" जीवन का हर पल सम्पूर्णता से जी रही हूँ ... "

 

 

मैं संगीता नेहरा हूँ। हरियाणा राज्य के पंचकूला में रहती हूँ। मैं आयुष विभाग (हरियाणा) में बतौर डिप्टी डायरेक्टर काम कर रही हूँ। इस समय मैं 44 वर्ष कि हूँ। पिछले दो सालों से मैं ब्रह्मर्षि पत्री जी के पिरामिड स्पिरिचुअल सोसाइटीज मूवमेंट से जुड़ी हुई हूँ। मैं खूद भी नियमित रूप से ध्यान करती हूँ और परिवार के अन्य सदस्य भी इसमें पूरी रुचि रखते हैं। 

 

आध्यात्मिकता के प्रति मेरी रुचि बाल्यकाल से ही रही है। मुझे याद है बचपन में घर में एक मंदिर बना था जिसमें रोज़ घर के सभी सदस्य मिल कर आरती करते थे। मैं तो विशेष रूप से हर आरती के एक एक शब्द का उच्चारण करते समय उसकी शुध्दता का पूरा ध्यान रखती थी, हर शब्द के अर्थ को समझ कर उसे पूरा याद व मधुर करके बोला करती थी। घर पर आरती करना और स्कूल में माइक पर बोलना मुझे बहुत अच्छा लगता था। मुझे लगता बोलते समय शरीर अद्‌भुत चमक से भर जाता है। 

 

स्कूल की शिक्षा पूरी होने पर आयुर्वेद कॉलेज में मेरा दाखिला हुआ। ईश्वर के अस्तित्व पर आस्था शुरू से ही थी, पता था कि शरीर पाँच तत्वों का मेल है और इन्हीं से हमारी प्रकृति बनती है। शरीर, मन, आत्मा, शरीर की बनावट, इन्द्रियों, के बारे में तो जानती थी पर सब पढ़ते हुए भी मेरा मन और बहुत कुछ जानना चाहता था जिनका जवाब मुझे अपनी पुस्तकों में नहीं मिल रहा था। मुझे मन्त्रोच्चार करना, संगीत सुनना, नाटक करना, बिन्दु पर ध्यान लगाना, धार्मिक ग्रंथ पढ़ना, हवन करना, गुरुवाणी सुनना बहुत अच्छा लगता था। साधु-संतों की जीवनियाँ पढ़ना, गुरुओं की वाणी सुनना ही मुझे रुचता था, जीवन संबंधी कई प्रश्न मन में उठते रहते थे पर कोई संतोषजनक उत्तर देने वाला मेरे पास नहीं था। विवाह हुआ, बच्चे भी हुए, उन्हें पवित्रता और सच्चाई से पाला भी पर हर समय यह ही लगता कि जीवन का लक्ष्य केवल यह ही तो नहीं हो सकता पर वह है क्या, यह नहीं पता लग रहा था। प्राणायाम और योग करना भी चलता रहा, षट्चक्रों का ज्ञान भी पाया लेकिन न जाने मन में क्यों उदासी छाई रहती। जब नौकरी में आई तो मरीज़ों की बीमारियों के इलाज में खुद को व्यस्त कर लिया। उसमें खुशी तो मिल रही थी पर प्रश्न बरकरार थे। 

 

2007 में दिल्ली में एक आरोग्य मेला लगा। वहाँ मैंने Spiritual Reality नाम की एक सी. डी खरीदी। उसे देखकर मैं उसी तरीके से ध्यान भी करने लगी। उन दिनों मुझे विभाग की ओर से पुस्तकें लिखने का काम भी मिल गया। मैं पहले ही से कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए आयुर्वेद के कैंप भी लगाती आ रही थी और इसी प्रकार मैं परोक्ष रूप से समाज सेवा भी करती आ रही थी। योग के विभिन्न आसन आदि भी मैं नियमित रूप से करती थी। तभी मुझे मेरी एक मित्र ने फोन करके बताया कि सुखना लेक पर शाम को एक ध्यान की क्लास है, वहाँ जरूर आना। मैं वहाँ पहुँची, मुझे अच्छा लगा। वहाँ मेरी श्री रामराजू से मुलाकात हुई। मेरी यह इच्छा जानकर कि मैं ध्यान की क्लासेज़ नियमित रूप से अटेंड करना चाहती हूँ, उन्होंने मुझे रविवार को सूदभवन, चण्डीगढ़ में आने को कहा। जब मैं वहाँ गई तो क्लास शुरू हो गई थी। एक म्यूजिक की सी. डी. चल रही थी जिसमें पीछे तो समुद्र की लहरों की आवाज आ रही थी और पियानो बज रहा था। अचानक मेरे दिल की धड़कन बहुत तेज हो गई, मुझे लगा कि मैं खुद ही समुद्र के किनारे पहुँच गई हूँ और पियानो बजा रही हुँ। एकाएक लगा मैं खिंचती हुई एक सुरंग में पहुँच गई हूँ जिसके दूसरे किनारे पर रोशनी है। पर तभी ध्यान खत्म हो गया। मैंने निश्चय कर लिया कि रोज़ ध्यान करना ही है। वहीं से मैने ‘एक आत्मा की यात्रा’ पुस्तक खरीदी और घर लौटते समय रास्ते में ही उसे पढ़ना शुरू कर दिया। पुस्तक के प्राक्कथन को पढ़ कर लगा कि इस भौतिक जीवन से ऊपर बहुत कुछ है, मैं कहाँ इसी जीवन में फँसी हूँ। अब तो रोज ध्यान में अनुभव होने लगे, कभी रंग दिखते कभी सुरंग, कभी सुरंग पार कर रोशनी को पकड़ती। शरीर में ऊर्जा का तेज प्रवाह होने लगता, कभी लगता फूल बरस रहे हैं। 

 

इसी प्रकार लगभग एक महीना बीत गया, तब एक अनुभव हुआ। मुझे लगा मेरे आँखों के सामने एक स्क्रीन लगी है। मेरे मन का होई दरवाजा खुल रहा है और मेरे इस जन्म तथा पिछले जन्म के कई विचार उस पर लिखे जा रहे हैं और विचारों की लंबी कतार लगी है। इस प्रकार कुछ दिनों में मैंने अपने दस जन्म देख लिए। दिसम्बर 2011 में मैं महाचक्र में भाग लेने विशाखापट्‌टनम गई। पहले ही दिन जब सुबह तीन घंटे ध्यान में बैठी तो मुझे पिरामिड के महत्त्व का पता लगा। मैंने सोच लिया कि घर पर पहुँच कर पिरामिड तो बनवाना ही है। अगले दिन जब सुबह के समय पत्री जी की बाँसुरी की आवाज सुनी तो दिखा कि ब्रह्माण्ड के सभी जीव भागे हुए यहीं चले आ रहे हैं और सबके सिर पर पिरामिड है। फिर बाँसुरी का आकार इतना बड़ा हो गया कि उसी में सारा ब्रह्माण्ड समा गया। देखते देखते बाँसुरी खुद ही षट्‌चक्र और सहस्रार में परिवर्तित हो गई। उससे अगले दिन मैंने देखा कि धरती मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। मेरे पैर के अँगूठे से असंख्य छोटे-छोटे पिरामिड निकल कर पृथ्वी पर फैलते जा रहे है। मैं पाँच दिन वहाँ रही, रोज नए अनुभव होते रहे। 

 

विशाखापट्‌टनम से लौट कर मैने अपने घर पर 8*8 का एक पिरामिड बनवाया और अगले महीने फरवरी में जब पत्री सर चण्डीगढ़ आए तो उन्होंने ही उद्‌घाटन करने के साथ-साथ उसका नामकरण भी किया... श्री धन्बन्तरि पिरामिड। मैं रोज उसमें बैठकर ध्यान करती हूँ। सप्ताह में एक दिन मेरे यहाँ ध्यान क्लास होती है जिसमें पिरामिड मास्टर्स आकर सबके साथ अपना ज्ञान बाँटते हैं। सोनीपत में भी मैं नियमित रूप से ध्यान प्रचार का कार्य करती रहती हूँ। मेरे पति भारतीय पुलिस सर्विस में हैं और वहाँ नियुक्त हैं इसलिए वहाँ मेरा आनाजाना अकसर लगा रहता है। वे खुद भी ध्यान करते है और मैं सोनीपत में कई तरह के कैंप आदि भी लगाती रहती हूँ। 

 

कुछ माह पूर्व मैंने पंचकूला में अपने विभाग के सहयोग से एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया था जिसमें पत्री सर ने सम्मिलित होकर ध्यान तो सिखाया ही, पंचकूला के लोगों से पहली बार मुखातिब भी हुए। ध्यान में आने के बाद से मैं जीवन को जीने लगी हूँ, हर पल यह मुझे कुछ नया सिखा जाता है। मेरा सोचने का ढ़ंग ही बदल गया है। जी चाहता है कि हर वक्त बस इसी तरह ध्यान करूँ, पुस्तकें पदूँ, लोगों को ध्यान शिक्षा देती रहूँ। जब बाहर से मास्टर्स आते हैं तो उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। मुझे उनसे अपने बहुत से प्रशनों के उत्तर मिल जाते हैं। नहीं जानती जीवन किस ओर बढ़ रहा है पर इतना जरूर जानती हूँ सही दिशा में बढ़ रहा है। मैं अपनी पूरी सामर्थ्य व योग्यता के अनुसार इस अभियान में सहयोग दे रही हूँ और देती रहूँगी। जीवन को अर्थपूर्ण मोड़ देने के लिए मैं सदैव पत्री सर के प्रति कृतज्ञ रहूँगी।

 

 

संगीता नेहरा
पंचकूला, हरियाणा
सम्पर्क : +91 9876659800

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