह्‍यूमर में जाकर यानि हास्य रस से सभी को हँसाकर लोट-पोट कर देंगे।

 

साधारणतया हम देखते हैं, एक सहज मनुष्य ने मानो अपनी पत्नी से झगडा किया। इसी बात को वह कुछ दिन अथवा कुछ हफ़्‍ते भी मन में रखकर पत्नी से व्यवहार करता रहेगा। ऎसे व्यक्ति को एक क्लास लेने पर या स्टेज पर आने पर भी उसके मुख मंडल पर पत्नी से झगड़े के कुछ चिह्‍न, व्याकुलता या उध्‍विग्नता आदि कुछ दिनों तक दृष्‍टि गोचर होते रहते हैं यही पत्री सर के विषय में देखे तो इधर डाँटेंगे, तुरन्त जोक्स सुनाएँगें। फिर तुरन्त किसी से साधारण सा वार्तालाप करेंगे। फिर यदि सामने वाले की बातों में कोई गलत दिखाई दिया तो उसकी धज्जियाँ उड़ा देंगे। फिर कुछ ही क्षणों में उनसे हाथ मिलाकर, उन्हें स्टेज पर ले जाएँगे और अपने पास बिठाकर उनसे बात कराएँगे।

 

तात्पर्य : समय के अनुसार बातें करेंगे।

 

समय के अनुसार कर्म करेंगे।

 

समय के अनुसार जीयेंगे।

 

मारम शिव प्रसाद : ऎसे पत्री जी व्यवहार करते हैं। ऎसे कर्म करते हैं। ऎसे जीते हैं समझ में न आने के कारण देखने वाले अपने बाल नोच लेते हैं ।

 

साई कुमार : एक इन्सान को समझने के  प्रयत्न करने से बेहतर यही होगा कि हम अपने आपको समझना प्रारन्भ करेंगे तो धीरे-धिरे सामने वाला भी समझने लगेगा। पत्री सर के एक्शन भी विभिन्न प्रकार के होते हैं। मैं स्वयं,प्रत्येक विषय में कितने भी संदेह हों, अपने आपको ’चेक’ करता हुआ उनके साथ मूव होता रहता हूँ। उनके साथ चलते हर कदम में, उनके विचार मेरी समझ में आते रहते हैं।

 

ऎसे ही प्रत्येक मास्टर को भी एक “लाँगा टर्म प्लान’, एक “शार्ट टर्म प्लान” करके उसके अनुसार जब का तब अपने आप में परिवर्तन करते जाना है। ऎसे ही पत्री सर भी जब-तब अपने आपको परिवर्तित करते जाते हैं । इसलिए उन्‍हें आसानी से समझ नहीं पाते हैं।

 

मारम शिव प्रसाद : 1997 से 2000 तक पत्री जी के बारे में,  2001  से  2004  तक “ध्यानांध्रप्रदेश” के काम निकले पत्री जी बारे में,  2004 से 2008” ध्यान भारत के अभियान पर निकले पत्री जी के बारे में बताइए।

 

साई कुमार : 1996 में मैं पहली बार उनसे मिला। 1997  से उनके साथ घूमना आरन्भ किया। तब सए जितनी समर्पित भावना से रहते थे, जो करने के प्लान्स वे किया करते थे, तब जितने उत्साहित थे, जो निर्दिष्ट अभिप्राय तब था, अभी भी ये सब रत्नी भर भी कम नहीं हुए और अधिक सुश्‍लिष्ट और अधिक परिश्रमी हो आगे बढ़ रहे हैं।

 

1997 में अधिक से अधिक दहाई में ही सेंटर्स होते थे। फोन करके “साई कुमार ! आज हमें नेल्लूर में क्लास मिला।“ आज तिरुपति में नया क्लास है।’ अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक ध्यान शिक्षण के क्लास को जाते थे। बताये गए क्लासों के बारे में फिर से रात को रिव्यू करते हुए, कितने ही नए कान्सेप्टस की चर्चा करते थे। “क्लास बहुत बढ़िया सुना लोगों ने” बहुत खुशी से बताते थे। 1997 से 2000  तक वह एक अदभुत समय था। सावकाश अवधि मिलती थी। सैकड़ों मास्टर्स उनके लिए प्रतीक्षा करते थे। प्रत्येक रात वे नए से दिख पड़ते थे। नए-नए कान्सेपट्स लेकर आते थे। अत्यंत अद्‍भुत रहते थे, उनके सारे कान्सेप्ट्स। उसके बाद भी 2001 से 2004 तक अथवा 2005 से अभी तक  2008 में भी वे प्रतिदिन उगते सूर्य हैं  प्रतिदिन नवीनतम से दीख पड़ते हैं पत्री जी। यातायात के साधनों में भी बदलाव आया है। तभी लाल बसों में घूमते थे। अभी समयाभाव के कारण एवं आवश्यकतानुसार हवाई जहाज़ों में घूम रहे हैं जहाँ तक मेरी जान-पहचान है, जहाँ तक मेरी जानकारी है, पिरामिड जगत के पत्री जी ऐसे ही हैं, ऐसे ही थे, ऐसे ही रहेंगे।

 

मारम शिव प्रसाद : फिर इतनी महान योजनाएँ “इंटर गेलाक्टिक फेडरेशन” की सूचनाओं के अनुसार वे कार्यान्वित करते हैं या उनके अन्दर से ही आने वाले संकल्प हैं ?

 

साई कुमार : निश्‍चित रूप से “इंटर गेलाक्टिक फेडरेशन” की सूचनाओं के अनुसार ही उनकी कार्य प्रणा ली होती है। इसके संदर्भ में मेरे साथ हुई एक गटना के बारे में  out of body experience बताता हूँ। 1999 में एक बार मैं ध्यान में सूक्ष्म शरीर यात्रा (Astral Travel) करते समय मैंने देखा एक आह‍लादपूर्ण प्रदेश में बुध्द बैठे हुए थे। पत्री जी उनके साथ में बैठ हुए थे। चारों ओर अर्द्द गोलाकार में अनेक मास्टर्स बैठ हुए थे। बिध्द कुछ बोल रहे थे। बुध्द की वाणी मेरी समझ में कुछ नहीं आ रही थी। पत्री जी सहित सभी तालियाँ बजा रहे थे। मैं पीछे खड़ा यह सब देख रहा था। उसके बाद मैं जाग गया। उस समय हमें महाराष्ट्र के साँगली शहर जाना था। कम रेलगाड़ी से सफ़र कर रहे थे। मैंने पत्री सर को जगाया और कहा – “सर ! साँगली स्टेशन 15 मिनट में आने वाला है।” पत्री सर ने उठकर पूछा – “रात की मीटिंग कैसी थी?” अब मैं सोच में पड़ गया। उसके पहले दिन कोई मीटिंग नहीं हुई थी। फिर मुझे समझ में आया कि उन्होंने रात की मेरी Astral Travel के बारे में पूछा था। तब मैंने रात की सारी बात बताई।

 

“आप उधर क्या बोल रहे थे, मेरी समझ में कुछ नहीं आया।” मैंने कहा। वे हँसे और कहा-कँग्राच्युलेशन्स......वेरी गुड। “इस प्रकार की सूचनाएँ बहुत बार मिलीं। उन्होंने कहा, “वह सब इंटरगेलाक्टिक फेडरेशन मीटिंग है।“

 

“सबसे पहले हिंसा को हमें छोड़ देना चाहिए।” वे कहते रहते हैं। “जैन धर्मावलम्बी तथा वैश्यों को ध्यान शिक्षण देना बहुत सरल है। क्योंकि वे शाकाहारी होने के कारण 50% तैयार रहते है। ये लॊग आसानी से ध्यान में आ जाते हैं। असली समस्या तो इन मांसाहारियों से है। इनमें जब परिवर्तन ला सकूँगा, तभी मेरे इस भूमि पर आने का कार्यक्रम परिपूर्ण होगा।“ ऐसे कहते हैं।

 

“इस पृथ्वी के सारे मानव भी अन्य प्राणियों के साथ सहजीवन में जीना चाहिए।” उन्होंने कहा। एक बार मेरे पूछने पर “जन्तुओं को ‘जू‘ में क्‍यों रखते हैं, सर ?” उन्होंने कहा-” जन्तुओं को बन्दी बनाकर रखने के लिए नहीं रखते। ऋषि आश्रमों की तरह उन्हें और हमें सबको मिलकर जीवन व्यतीत करना चाहिए। मनुष्‍य का एनर्जी लेवल इत्ना बढना चाहिए कि हमारे वाइब्रेशंस से क्रूर जन्तु भी हमारे साथ सहजीवन चला सकें।”

 

मारम शिव प्रसाद : फोटाँन बैंड वर्ष... 2012 दिसम्बर 21.... पत्री जी से इस विषय में अधिकाधिक क्लारिफिकेशन प्राप्त की होंगी आपने ?

 

साई कुमार : हमारे बचपन में “हिन्दु” पेपर के अंतिम पृष्ठ पर आध्यात्मिक विषयों के बारे में लिखा होता था। दूसरे पेपरों में भी “भाक्ति” के बारे में लिखा करते थे।

 

1987 के पश्‍चात देखिए..... मेरे अनुभवों से मैं बता रहा हूँ। 1998 से आध्यात्मिकता के बारे में चर्चाएँ बढ़ गई हैं। मुख्य रूप से नाइंटीन्स में उषाकाल से ही टी.वी. में, रेडियो में, उनेक चैनल्स में आध्यात्मिक प्रवचन अथवा भाषण आ रहे हैं। न्यूज़ पेपर्स में भी, वीक्लीज़ में,मासिक पत्रिकाओं में आध्यात्मिकता के बिना एक पेपर या मैगज़ीन नहीं हैं। 1997  से अभी तक मैं कन्याकुमारी से काश्मीर तक देश भर में कम से कम बीस बार घूम चुका हूँगा। लोगों में कितना परिवर्तन आया है ! हर परिवार में, कुटुम्ब में आध्यात्मिकता का ही चिन्तन, मनन और चर्चा हो रही है। अनेक स्थानॊं पर मैंने ध्यान दिया। अब जितने भी चैनल्स भी हैं, उतने ही स्पिरिच्युअल चैनल्स भी हैं। हर स्वामी जी या योगी जी अथवा मास्टर के मुख से “ध्यान” के बारे में ही सुनने में आ रहा है। हर आध्यात्मिक संस्था भी 2012 की विशेषता एवं प्रमुखता के विषय में बता रही है। हमारी तरह विश्‍लेषणात्मक ढंग से न सही किन्तु “कुछ होने वाला है। अथवा कुछ हो जाएगा। ऎसी बातें हर संस्था में बोली जा रही हैं।

 

 2012 के पहले समझ लीजिए हम दोनों के आजू-बाजू के खेत है और खेतों की सीमा के विषय में हम वाद-विवाद कर रहे हैं या झगड़ा कर रहे हैं। 2012  के बाद हम दोनों आपस में मैत्री भाव से बातें करेंगे। “क्यों झगड़ा करें। आप ही ले लीजिए।“ इस तरह की मैत्री भावना उजागर होगी। हम दोनों प्रसन्न एवं खुशहाली में जीयेंगे। परस्पर मैत्री भावना से सारे मनुष्य हिलमिलकर रहने का समय आएगा। यही तो है, सत्ययुग का अर्थ।

 

शारीरिक अस्वस्थता एवं मानसिक अस्वस्थता से जो मनुष्य ध्यान नहीं कर रहे हैं, वे 2012  के बाद निश्‍चित रूप से कष्ट उठायेंगे। इन परिस्थितियों से अपने आपको बचाने के लिए, सेल्फ डिफेन्स ... एक रक्षण कवच ही “ध्यान” है। एक तरह से जैसे अंतरिक्ष में घूमने के लिए विशेष पोशाक “स्पेस सूट’ रहता है। उसी तरह हमारे चारों ओर एनर्जीपूर्ण वाइब्रेशन सर्किल बनाने के लिए’ध्यान” अत्यंत अनिवार्य है। यह ध्यान कवच ही 2012 के पश्‍चात् सभी प्रकार के रोगों से हमें बचाएगा। हम ध्यान के द्वारा ही अपने आपकी रक्षा कर सकते हैं। हम ध्यान से ही अपने आपको बचा सकते हैं।

 

“इस भूकक्ष में और कठोर परिस्थिति को चलने नहीं देना है, ऎसे कहकर Galactic Federation Masters  सभी ने सोच विचार करते समय, सही समय में 1986  से फोटाँन बैंड भूमि कक्ष पर आया था। इस अद्‍भूत अवसर को Galactic Masters  ने इस Earth  Planet को सत्ययुग में परिवर्तित करने के अनुकूल बना लिया था। इसीलिए मास्टर्स सभी भूमि पर Walkin हो रहे हैं। हमारी चेतना में आ रहे हैं। बहुत सारे मास्टर्स इस समय भूमि पर जन्म लेने के लिए आतुर हैं। कुछ मास्टर्स ने जन्म ले लिया है इसलिए 1986 के बाद जन्में बच्चे  बहुत ही चतुर, होशियार, मेधावी तथा महान् विद्वान,महान् खिलाड़ी तथा आत्मज्ञानी हो रहे हैं। अद्‍भुत नवयुग हमें दिखा रहे हैं । सत्य की स्थापना कर रहे हैं । 

 

एक लाख चवालीस हजार पिरामिड मास्‍टर्स सत्य युग की स्‍थापना के लिए परिश्रम कर रहे हैं ऎसे पत्री जी ने क्लियर बताया है न। गेलाक्टिक फेडरेशन मास्टर्स द्वारा सैकड़ों वर्षों पहले ही देखा हुआ भविष्य दर्शन असल में यही है।

 

      मारम :  पत्रीजी की संगति में आ जाने के बाद अन्य किसी योगी या संत के पास जाने या इतर महाइपुरूषों से मिलने की इच्छा नहीं हुई, यध्यपि मैं पुस्तकें सभी की पढ़ता हूँ। पत्रीजी के बोध वचनों को सुनकर ही हम धन्य हो जाते हैं। आप क्या कहेंगे ?

 

        साई कुमार : मुझे भी ऎसा ही लगता है। एक बार जो अनुभूति हुई उसे दुबारा से अनुभव करने का मन नहीं करता। अनेक जन्मों में, अनेक गुरुओं से प्रप्त अनुभूतियों को फिर पाने की इच्छा नहीं होती। पत्रीजी ने सभी कुछ अच्छी तरह से अध्ययन किया है। सभी पुस्तकें पढ़ी हैं। सभी प्रकार की अनुभूतियाँ भी उन्होंने प्रप्त की हैं। अब वे सब कुछ हमें प्रदान कर रहे हैं। पत्री सर थियोसाँफिकल सोसाइटी में गए। वहाँ स्टडी करके उसका सार ग्रहण किया। रामकृष्ण मिशन में गए। इस तरह प्रत्येक सोसाइटी से सम्पूर्ण ज्ञान का सार उन्होंने एकत्र किया। पचास हज़ार से अधिक आध्यात्मिक पुस्तकों को पढ़ा और अन्त में महात्मा बुध्द द्वारा प्रबोधित आनापानसति को ही मूल तत्व के रूप में स्वीकार किया। इसके साथ पिरामिड शक्ति को जोड़कर जन्म- जन्मान्तरों से प्राप्त तथा इस जन्म में एकत्रित ज्ञान तथा निजी अनुभवों को जोड़कर उन्होंने जो आध्यात्मिक ’ ’ब्रह्मज्ञानामृत’ अथवा संजीवनी विधा तैयार की, वही वे हमें प्रदान कर रहे हैं। शहद का आस्वादन कर लेने के बाद अथवा अमृतपान कर लेने के बाद कोई चीज़ स्वाद नहीं लगती। इस सोसाइटी में आकर हम साब मास्टर्स हो गए हैं, अब हमें अन्य कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

     

   मारम – इस आध्यात्मिक यात्र में पत्री जी के साथ रहते हुए आपने कौन से सत्य को पा लिया? आप उससे किस प्रकार की  अनुभूति पा रहे हैं? भविष्य में आप किस तरह रहना चाहते हैं?

      

  साई कुमार – मेरा भूतकाल,वर्तमान,भविष्य सब पत्री जी ही हैं। उनके साहचर्य में रहकर मेरा अण्डरस्टेंडिंग लेवल निरन्तर बढ़ता जा रहा है, साथ-साथ मेरा आत्मोत्कर्ष भी हो रहा है। उनके ’ध्यान जगत’ के कार्यक्रम में ’ सर्वेजना सुखि:नो भवन्तु’  तथा ’वसुधैक कुटुम्बम’ जैसे लक्ष्यों को पाने में लगे उन महात्मा के साथ मैं पिछले बारह सालों से लगा हूँ। उत्तरभारत के लिए होने वाले कार्यक्रमों में मैं उनके साथ सेक्रटरी के रूप में रहता हूँ , यह मेरा परम सौभाग्य है।

 

        1996-97 में मेरी आर्थिक परिस्थिति अच्छी नहीं थी। एक दिन पीलेर नामक गाँव जाना था। पत्री सर ने कार की व्यवस्था करने को कहा। आने जाने में कम से कम सौ रुपए का डीज़ल तो लगना ही था। मैं सोचने लगा – मेरी परिस्थिति जानते हुए भी ऎसा क्यों कहते हैं ? कार की व्यवस्था तो कर दी पर सौ रुपए का जुगाड़ कैसे करूँ ? चलो, वापस आकर देखा जाएगा। मन में चिन्ता लगी रही। ’प्रात : छ : बजे हमें निकलता है।’ पत्री सर ने कहा। सोचते-सोचते मैं सो गया। रात 11.30 बजे किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी। ’कौन’? मैंने दरवाजा खोल कर पूछा। ’सर, मैं रायचोटी नामक गाँव से आया हूँ। मुझे ’तुलसीदल’ पुस्तक चाहिए।’ वह सौ रुपए देकर पुस्तक लेकर चला गया। उन रुपयों से कार में डीज़ल डलवाया। चलो, एक आफ़त तो टली,मैंने सोचा।

 

    सुबह पीलेर के लिए रवाना हुए। अब घबराहट इस बात की थी कि कार का किराया कैसे चुकाएँगे। घर की ज़रूरतों के बारे में सोच रहा था- सब मुसीबतें हैं। सुबह से ही कभी सब्ज़ी के लिए, कभी दूध के लिए- हर चीज़ के लिए संघर्ष शुरु हो जाता है। कैसे चलेगा ऎसे? ’ध्यान करने से सब कुछ मिलेगा ’ सब यही कहते थे। पता नहीं क्या मिलेगा, क्या नहीं मिलेगा। यही सब मैं सोच रहा था। थोड़ी दूर जाने के बाद पत्री सर ने पूछा, ’तुम किसके साथ रहना चाहते हो?’ सवाल मेरी समझ में नहीं आया। उन्होंने फिर पूछा, ’तुम दुर्योधन के साथ रहना चाहते हो या श्री कृष्ण के साथ?’ मैंने कहा – श्रीकृष्ण के साथ ही रहना चाहता हूँ,सर ।’ ’ठीक है, तो अच्छी तरह यह बात याद रखो।’ उन्होंने कहा। मैंने स्वीकृति में सिर हिला दिया। उन्होंने आगे कहा, ’मैं तुम्हें राजाओं में सम्राट सा  नहीं देखना चाहता, योगियों में सम्राट सा देखना चाहता हूँ।’ श्रीकृष्ण जिस तरह अर्जुन से योगी बनने को कहते  हैं उसी तरह पत्री सर मुझे योगियों में सम्राट्‍ सा बनने को कह रहे हैं, आध्यात्मिक सम्राट्‍ की तरह जीने को कह रहे हैं यह सुनकर मेरी आँखों में आनन्दाश्रु उमड़ आए। मेरे प्रति उनकी भावना कितनी ऊँची है। वह शुभ दिन मेरे जीवन में टर्निंग पाइंट बन गया।

 

       सोसाइटी में मैं दीनहीन, खाली झोली,खाली हाथ ले कर आया था। तेरह साल बाद भी मेरी परिस्थिति में कोई विशेष अन्तर तो नहीं आया है। एक बार मैंने उनसे पूछा – ’मेरा ending of the day  क्या है सर?’ उन्होंने हँस कर जवाब दिया – ’तुम्हारा ending of the day और beginning of the day ’ दोनों एक जैसा ही होना चाहिए। मैत्री को बढ़ाओ, good will को maintain  करो।’ यह वाक्य ही मेरे लिए प्रेरणा का काम करता है।

 

   पत्री जी के साथ आध्यात्मिक मार्ग पर चलते रहने में किसी को भी रोटी-कपड़ा-मकान की कमी नहीं होती। ज़रूरतें तो पूरी हो ही जाती हैं, किसी प्रकार की ’इच्छा’ नहीं रहती।

 

    मारम – फिर ’ज़रूरत’ क्या है और ’इच्छा’ क्या है?

 

    साई कुमार – पत्रीजी ने ही एक बार यह अन्तर समझाया था, मैं आपको बताता हूँ। उन्होंने कहा था कि ’मारम शिव प्रसाद को ’ध्यान यज्ञ’ का आयोजन करने के लिए था ’ध्यान ग्रामीण-2010’ प्राँजेक्ट के लिए टवेरा जीप तथा अन्य कई प्रकार की सामग्री की ज़रूरत होगी। यह उनकी ’ज़रूरत’ है। वही तुम्हें और तुम्हारे कामों के लिए ’इच्छा’ होगी। प्रतयेक मास्टर की ज़रूरतें तो पूरी हो जाती है किन्तु उनकी इच्छाएँ पूरी नहीं होती। मुझे पत्री सर की यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई – एक के लिए जो ’ज़रूरत’ है , दूसरे के लिए वह ’इच्छा’ स्वरूप होती है।

 

    मारम -  साई कुमार जी ! आप सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं, हमेशा शांत व हँसते हुए रहते हैं। कम लोग ही ऎसे दिखाई देते हैं, इसका रहस्य क्या है ?

 

     साई कुमार – रहस्य तो है आचार्य की संगति। दूसरा कारण है सादगी भरा जीवन। महीने में लगबग बीस दिन तो पत्री सर की संगत में रहने का सुअवसर मिलता है। उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ़ न हो और वे स्टेज पर बैठकर क्लास ले सकें – ऎसी प्लान बनाकर उसका इंतजाम करता रहता हूँ। कई सालों से यही कर रहा हूँ, उत्तर भारत के सभी कार्यक्रमों के लिए योजना मैं ही तैयार करता हूँ। आने-जाने की टीकटें, कहाँ रहना है, कहाँ भोजन करना है – इस सब की प्लानिंग मैं पहले से तैयार करता हूँ। मेरा ध्यान इस बात पर रहता है कि उन्हें किसी प्रकार की असुविधा या परेशानी न हो और वे कभी अप्रसन्न या दुख में न हों। मेरा उत्तरदायित्व है कि वे अपनी पूरी एनर्जीस के साथ स्टेज पर पहूँचे, छोटी-छोटी बातों के लिए उन्हें उलझना न पड़े। 2002 में पत्री सर ने कहा था कि 2004 में जब ध्यानांध्रप्रदेश का काम पूरा हो जाएगा तो हमारे मास्टर्स अलग-अलग ग्रूप बनाकर उत्तर भारत के लिए रवाना होंगे। तब तक उत्तर भारत में हमारे गाड़े हुए झण्डे गिरें नहीं, यह तुम संभाल लो।’ उनके कथनानुसार ही उत्तर भारत के सभी  सेंटर्स को संभालने में मैं प्रवृत्त रहा। 2005 से हमारे मास्टर्स मध्य भारत, उत्तर भारत और पूर्व भारत में प्रचार के लिए गए और अब वे वहाँ के सेंटर्स की सहायता से तेज़ी से ध्यान प्रचार का काम कर रहे हैं।

 

    मैं अब यह स्पष्ट जानता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए। करते समय भी मुझे एक ही बात ध्यान में रहती है कि इस सामुदायिक काम में सब हिस्सेदार र्है, इसलिए मैं आपने हैंड स्टेटस (open hand status)  में रहता हूँ। एक-एक प्राँजेक्ट आता रहता है और उसे सफलतापूर्वक सुसम्पन्न करते हुए प्रखर गति से आगे बढ़्ते रहना ही मेरा कर्तव्य है।

 

     मुझे क्लियरली पता है मुझे क्या करना है। मारम सर क्या कर रहे हैं, इस पर मेरी दृष्टि नहीं है। मैं वर्तमान में जीता हूँ, यही मेरी आनन्दित रहने का कारण है और यही मेरी विजय का रहस्य भी। जैसे कृष्ण जी ने संदेश दिया है –" कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।" मेरा काम है कर्म करना, फल तो पत्री जी देख लेंगे।

 

     मारम – पत्रीजी की उपस्थिति (presence) को आप कैसे फ़ील (feel) करते हैं ? उनमें कभी कोई miracles देखा है क्या ?

 

      साई कुमार – एक बार भोपाल के एक गेस्ट हाउस में थे। उनका सेक्रेटरी बने मुझे एक वर्ष भी नहीं हुआ था। अकस्मात उठाकर बैठे गए और पूछने लगे, ’साई कुमार ! Miracle  देखोंगे ?’ मैं आश्‍चर्य चकित हो गया, स्तब्ध रह गया। जब संभला तो पूछा, सर, यह Miracle क्या है ? आप कोई भस्‍म या अन्‍य कोई वस्तु निकाल कर दिखाएँगे ? मैं तो पहले ही आत्महत्या केलिए तैयार था और आज आप जैसे गुरु के साथ घूम रहा हूँ। यही क्या कम चमत्कार हैं ?’

 

      एक ही वर्ष में उनकी संगत में रहकर मेरी आत्म स्थिति ही इतनी उनन्त हो गई है। पिछले तेरह सालों से मैं उनके साथ रह रहा हूँ। यह मौका और किसी को नहीं मिल पाया। अधिकाधिक समय उनके साथ बिताना मेरा  परम  सौभाग्य है। ’आनन्द’ जिस तरह बुध्द के साथ घूमता था, मैं भी उसी तरह उनके साथ घूमता हूँ, क्या यह कम चमत्कार है?  निरन्तर तेरह वर्ष से उनके साथ रहना गत जन्मों के संस्कारों  से  ही साध्य है।

 

      मारम – आप एक enlightened master  हैं। इस पर क्या कहना चाहेंगे ?

 

      साई कुमार – इसमें कोई सन्देह नहीं कि मैं enlightened  master हूँ | अपने आपको जब तब चेक करता हुआ, खुद का संस्कार करता हुआ, जो कुछ उन्नति पाई है उसके कारण मैं धैर्यपूर्वक रहता हूँ। कुछ प्रमाण देता हूँ – (1) मैं हर तरह की परिस्थिति में प्रसन्न  रहता हूँ। (२) मेरे मन में किसी प्रकार के संशय नहीं हैं। (३) सभी से मैत्री भाव रखता हूँ। (4) सभी के लिए सुखी रहने की कामना व संकल्प मन में रखता हूँ।

 

      कुछ समय पहले पत्रीजी नेक्कल्लु नामक गाँव में एक दिन कहने लगे कि ’मास्टर’ का अर्थ है- मन पर आधिपत्य पाने वाला। 1999  की बात है। एक बार पत्री सर के साथ वेंकट गिरी के टूर पर रवाना हो रहा था। बाहर निकलते समय न जाने क्यों घर के अन्दर झाँक कर खिड़की से देखा तो मेरी पत्नी पंखे से फाँसी लगाने के लिए साड़ी को गले में बाँध रही थी। मैं तुरन्त खिड़की के पास जाकर बोला ’अगर फाँसी लगाना चाहती हो तो अपने मायकें में जाकर लगाओ। मैं तो अभी पत्री सर के साथ टूर पर जा रहा हूँ।’ एकदम से बोलकर सर के साथ चला गया। रास्ते में पत्री जी को यह वृत्तान्त सुनाया। उन्होंने हँस कर कहा – ’कुछ नहीं होगा’ शाम को घर लौट कर देखा तो वातावरण शान्त था, कुछ नहीं हुआ। 1999 में ही मैं इतना balanced  था तो अब तो उनकी संगति में इतने सालों से रह रहा हूँ। मैं enlightened हूँ, यह कहते हुए मैं गर्व महसूस कर रहा हूँ।

 

     मारम – जब मैंने पत्रीजी को बताया कि आपका इंटरव्यू ले रहा हूँ तो उन्होंने बताया कि बुध्द के पास दीक्षा लेते समय आनन्द ने भी कुछ शर्तें रखी थीं, इसी तरह आपने भी कुछ शर्तें रखी थीं। क्या आप उन पर भी प्रतिबन्ध लगा देते है ?

 

     साई कुमार – अभी आप यह बात कह रहे हैं तो मेरी आँखों में आँसू आ रहे है। मेरी हार्दिक इच्छा थी कि मैं उनका सेक्रेटरी बनूँ और उन्होंने यह स्वीकार कर लिया। 1999  में जब उन्होंने पिरामिड पार्टी स्थापित की तो मास्टर्स को पदवियाँ देकर कुछ उत्तरदायित्व भी दिए। जब मेरी तरफ़ देखा तो मैंने कहा- ’सर, आपके साथ पर्सनल सेक्रेटरी के रूप में रहने के अलावा और कोई पदवी मुझे नहीं चाहिए।’ ’ओ के ’ कहकर उन्होंने मेरी इच्छा पूरी कर दी। जहाँ भी मैं जाता हूँ, अपना परिचय देते समय मुझे गर्व व आनन्द का अनुभव होता है। जब कभी विदेशों को जाते हैं तब कई बार किसी से बात करने में अगर मुझे देर हो जाए तो खुद ही फ़ोन कर लेते हैं। अपने शिष्यों से जो प्रम व मैत्री भाव वे रखते हैं, उसका वर्णन करने के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास।

 

     इतना ही नहीं पत्री सर को मुझ पर अपार विश्‍वास है। एक बार अमेरिका में काम समाप्त करके मुम्बई लौट आए। वहाँ से हैदराबाद आना था। फ़ोन करके मुझसे कहा कि ’साई कुमार ! तुम मुम्बई आकर मुझे हैदराबाद ले जाओ।’ मुम्बई में हमारे बहुत से सीनियर  मास्टर्स हैं, वे सब सर के साथ ही रहते हैं परन्तु सर को मुझ पर विश्‍वास है कि मैं सहि प्लानिंग और व्यवस्था करके उन्हें साथ ले आऊँगा। इसलिए सर मुझे आनन्द जैसे कहकर याद करते हैं, मुझे इस बात की खुशी है।


        मारम – हर पिरामिड मास्टर, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कैसे भी हो, आत्मस्थिति में बहुत उन्नत है और आनन्द में रहता है। क्या आप भी आनन्दमय रहते हैं ?

 

        साई कुमार – एक बार पत्रीजी ने कहा था- ’भव दरिद्र’ रह सकते हैं’’भाव दरिद्र’ नहीं रहना चाहिए। भव में मैं अवश्य दरिद्र हूँ परन्तु भाव में नहीं। अच्छे संस्कारपूर्ण मार्ग को पत्री सर ने हमारे लिए खोला है। उनकी संगत में मैं भावों की महान स्थिति में ही रहता हूँ।

 

         मारम – पिरामिड मास्टर्स को कार्य सौंपने तथा उनसे कार्य निर्वहण कराने में पत्री जी निष्णात हैं, इस बारे में बताइए।

 

          साई कुमार – एक अद्‍भुत मार्केटिंग टेक्नालजी,मार्केटिंग एडमिनिस्ट्रेशन है पत्री सर में।’वे उस काम में माहिर हैं।’ कहकर वह काम उन्हें ही सौंपते हैं। किसे कौन-सा काम सौंपना है, किससे कैसा काम करवाना है, यह उन्हें बहुत अच्छी तरह मालूम है। लोगों को बाहर से ही देखकर उनके भीतर की सृजनात्मकता को पहचान कर उनकी अज्ञात अन्तर्शक्ति को बहार खींच कर काम करवाते हैं। एक विश्‍वामित्र, एक वशिष्ठ, एक चाणक्य, एक व्यास महर्षि...  इन सबको मिलाने से बनते हैं पत्री जी। शिला को शिल्प बनाकर उसमें प्राणशक्ति भर देते हैं। इसी प्रकार अनेक मास्टर्स तैयार किए हैं, कर रहे हैं और करते रहेंगे।

 

         मारम – एक क्लास में बहुत-से लोग आएँ या मात्र दस ही लोग आएँ, फिर भी पत्री सर प्रसन्न रहते हैं, किसी से कुछ नहीं कहते। क्लास सुव्यवस्थित हो तब कम लोग भी आएँ तो भी प्रशंसा कहते हैं-  इसका विवरण दीजिए।

 

         साई कुमार – पत्री सर के लिए नई जगह पर व्यवस्थित क्लास कभी क्लिक हो जाती है, कभी नहीं भी होती। बहुत से बैनर्स लगा कर, पेम्फ़्लेट बाँटकर ,मेहनत करने पर भी कभी दस लोग भी नहीं आते। ’सर ! हमने बहुत मेहनत की फिर भी दस लोग ही आए।’ चिन्तित भाव से हमारे ऎसा कहने पर वे यह कहते हैं,’तुम्हारे लिए काम के प्रति प्रसन्न रहना मुख्य बात है। कितने लोग आए या नहीं आए, इस बारे में मत सोचो। जब तुम लोग क्लास के लिए प्रबन्ध करते हो तब और लोगों को कोई और काम नहीं होता क्या ? तुम्हारे बैनर्स लगाने से, पेम्फ़्लेट बाँटने से क्या सारे लोग काम छोड़कर वहाँ आ जाएँगे ? ये दस लोग ही आए हैं तो उनकी बदकिस्मती है। तुम खुश रहो।’

 

          कभी कभी हमें रिलैक्स भी कराते हैं। ’साई कुमार ! मैंने दिल्ली शहर पूरा घूम लिया है। मैं रूम में रहकर पुस्तकें पढ़ता रहूँगा। तुम मारम सर को, निर्मला मैडम को, नागलक्ष्मी मैडम को, वेणु को सबको मैसेज दे दो। राघव राव से कहो, मुझसे बात करे। इस बीच तुम जाकर दिल्ली घूम आओ। सभी जगहों को अच्छी तरह देख लो। एंजाय करो। मैं रूम में रहूँगा।’ ऎसा कहते हुए मुझे बाहर भेजकर, स्वयं फ़ोन पर बात करते हुए पुस्तकें पढ़ते रहते हैं हमें इतनी स्वेच्छा और स्वतंत्रता दे देते हैं, तभी हमें अधिकाधिक और मनोयोगपूर्वक काम करने की क्षमता मिल जाती है। उनके पास जितनी स्वेच्छा व स्वतंत्रता है, उसकी वजह से हमारे मन में भी उतना ही गौरव सहज ही बना रहता है। वे इस तरह संतुलन बनाकर रखते हैं।

 

          मारम- पत्री सर किस चीज़ को प्रधानता देते हैं ? अपने लक्ष्यों को साधने के लिए उनके विचार कैसे होते हैं ?

 

           साई कुमार – पत्री सर केवल अन्तिम लक्ष्य को ही प्रधानता देते हैं। सामने आए प्रत्येक व्यक्ति को ध्यान-शिक्षण प्रदान करना है, यही ध्येय है। ऎसा करने में उन्हें कभी थकान या खीझ नहीं होती। यदि हमें लुधियाना जाकर क्लास लेना है। एक साधारण मास्टर सोचेगा कि लुधियाना कैसे जाना है, कहाँ ठहरना है, किससे मिलना है, कहाँ क्लास लेना है, कितना खर्च होगा वगैरह पर पत्रीजी यह सब सोच कर अपनी एनर्जी व्यर्थ खर्च नहीं करते । वे बस इतना ही सोचते हैं – लुधियाना जाकर क्लास लेना है। सारी एनर्जी इसी विषय पर केन्द्रित रखेंगे। हम भी अगर ऎसा ही करें तो निर्दिष्ट लक्ष्य को साध सकते हैं।

 

           क्षीर - सागर - मधनम में ऎरावत, कल्पवृक्ष, कामधेनु, कौस्तुभ मणि, लक्ष्मी देवी के निकलने पर भी इन सबको त्यागकर केवल ’अमृत’ की कामना की उन्होंने। यही ब्रह्म ज्ञान है, यही अन्तिम लक्ष्य है। इस सत्य को वे  सूक्षमत: जानते हैं। हर पिरामिड मास्टर को ऎसा ही करना चाहिए।

 

  मारम -  साई कुमार जी ! पत्रीजी के मुखमण्डल पर हमेशा एक दिव्य कांति फैली रहती है। राँयल बंगाल टाइगर जैसी एनर्जी और चेतक जैसी तेज़ी उनके व्यक्तित्व के अपने ही गुण हैं। जिस प्रकार साधना मार्ग में वे अत्युन्नत स्थान पर पहुँच चुके हैं उसी प्रकार ’ब्रह्मर्षी’ तत्व के साथ उनके ’एटिट्यूड’ में भी बहुत विलक्षणता है। महान महर्षी, ब्रह्मर्षी, स्वामी बाबा आदि लोग इस भौतिक संसार में रहते हैं परन्तु अलग-अलग प्रकार के लोगों से सामंजस्य बिठाने में उन्हें तकलीफ़ होती है। पत्री जी लाखों लोगों से चलते फिरते भी नित्य संतुलन बनाए रखते हैं इस बारे में क्या कहेंगे ?

 

   साई कुमार – पत्री सर हमेशा आनन्दित रहते हैं। अगर किसी के विषय में उन्हें कोई बात पसन्द नहीं है तो उसके मुँह पर ही धज्जियाँ उड़ा देते हैं। कोई बात दिल में छुपा कर रखना पत्री जी से होता नहीं है। वे कहते हैं, ’अगर कोई पसन्द नहीं है तो उसके बारे में सोचने पर अधिक एनर्जी व्यर्थ होती है। ’  अवेयरनेस होने पर भी उसके लुप्त होने पर हम दुखी हो जाते हैं। उनके पास loss of awareness बिलकुल नहीं होता। मस्तिष्क से ऎसे सब विचार हटा दो जिनका कोई प्रयोजन ही नहीं है। यह ’ चाँयस वलर्ड ’ है। सबकी अपनी अपनी इच्छाएँ अनिच्छाएँ हैं, जिसे जो पसन्द होगा वह वैसा करेगा ही।

 

   मारम – यात्राओं के समय पत्री सर कैसे व्यवहार करते हैं। अपने पसंदीदा व्यक्तियों के प्रति वे कैसे कहते हैं ? कहीं क्लास के लिए जाते समय किस तरह सफ़र किया करते थे? जब कारें नहीं थीं तब कैसे हर जगह पहुँचते थे ?

 

   साई कुमार – 1996, 97, 98  में ऎसी हाइटेक बसे नहीं थीं, न ही इतने अधिक साधन थे। यदि कम दूरी पर जाना हो तो स्कूटर या लाल बसों में ही अधिकतर जाया करते थे, नहीं तो फिर रेलगाडी के स्लीपर क्लास में जाते थे। उन दिनों स्लीपर क्लास में जाना भी हमारे लिए बहुत कठिन काम था क्योंकि तब तो थर्ड क्लास का टिकट भी लेकर देने वाला कोई नहीं था। अब तो ए.सी. में रहते हैं, हवाई जहाज़ से आते जाते हैं पर तब तो अनेक बार बिना रिज़र्वेशन के सफ़र किया है हम दोनों ने।

 

   जैसे ही ध्यान शिक्षण की कोई क्लास फ़िक्स होती, वे कहते थे – ’ चलो चलते हैं। ’ गर्मी के मौसम में भी बिना रिज़र्वेशन के ordinary compartment  में हमने कई बार सफ़र किया। मैं, पत्री सर और शिव प्रसाद तथा हमारे साथ पुस्तकों के ढेर हुआ करते थे। इन पुस्तकों को तिरपाल के बैग में लेकर जाते थे\ इन बड़े बड़े बैगों को बाथरूम के पास खाली जगह पर रख देते थे और एकएक घण्टा बारी बारी से उस पर नज़र रखते थे। इस सबके बावजुद पत्री सर ने कभी यह नहीं कहा कि मुझे कोई तकलीफ़ हुई ’ या ’मुझे इस तरह सफर करना पड़ा’। वे हमेशा यह कहते कि ’प्रकृति ने हमें अच्छा मौका दिया। ’ या ’ हम किसी तरह क्लास के लिए तो ठीक टाइम पर पहुँच ही गए। ’ या फिर कहते,’चलो फिलहाल ठहरने के लिए जगह मिल गई।’ इस प्रकार हमेशा प्रकृति के प्रति कृतज्ञ और प्रसन्न रहते थे। अगले दिन निश्‍चित जगह पहुँच कर आर्गनाइज़र्स से यही कहते कि ’ कोई तकलीफ नहीं हुई मैडम। हम आराम से आ गए। ’स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर तुरंत क्लास के लिए तैयार हो जाते।

 

     एक बार कर्नाटक में टुम्कूर से बस में चढ़े। हमें होंसपेट जाना था, बस में खड़े होने की भी जगह नहीं थी। भरी बस में किसी को पत्री सर का पैर लग गया। वह चीखा से, ’अरे बुड्ढे ! आँखों से दिखता नहीं है क्या ? ’फिर भी पत्री सर मुस्कुराते हुए मौन रह गए। वहाँ पहुँच कर मैंने लवीना मैडम को बताया – ’आज तो journey  बहुत  horrible थी, बहुत भीड़ थी।’  पत्री सर को खड़े रहने केलिए भी जगह नहीं थी।’ पत्री सर ने यह  सुनकर आसानी से कह दिया, ’ऎसा कुछ नहीं हुआ मैडम।’ आठ बजे सुबह वहाँ पहुँचे थे। घ्ण्टे भर में वे नहा- धोकर तैयार हो गए। यह उनकी स्थितप्रज्ञता का उदाहरण है। कोई और होता तो अपनी तकलीफ़ को बढ़ा-चढ़ा कर सुनाता पर वे तो दूसरों को भी correct  करते रहते हैं। ’तुम कैसे पहुँचे, यह जरूरी बात नहीं है। ज़रूरी यह है कि समय पर पहुँच कर क्लास लिया या नहीं। चाहे कैसे भी आए हो, क्लास को अटेंड कर पाना मुख्य बात है।’ किसी भी विषय में जितनी ज़रूरत है उतनी सावधानी बरतते हैं, जहाँ आवश्यक नहीं है वहाँ ध्यान भी नहीं देते।

 

     कभी कभी बहुत मेहनत के बाद क्लास के लिए एक जगह पहुँचते हैं। पहुँचकर पता चलता है कि क्लास कैंसल हो गई पर वे नाराज़ नहीं होते। संतुलित बने रहते है मानो कुछ हुआ ही नहीं। सर एक ज़ेन मास्टर की कथा अक्सर सुनाते हैं। एक घर के ऊपर की मंज़िल के एक कमरे में एक ज़ेन मास्टर बैठे रहते हैं। एक शिष्य घबरा कर दौडता हुआ आया और बोला – ’गुरूजी, नीचे रसोईघर में आग लग गई है और सारे घर में फैल रही है। आप खिड़की से नीचे कूद जाइए।’ ज़ेन मास्टर शांति से बैठे रहे, बोले कि ’आग तो रसोई में लगी है न, जब मेरे पास आएगी तब सोचेंगे।’ ऎसा नहीं कि वे सीरियस नहीं है। जब ज़रूरत हो बहुत सीरियस होते हैं, अनावश्यक परेशान नहीं होते। हर समय कोई न कोई काम में लगे रहते हैं। ’सदा सत्य ही बोलूँगा।’ ’सदा ध्यान शिक्षण करता रहूँगा।’ – यह उनका ध्येय है।

 

     कभी किसी दूर के सफ़र के लिए अगर रिज़र्वेशन नहीं मिलता तो मैं कहता – ’सर, कल चलेंगे।’ पर वे तुरंत कहते, ’नहीं बाबा! कल को कोई दूसरी अड़चन आ सकती है। आज ही चलेंगे।’ कितना भी परिश्रम करना पड़े, कितना भी दूर जाना हो, कितना भी भीड़ हो, रिजर्वेशन न मिलने पर भी वे यात्रा करते हैं। इस सबके बावजूद बहाँ पहुँच कर कभी कभी आखरी मिनट में क्लास रद्‍द होने के प्रसंग भी हुए पर वे नाराज़ नहीं हुए। “ हाँ जी, साई कुमार ! हमें भी तो रेस्ट चाहिए न। आज पूरा दिन रेस्ट लेंगे। फ़ोन मिलाइए।’ ऎसे कहकर शांत भाव से लेट कर मासटर्स से फ़ोन पर बात करते, टी.वी. देखते या कोई स्पिरिच्युअल पुस्तक पढ़ते हुए अथवा किसी से बातचीत करते हुए समय बिता देते हैं।

 

    मारम -  कुछ लोग अल्प ज्ञान के कारण सर की आलोचना करते हैं। इन कमेंट्स को सुनकर सर कैसे react  करते हैं ?

 

     साई कुमार – सर बहुत ही अद्‍भुत हैं। वे कहते हैं, ’ मेरे बारे में मेरे पीछे कोई कुछ भी कहे, मैं बिल्कुल ध्यान नहीं देता। वे लोग किस संदर्भ में और क्यों ऎसा कह रहे हैं, यह कौन जनता है। मैं केवल तब  react  करता हूँ जब मेरे सामने बात हो और वह भी उतना जितना ज़रूरी है।’ मैंने अक्सर देखा है कि उनके सामने आकर कोई कटु वचन कहे या निन्दा करे तो भी पत्री सर कुछ जवाब नहीं देते, वे सहिष्णु बने रहते हैं। ऎसा जीवन ही यथार्थ में योग तत्व है। छोटे से छोटे विषय को अनावश्यक महत्व देने से मनुष्य संकट में पड़ जाता है। ’टेक इट ईज़ी ’ पालसी होनी चाहिए और वह ध्यान के द्वारा जागरूकता के द्वारा ही सम्भाव है।’ 

 

     मारम - हमने देखा है कि पत्री सर किसी किसी को अपनी नजदीकी का एहसास भी कराते हैं परन्तु साथ ही एक दूरी (distance ) भी maintain करते हैं। सामने वाला ध्यान प्रचार के लिए उपयोगी सिद्ध होगा, ऐसा लगे तो उससे अत्यन्त विनयपूर्वक व्यवहार करते हैं।    

 

     साई कुमार – एक महायोगी को किसी के प्रति राग द्वेष नहीं होता। संगीताचार्य त्यागराज स्वामी ने कहा है कि समयानुकूल बातें ही करना चाहिए। काम के अनुसार ही किसी से भी व्यवहार करते हैं। एक क्षण हमसे बातें भी करते हैं, जोक्स भी सुनाते हैं किन्तु आवश्यकता पड़ने पर क्षण में सीरियस हो जाते हैं ! जिसे जहाँ रखना है, वहीं रखते हैं। किस सीमा तक निकटता रखनी चाहिए, उतनी ही रखते हैं किसी को भी ’अरे’ कहकर नहीं बुलाते, नाम से या ’ स्वामी जी’ कहकर छोटों – बडों को बुलाते हैं। महिलाओं को तथा बालिकाओं को भी मैडम कहकर बुलाते हैं।

 

     काम करवाते समय या किसी सब्जेक्ट को समझाते समय कठोर नहीं रहते। साधक के प्रति कर्कश नहीं रह सकते परन्तु दयार्द्र भी नहीं बन जाते। एक साधक के प्रति सद्‍गुरु कभी ’द्वेषभरित’ नहीं हो सकता परन्तु कठोरता से अवश्य व्यवहार करता है। ऎसे ही cut throat  सा सम्बन्ध रखते हैं। श्री युक्तेश्‍वर गिरी योगीश्‍वर भी ऎसे ही रहते थे। असीम प्रेम तथा अपार क्रोध दोनों से रहित हो किसी के अहं के थोड़ा संतुष्ट होने की प्रतीक्षा करते हैं। तत्पश्‍चात क्रमानुसार उसके अहं के लुप्त होने तक उन्हें तराश कर संवारते हैं। बीभत्सता की सृष्टि करके भी उस सत्कार्य को सम्पन्न कराते है। अगर किसी को कोई महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिया है और वह कुछ समय उस पर काम करते करते किसी कारणवश रूक जाता है तो वे क्रोधित नहीं होते बल्कि सबसे तालियाँ बजवा कर, उसकी प्रशंसा करके भेज देते हैं, यह सत्य है। वे तो ’Act as per  situation’  के सिध्दान्त को अपनाते हैं और क्षण भर में situation  को ही बदल डालते हैं। 

        

मारम – कोई कितना भी आत्मीय हो या महान मास्टर हो, आवश्यकता हुई तो उसे पास रखेंगे नहीं तो निकल जाने को बोल देते हैं पर उसके लिए द्वेष नहीं रखते, न ही कुछ कहते हैं।

  

   साई कुमार – हाँ, आप ठीक कह रहे हैं। कोई कितना भी महान हो, ध्यान प्रचार नामक महायज्ञ में कितना भी बृहत काम कर रहा हो परन्तु अगर organization  में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई समस्या उत्पन्न करता दिख पड़ता हो या किसी प्रकार का विघ्न डाल रहा हो तो वे उसे निस्संकोच दूर कर देते हैं। यही नहीं इस काम को  prolong  भी नहीं करते और फिर इस पर कभी चर्चा भी नहीं करते। जो पिरामिड मास्टर्स उनके द्वारा बताए अट्‍ठारह सूत्रों का पालन करते हैं उनका वे आदर करते हैं। किसी से गाली गलौच नहीं करते। किसी को कभी तकलीफ़ में नहीं डालते। किसी से द्वेष नहीं रखते।

 

     मारम – आपने एक बार बताया था कि पत्री सर एक ही समय में दो स्थानों पर दिखाई दिए। इसका विवरण दीजिए।

 

      साई कुमार – कुछ समय पहले पत्री सर अहमदाबाद के एक स्कूल में गए हुए थे। यह बात स्कूल वालों ने बताई किन्तु उसी समय पत्री जी गेंगटक में भी थे। ऎसी एक घटना मेरे साथ भी घटी। एक बार मैं ओंगोल में अपने चीफ़ पैट्रन तथा पिरामिड टूर्स एण्ड ट्रेवल्स के मुख्य पोषक श्री सिध्दा सूर्य प्रकाश राव जी के घर गया। वहाँ मैं उनसे और उनकी पत्नी जयश्री  जी से बहुत देर तक बातें करता रहा। रात के लगभग आठ बज गए होंगे। उस समय ओंगोल में चालीस दिन का घर – घर ध्यान का प्रोग्राम चल रहा था। प्रोग्राम आठ बजे समाप्त होता था। राव जी क्लास समाप्त होने के बाद भी मुझे यह कहकर साथ लेकर गए कि हमारे एक मास्टर से मिलवाना है। हम वहाँ गए, वहाँ कुछ लोग एकत्र थे। राव जी ने मेरा परिचय कराया और कहा कि ’ क्षमा करें, हम थोड़ी देर से आए हैं। साई कुमार जी पत्रीजी के सेक्रेटरी और सीनियर मास्टर हैं, आपको बहुत सी बातें बताएँगे।’ ऎसा कहकर उन्होंने मुझे बिठा दिया। मैंने लगभग एक घण्टे तक क्लास ली। एक व्यक्ति मुझे बहुत ध्यान से देख रहा था जबकि अन्य लोग ध्यान से सुन रहे थे। क्लास पूरी होने पर मैं सबसे मिला। वह व्यक्ति मेरे पास आया। बोला, ’ आप कह रहे हैं कि देर से आए किन्तु आप तो शाम को क्लास शुरू होने से पहले ही आ गए थे और मेरे पास बैठकर मेडिटेशन कर रहे थे।’ पत्री सर के साह्चर्य में ऎसे अदभुत चमत्कार होते रहते हैं, इन्हें ही हम miracles  कहते हैं।

 

   मारम – सर, आप और डी. शिव प्रसाद, दोनों पत्री जी के अत्यन्त सन्निहित रहते हैं। आपने बहुत कुछ देखा है। हमें कुछ ऎसा बताइए जो हमने पहले न सुना हो, न पढ़ा हो।

 

   साई कुमार – एक बार पत्री जी बोले – ’ आध्यात्मिक मार्ग पर उन्नति करते समय बहुत ही सावधान व संभाल कर चलना चाहिए। यह परम पद सोपान है, साँप, सीढ़ी भी यही है। इसमें अगर सीढ़ियाँ हैं तो साँप भी हैं। निन्यानवे पर पहुँच कर सबसे बड़ा साँप सामने आता है। अगर संभाल कर नहीं चलेंगे तो वहाँ से एकदम नीचे  आ जाएँगे। जागरूकता से रहेंगे तो आराम से पार हो जाएँगे, कर्म दग्ध हो जाएँगे। आध्यात्मिक अहंकार (Ego)  को पार लगाना बहुत ज़रूरी है। प्रशंसा पाकर फूल न जाओ, कभी भी निराशा व असहायता का अनुभव न करो, सजग-सचेत रहो तो निश्‍चय ही परम पद को पा सकते हैं। एक बार मेरा एक आत्मीय, सदा मेरे साथ रहने वाला एक मास्टर अचानक मुझसे दूर हो गया। इसी बीच उसका देहान्त हो गया। कल रात उसकी आत्मा मेरे पास आकर अपनी भूल पर पश्‍चात्ताप करते हुए मुझसे क्षमा याचना करने लगी। पत्री जी ने बताया कि उसे अपनी गलती सधारने में बहुत समय लगेगा।

 

    मारम – हमारे बारे में उन्हें पूर्ण जानकारी है। उनके आभामण्डल (aura)  की परिधि अनन्त है। उनकी दृष्टि सभी पर रहती है।

 

    साईकुमार – पत्रीजी कहते तो हैं ’मैं कुछ नहीं करता’ लेकिन सब कुछ वे ही करते हैं। हमें हमेशा कहते है ’ तुम निन्यानवे बार खुद प्रयत्न करो। अगर फिर भी सफल न हुए तो सौंवीं बार मेरे पास आओ।’ मैं विफल तो कई बार हुआ पर उनके पास खुद नहीं गया, वे खुद ही मेरे पास आए। हम अपने बारे में क्या सोच रहे हैं, उनको पूरा मालूम है। एक बार उन्होंने कह भी दिया था, ’क्यों जी साई कुमार ! मुझे कुछ नहीं मालूम, ऎसा समज रहे हो क्या ?’

 

    पत्रीजी जी डाँन जुआन टेक्‍निक बहुत कुछ follow  करते हैं। कुछ लोगों को बहुत ध्यान करने के लिए कहते हैं और कुछ से कहते हैं – ’तुम गत जन्म में बहुत साधना कर चुके, अब साधना नहीं, बोधन करो, आर्गनाईज़ करो, टीम तैयार करो, अमुक स्थान पर जाकर सेंटर की व्यवस्था करो।’ इस प्रकार उनके पास अनेकानेक प्रकार की अनुभूतियाँ हैं, अनेक विभूतियाँ हैं उनके साहचर्य में। कोई मन में कुछ भी सोचे उन्हें कोई परवाह नहीं, मुँह खोलकर सामने जो कुछ कहते हैं केवल उसी का ख्याल करते हैं।

 

    मारम – कुछ ऎसा बताइए जो उनसे कुछ देर तक दूरी पर रहने के समय घटित हुआ हो।

 

    साई कुमार – एक बार पत्री जी तिरूपति में भीमास होटल में ठहर हुए थे। उनसे मिलकर मैं अपने घर चला गया। रात को सो जाने पर मेरा सूक्ष्म शरीर निकल कर भीमास होटल की तरफ चला गया किन्तु होटल में प्रवेश नहीं कर पाया। होटल के चारों तरफ सब दिखाई दे रहा था, सिर्फ होटल ही दिखाई नहीं दे रहा था, । होटल का स्थान दिव्य प्रकाश से भर गया था जिसमें मेरा सूक्ष्म शरीर प्रवेश नहीं कर पा रहा था। दूसरे दिन होटल जाने पर हँसते हुए पत्रीजी ने कहा,’साई कुमार ! रात को तुम यहाँ आए थे न!’

 

    मारम – आप पत्रीजी के पर्सनल सेक्रेटरि हैं। आपको किस प्रकार के निर्देश देते हैं ?

 

    साई कुमार – हमें तो वे पहले ही बता चुके हैं, ’मेरी आँखों के इशारों के अनुसार तुम्हें सोचना चाहिए। मेरे हाव-भावों को समझकर ही तुम्हें मूव करना है। कभी दिखे, कभी न दिखे – इस प्रकार रहना है और सीनियर्स कोई भी मेरे पास मत आओ। आवश्यकता हुई तो मैं स्वयं आऊँगा।’ हम लोग तो रोज़ उन्हें देखते ही हैं तो कभी दिखे, कभी न दिखे – ऎसे ही रहना है उनके साथ। नए लोगों को उनके पास जाकर मिलने का अवसर देते हैं। यह देखते हुए कि किससे बार कर रहे हैं, क्या बात कर रहे हैं, हम ज़रूरत महसूस हो तो उन्हें वहीं छोड़कर दूर चले जाते हैं। जब वे हमारी तरफ देखते हैं तभी उनका इशारा समझकर पास आते हैं। यह उन्हीं से सीखा है। कभी कुछ काम करते हुए अगर उन्हें आकर बताते हैं तो कहेंगे – ’हाँ, ज़रूर करिए।’ बाद में अगर असमर्थ रहे तो फिर आकर पूछेंगे और बताएँगे कि कैसे यह काम अच्छी तरह किया जा सकता है। उनका विचार है कि शुरू में ही बता देने से लोग सीख नहीं पाते । वे किसी के भी काम को सँवार देते हैं, प्रशासनिक योग्यता भी बहुत है।

 

    मारम – तेरह वर्षों से आप अनेक साथ हैं। इस दौरान उनके साथ रहते हुए आपने बहुत कुछ साध लिया है।

 

    साई कुमार – मैं कभी ऎसा नहीं सोचता कि मैं कोई महत् कार्य कर रहा हूँ। हाँ, अपने कर्तव्य को निभाने के लिए मैं पूर्ण न्याय के साथ मेहनत करता हूँ। मैं इस विषय में अवश्य संतुष्ट हूँ। मुझे जो काम उनहोंने दिया है उसे अच्छी तरह निभा रहा हूँ। Spritual India पत्रीका को बिना किसी अवरोध के प्रकाशित करा रहा हूँ। विदेशों में तथा उत्तर भारत की हर यात्रा में अपने उत्तरदायित्व का अच्छी तरह निर्वहण कर रहा हूँ। नाँर्थ इण्डिया के सभी टूर, पिरामिड टूर्स एण्ड ट्रेवल्स, पर्सनल सेक्रेटरी का काम, तिरुवण्णामलै ध्यान यज्ञ एवं ध्यान ग्रामीण प्राँजेक्ट – ये सभी जिम्मेदारियाँ मुझे दी गईं। किसे क्या काम देना है, ये सर बखूबी जानते हैं।

 

    मारम – और अगर किसी को जिम्मेदारी से हटाना हो तो कैसे करते हैं ?

 

    साई कुमार – Unwanted things  को बड़ी संवेदन्शीलता से बदल डालते हैं। पत्री सर अत्यन्त नज़ाकत से यह काम करते हैं। जब किसी को काम देते हैं तो देखते हैं कि दूसरा कोई उसमें दखलन्दाज़ी न करे। तब बड़े आत्मीय भाव से कह देते हैं। यह काम तुम्हारे लिए नहीं है। तुम्हारे लिए तो एक और महान काम है।’ और इस प्रकार  चतुराई से उन्हें वहाँ से हटाकर कहीं और लगा देते हैं। अगर दिए गए काम में कोई बहुत सफल नहीं होता तो उन्हें कोई और काम देकर वहाँ से हटा देते हैं। इस प्रकार उनके साथ रहते हुए रोज अनेकानेक अद्‍भुत, अनुभव होते हैं, अश्‍चर्यान्वित कर देने वाली घटनाएँ होती हैं और वातावरण हर्षपूर्ण बना रहता है। पत्री सर के साहचर्य में तेरह वर्ष मैंने सम्पूर्ण महानन्द को प्रप्त किया है। बहुत कुछ मैंने सीखा है और बहुत अधिक पाया भी है। मैं सबसे अधिक सौभाग्यशाली हूँ ।

 

(अनुवादिका : एम. बुध्दिमती – 9346309536)

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