" पत्रीजी ने मेरे जीवन को परम सार्थकता प्रदान की है "

 

मेरा नाम संजय है। पिछले कुछ वर्षों से पिरामिड स्पिरिचुअल सोसाइटीज़ मूवमेंट द्वारा हो रहे अनेकानेक महत आयोजनों, ध्यान महायज्ञ, बुध्द पूर्णिमा महोत्सव, शिवरात्रि के अखण्ड ध्यानोत्सव और अब यह ध्यान महाचक्र... जहाँ कहीं भी मुख्य कार्यक्रम होते हों, पत्रीजी के वेणु वादन (मुरली वादन) के मनोहर रसगान में, मेरे सितार द्वारा राग रंजित, नाद ध्यान कार्यक्रमों द्वारा मैं आप सब से सुपरिचित हूँ।

 

मेडिसिन में उच्च शिक्षा प्राप्त करने पर भी, बचपन से मैं अत्यंत संगीत प्रेमी था। सितार बजाना मुझे इतना अच्छा लगता था कि दिन का आधा भाग तो उसी में बिताता था। संगीत की इस महान रुचि के कारण मैंने अपनी डाक्टरी वृत्ति को त्याग कर हैदराबाद में " प्रतिमा डिजिटल स्टूडियो " की स्थापना करके, ऑडियो - वीडियो रिकार्डिंग करना आरम्भ कर दिया।

 

आठ वर्ष पूर्व मैं पद्‌मश्री डॉ. यल्ला वेंकटेश्‍वर जी के मृदंग वादन के कैसेट्‍स बनाता था। एक दिन वे ब्रह्मर्षि पत्री जी के मुरली वादन से मिलाकर ‘ध्यान मृदंग’ के कैसेट बनाने के सिलसिले में हमारे स्टूडियो में आए। तभी मैंने उनके रिकार्डिंग्स्‌ के द्वारा ‘ध्यान’ के बारे में सुना तथा उसके महत्व की जानकारी भी प्राप्त की। संगीत का ज्ञान होने के कारण मैंने उन कैसेट्‌स को एडिट करके सुचारु रूप से तैयार किया। मेरे उस कार्य विधान को देखकर ब्रह्मर्षि पत्री जी ने मुग्ध होकर मेरी प्रशंसा की।

 

उसके पश्‍चात्‌ हैदराबाद की पिरामिड मास्टर एम. निर्मला देवी ने मेरे पास आकर ब्रह्मर्षि पत्रीजी के प्रवचनों की रिकार्डिंग करके देने की इच्छा प्रकट की ताकि उनके कैसेट बन सकें। ‘यह तो मेरा सौभाग्य है,’ ऐसा मानकर मैंने तुरन्त यह काम करना स्वीकार किया। अभी ब्रह्मर्षि पत्री जी के प्रवचनों के जितने भी कैसेट्‌स हैं, ‘वे सभी हमारे स्टूडियो में तैयार हुए हैं।’

 

तब से मैं यह सोचने लगा कि सभी भगवान के दर्शनों के लिए मंदिर में जाते हैं... यहाँ भगवान स्वयं मेरा उध्दार करने, मेरे स्टूडियो में आते हैं। मैं अनेकानेक आध्यात्मिक सत्यों, अद्‌भुत ज्ञान सम्पदा को प्रवचनों के रूप में रिकॉर्ड करते हुए, अपने आपको भूलकर, तन्मय हो सुनता रहता था। उसके बाद भी एडिटिंग, रीमिक्सिंग के समय में उन्हें बार - बार श्रध्दापूर्वक सुनने के कारण, वृत्ति रूपी उत्तरदायित्त्वों के साथ - साथ अनंतानंत आध्यात्मिक सम्पदा को मैंने हस्तगत कर लिया। इस अनपेक्षित वरदान के लिए मैं आजन्म उनका ऋणी रहूँगा।।

 

इसके पश्‍चात्‌ मेरी ध्यान संगीत यात्रा में मुझे अन्य कलाकारों अर्थात्‌ तबला, मृदंग, वायलिन के मास्टर्स से मिलकर ब्रह्मर्षि पत्री जी के मुरली वादन में सम्मिलित होने का सौभाग्य प्रारम्भ हुआ। लाखों ध्यानियों को इस तरह ध्यानानन्द के महा सागर में डूबते देख, मेरा हृदय भी आनन्द मग्न हो जाता है। उस समय मैं भी अलौकिक आनन्द में तन्मय हो, दूसरे लोकों में विचरता रहता हूँ।

 

शिरडी, बंगलुरु, कर्नूल, अरुणाचलम्‌, श्री शैलम्‌, अमरावती ऐसे सभी ध्यान महा यज्ञों के कार्यक्रमों में भी अधिकाधिक बढ़ते हुए ध्यानियों को देखकर मुझे बहुत आश्‍चर्य होता है। इन सभी की पराकाष्ठा के रूप में अभी दिसम्बर 2011 में विशाखापट्‌टनम के ध्यान महाचक्रम्‌ में परमाद्‌भुत अनुभव हुआ जब पत्री जी ने मुझे वहाँ सम्मानित किया।

 

साधारणतः रोगों को दूर करने वाला डॉक्टर होने पर भी भवरोगों को दूर करने वाले इस ध्यान संगीत के साम्राज्य में मैं जिस लक्ष्य से आया, उसे सम्पूर्णतः प्राप्त करने के लिए यह अद्‌भुत कार्यक्रम था।

 

अनेकानेक कार्यक्रमों में मंच पर जगत्‌ गुरु ब्रह्मर्षि पत्रीजी के हाथों से सत्कार पाना मेरे अनेक जन्मों के महाभाग्य ही हैं। ‘इस जन्म में इससे अधिक सौभाग्य और क्या हो सकता है। मैं धन्य हो गया।’

 

मेरे जीवन को सफलता देकर, इसे एक अर्थ एवं परमार्थ देने वाले पत्री जी को अनेकानेक हार्दिक प्रणाम। अब आगे भी लोक कल्याण हेतु कार्यक्रमों में उनकी संगति में, उनके मधुरातिमधुर मुरलीनाद में तल्लीन हो, अपने सितारवादन के द्वारा मैं अपने इस जीवन से तर जाऊँगा, यही मेरा मानना है।

 

Dr. संजय किंगी
संपर्क - +91 8008063363

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