" मेरे जीवन का सच "

 

मेरा नाम संजू है। मैं हरियाणा का रहने वाला हूँ। मैं एक अच्छे परिवार से हूँ, मेरे पिता जी एक किसान हैं और उसके साथ-साथ उनका अपना कारोबार है। जब मैं 45 दिन का था तब मेरी माता जी की मृत्यु हो गई। उसके बाद मेरे पिता जी ने दूसरी शादी करवा ली। शादी के बाद मेरी माता जी के साथ नहीं बन पायी और उसने मुझे घर से निकालने के लिए हर तरह से पूरी कोशिश की। इन हालातों को देखते हुए मेरे पिता जी ने मुझे बोर्डिंग स्कूल भेज दिया।

 

जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, मेरे अंदर हीन भावना और क्रोध बढ़ता गया। मैं सदा चिन्ता में रहने लगा, न ही मेरा मन पढाई में लगता था। कई बार तो मैं इतना परेशान हो जाता कि नौबत इतनी आ जाती थी कि मैंने कई बार आत्महत्या करने की सोची लेकिन सोचता कि आज नहीं कल करूँगा। धीरे-धीरे समय बीतता चला गया और मैं गलत संगत में पड़ गया। किसी से लड़ाई झगड़ा और कई ऐसी बुरी संगत लग चुकी थी जिसको देखकर मेरे पिता जी मुझ को डाँटते पीटते और घर से चले जाने को कहते पर मैं नहीं माना। जब भी मैं घर पर जाता कभी मेरी माता जी मेरे साथ कोई ना कोई बहाना बना कर झगड़ा कर लेती।

 

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मैंने फैसला किया कि मैं विदेश जाऊँगा और वहाँ जाकर खूब पैसा कमाऊँगा और कभी वापस नहीं आऊँगा। लेकिन मेरे पिता जी ने विदेश भेजने से मना कर दिया। मैंने देखा कि अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा सिवाय आत्महत्या के, तब मैंने अपने पिता जी को कहा कि या तो वो मुझको विदेश जाने दे नहीं तो मैं मर जाऊँगा। मेरे पिता जी ने कहा अगर विदेश जाना है तो यहाँ सब बुरी आदतें छोड़ के दिखाओ। मैंने सोच लिया कि जो भी हो मैं इन सभी बुरी आदतों को छोड़ दूँगा। मैं अपने दोस्त बलवीर के पास गया जो मेरे पड़ोस में रहता है। उसको मैंने अपने जीवन के बारे में सब कुछ बताया वह मुझे एक प्रसिध्द स्थान पर लेकर गया जहाँ पर सब के दिलों की इच्छा पूरी होती वह स्थान देवी-देवताओं के नाम से काफी प्रसिध्द है।

 

मैंने उसके बाद पूजा-पाठ, मंत्र-जाप, व्रत रखने शुरू कर दिये। मैंने बहुत सारे हवन भी करवाए, मेरा विश्‍वास था कि यह सब मुझे मन की शांति बनाए रखने में सहायता करंगे लेकिन ये सब कुछ करने के बाद भी मेरे मन को शांति नहीं मिली और मैं धीरे-धीरे बीमार रहने लगा। बहुत सारे डाक्टरों के पास भी गया लेकिन कोई भी नतीजा सामने नहीं आया।

 

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इस बीच में कई बार विदेश भी गया और वहाँ जाकर मौज मस्ती करके वापिस आ जाता। काफी पैसा बरबाद करने के बावजूद भी कुछ समझ नहीं आ रहा था। अब मैंने सोचा कि, मैं चंडीगढ़ जाकर रहता हूँ और मैं चंडीगढ़ आकर रहने लगा। लेकिन यहाँ भी वहीं बातें मुझे परेशान करती रहती। इस बीच मुझे एक दोस्त मिला। जिस का नाम अरविंद हैं, हम दोनों हर रोज क्रिकेट खेलते और काफी वक्त साथ बिताते। एक दिन वो मेरे रूम पर आया तो मैंने उसको अपने जीवन का हाल सुनाया। मैंने पूछा कि इसका कोई हल है, तो उसने मुझे बताया कि उनका एक मित्र है, वो मुझे उस से मिलवा देगा। मैं अगले दिन उनसे मिला जिन का नाम विनय कुमारजी है। उन्होंने मेरे जीवन की कहानी सुनी और बोले कि आपको एक ध्यान की क्लास में आना होगा। मैंने कहा ठीक है मैं आ जाऊँगा।

 

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वो दिन रविवार का था जब मैंने पहली बार क्लास लगाई जिस में रामाराजू सब को ध्यान के बारे में बता रहे थे। उन्होंने मुझ को कहा कि आप अपनी आँखें बंद कर लो और अपने दोनों हाथों की ऊँगलियाँ मिलाओ और टाँगें क्रॉस कर लो ताकि हम ध्यान कर सकें। जब मैंने पहली बार ध्यान किया मुझे इतनी शांति और खुशी मिली कि मानो मेरे अंदर का क्रोध और दूसरों के प्रति आक्रोश गायब हो गया। मैं धीरे-धीरे ध्यान करने लगा, मेरे अंदर की सारी बिमारियाँ गायब हो गईं। मैं एक दम स्वस्थ और हर पल खुश रहने लग गया।

 

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 यह मेरे लिए चमत्कार से कम नहीं था। एक दिन मैं ध्यान कर रहा था तो मुझे महात्मा बुध्द जी के साक्षात दर्शन हुए। मुझे विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा हुआ है क्यों कि मैंने इतनी पाठ-पूजा मंत्र-जाप व हवन करवाने के बावजूद कभी किसी देवी-देवता के दर्शन नहीं किए थे। इसके बाद ही ध्यान करते वक्त मैंने अपने आप को देखा और वह आकृति बिलकुल मेरे सामने थी जो कि मेरी ही सूरत थी। जब मुझे पता चला कि ये तो मेरी आत्मा है तो मैं एकदम चकित रह गया।

 

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इस के बाद मुझको विनय कुमार जी के साथ बैंग्लौर जाने का अवसर मिला जहाँ पर बहुत बड़ा पिरामिड है, जिस में बैठ कर पाँच हजार से ज्यादा लोग ध्यान कर सकते हैं| जब मैंने वहाँ बैठ कर पहली बार ध्यान किया तो मुझे पत्रीजी के दर्शन हुए जिन्होंने इस ध्यान की शुरूआत की है। इस के अगले दिन जब मुझे पत्रीजी मिले तो मैं बहुत प्रसन्न हुआ। मेरे अंदर एक अजीब सी लहर दौड़ने लगी और मैं अंदर ही अंदर भावुक होने लगा। उसके बाद पहली बार मैंने सभी ध्यानियों के साथ बैठकर पाँच घंटे तक ध्यान किया मानों ऐसा लगा कि अभी बैठे हैं। दूसरे दिन जब मैं ध्यान कर रहा था तो मुझे ओशो जी के दर्शन हुए। यह ध्यान तीन दिन का था जिसमें अलग-अलग राज्य व देशों से ध्यान करने के लिए लोग आए थे।

 

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वहाँ से लौटने के बाद मेरे जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ आ गई और मैं हर पल खुश रहने लगा। मैं हर रोज ध्यान करता हूँ। समय-समय पर जो भी मुझे मिलता मैं उन्हें ध्यान के बारे में बताता हूँ। आज मैं खुशहाल जीवन जी रहा हूँ, यह ध्यान करने से ही संभव हुआ। अब मेरे जीवन का एक ही मक्सद है कि मैं इस ध्यान को संसार के कोने-कोने तक पहुँचाऊँ और यह ही मेरे जीवन का सच है।

 

संजू
कुरुक्षेत्र, हरियाणा
संपर्क : +91 9780844623 

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