" मेरी ध्यान यात्रा - अपूर्णता से पूर्णता की ओर "

 

मेरा नाम सतीश चानना है। मेरी आयु 55 वर्ष है और मैं बैंक ऑफ़ बड़ौदा में मैनेजर पद पर कार्य करने के उपरान्त रिटायर हुआ हूँ। मेरी ध्यान यात्रा एक वर्ष पहले आरम्भ हुई जब मैं PSSM से जुड़ा। मेरा इस मूवमेंट से जुड़ना भी किसी अच्छे कर्म का परिणाम लगता है। कहीं जाते हुए एक चौराहे पर मैंने पत्री सर के प्रोग्राम का बोर्ड देखा पर प्रोग्राम की तारीख निकल चुकी थी। उसके नीचे लिखे फ़ोन नम्बर पर मैंने जसविन्दर मैडम से सम्पर्क किया तो चला कि अशोक नगर के सनातन धर्म मंदिर में प्रत्येक रविवार को सायं 4 बजे ध्यान की क्लास होती है। तब मैं भी वहाँ जाने लगा। ध्यान में आने से पहले बहुत सारी शारीरिक व मानसिक समस्याएँ थीं। धीरे-धीरे सभी तकलीफ़ें ठीक होन लगीं। मुझे शास्त्री सर, जसविन्दर मैडम तथा सभी मास्टर्स का ध्यान में मार्गदर्शन एवं भरपूर सहयोग मिला। 

 

कुछ समय पश्चात्‌ फिर पत्री सर का अशोक नगर के, सनातन धर्म मंदिर में कार्यक्रम हुआ। वहाँ उनसे पहली बार मिलने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि ध्यान करने के साथ-साथ अधिक से अधिक ध्यान प्रचार करो। शीघ्रही हमने मिल कर तीन जगह क्लास आरम्भ कर दी और ध्यान प्रचार में लग गये। 

 

जब गुड़गाँव में कार्यक्रम हुआ तो मुझे पत्री सर के बहुत करीब बैठकर बात करने का अवसर मिला। उस दिन की खुशी और प्रफुल्लता का मैं कभी नहीं भुला सकता। सर ने बड़े प्यार से कहा, कोई प्रश्न पूछो। किंतु उनके इतने पास होने से शायद सारे प्रश्न ही विलीन हो गये थे। इतने महान व्यक्ति की इतनी समीपता ने मुझे आनंद एवं संतुष्टि से भर दिया था। कुछ भी संशय शेष नहीं बचा था। 

 

Dr जी. के सर की क्लास attend करने का एवं उनसे मिलने का भी मुझे अवसर मिला। मैंने उनसे अपनी समस्याओं जैसे हमेशा थकान रहना, टाँगों में दर्द, साइनस इत्यादि पर चर्चा की। उन्होंने बड़ी आत्मीयता से सारी बात सुनकर कुछ उपाय बताये जैसे ध्यान का समय बढ़ाना, पानी चार्ज करके पीना, पुस्तकों का अध्ययन करना और ध्यान सिखाना। मैंने उसी दिन से उनके कहे अनुसार किया और सब समस्याएँ ठीक होने लगीं। इससे पहले लगता था जैसे वृध्दावस्था अब दरवाज़े पर खड़ी है। आने वाले समय में बहुत ध्यान रखना पड़ेगा एवं अपनी activities भी कम करनी पड़ेंगी परन्तु अब तो मैं जैसे अपनी आयु भूल गया ही हूँ। ऐसा लगता है जैसे कभी बुढ़ापा जाएगा ही नहीं और मैं हमेशा ऐसे ही ऊर्जा और उत्साह से भरा रहूँगा। 

 

मैंने बहुत ध्यानियों के अनुभव में सुना है कि उनके तनावपूर्ण रिश्ते भी मधुर बन गये हैं। इस बात पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकि अपने चचेरे भाई के साथ। वर्षों से मेरे तनावपूर्ण संबंध थे, जो मेरे प्रयत्न करने के बावजूद ठीक नहीं हो पा रहे थे। जब भी हमारा सामना होता, हम तनाव से भर जाते। इससे मेरा मन बहुत परेशान रहता था। सितम्बर, 2012 में मुझे पिरामिड वैली जाने का अवसर मिला। वहाँ बहुत सारे अच्छे अनुभव हुए। मैत्रेय बुध्द पिरामिड में किंग्ज़ चैम्बर में ध्यान कर ऐसा लगा जैसे सारी कमियाँ दूर हो रही हैं। पूर्णिमा ध्यान करते समय मैंने अपने आप को एक घने जंगल में एक पगडंडी पर चलते हुए पाया। चलते-चलते मैं जंगल के बीचों बीच एक सुंदर मैदान में पहुँच गया, जहाँ एक नदी बह रही थी। नदी की आवाज एक मधुर संगीत की भाँति सुनाई दे रही थी। सभी प्रकार के जानवर निर्भय होकर घूम रहे थे। तभी मैंने देखा एक बहुत बड़े वृक्ष के नीचे महात्मा बुध्द ध्यान कर रहे थे। मैं उनके पास गया और पास बैठ कर ध्यान करने लगा। जब हम ध्यान से बाहर आये तो उन्होंने मेरी ओर करुणा और प्रेम से देखा। मैं आनंद से भावविभोर हो गया। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति बुरा नहीं है। सभी भगवान हैं। हमारी बुराइयाँ केवल एक आवरण हैं जो हम बड़ी आसानी से हटा सकते हैं। किसी ने तुम्हारे साथ कितनी भी बुरा क्यों न किया हो उसे दिल से माफ कर दो, अपने मन को हल्का और साफ रखो। सभी से प्यार करो। वहाँ से वापिस आकर मैं अपने उस भाई से मिला। हम काफी समय बात करते रहे। ऐसा लगा मानो वह भी इस दिन की बरसों से प्रतीक्षा कर रहा था। मैंने पहल की और कहा कि " अगर मुझसे कोई गलती हुई है तो मैं उसकी माफी माँगता हूँ। हम पुरानी सभी बातें भूल कर फिर से शुरू करते हैं, पिछली किसी बात की चर्चा हम नहीं करेंगे। अब अगर कोई भी समस्या आती है तो हम मिलकर उसका हल निकाल लेंगे। " उस दिन से हमारे संबंध मधुर बन गये। सारी कड़वाहट पता नहीं कहाँ चली गयी। मुझे बहुत हलका महसूस हो रहा है। अब ऐसा लग रहा है जैसे मैं एक बहुत भारी पत्थर ढो रहा था, जिससे ध्यान ने मुझे मुक्ति दिलाई। 

 

करीब चार महीने पहले मैं लुधियाना में अपने मित्र से मिलने गया था। मेरे मित्र का बेटा अपने तीन मित्रों के साथ एक प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा था। वे सभी एक दिन में 16 से 18 घंटे पढ़ाई करते थे। सभी को मैंने काफी तनाव में पाया। जब भी थक जाते थे तो चाय या काफी का सहारा लेते थे। सभी को एसिडिटी, गैस और सर दर्द की समस्या थी जिसके लिए चूर्ण एवं दवाइयाँ ले रहे थे। भूख कम हो गयी थी और चेहरे से जैसे मुस्कराहट गायब हो गयी थी। मैंने उनसे कहा कि आप मेरे साथ थोड़ी देर ध्यान अभ्यास करो, आपको लाभ होगा। उन्होंने कहा, " अंकल हमारे पास तो ठीक से खाना खाने का भी समय नहीं है। " मैंने कहा, " आप करके देखो आपका समय भी बचेगा और आपकी पढ़ाई भी ठीक प्रकार से होने लगेगी। " मेरे आग्रह करने पर उन्होंने ध्यान में मेरे साथ बैठना आरम्भ किया। दो दिन में ही उन्हें अपने में परिवर्तन महसूस हुआ। मेरे वापिस आने के एक सप्ताह बाद उनका फोन आया कि उनकी गैस और एसिडिटी ठीक हो गयी हैं। थकावट और तनाव भी समाप्त हो गये हैं। दवाई बंद कर दी है और वह अच्छी तरह से पढ़ाई कर पा रहे हैं। अभी 15 दिन पहले फोन आया था कि उन चारों का दाखिला भी हो गया है। 

 

PSSM से जुड़ना भी एक सौभाग्य ही है। ऐसा लगता है जैसे एक बहुत बड़ा रूहानी परिवार मिल गया है जहाँ सभी एक दूसरे से प्यारे करते हैं, सहयोग करते हैं, मार्गदर्शन करते हैं, खुश रहते हैं और खुशी बाँटते हैं। 

 

ध्यान से सभी स्तर पर भरपूर लाभ हुआ। शारीरिक स्तर पर ज्यादा कार्य करने की क्षमता एवं पूर्ण स्वास्थ्य मिला। मानसिक स्तर पर मन शांत रहने लगा। गुस्सा और तनाव समाप्त हो गया। उचित निर्णय लेने की क्षमता का विकास हुआ। आपसी रिश्तों में आत्मीयता एवं स्नेह बढ़ा। ध्यान एक कामधेनु गाय की तरह है जो हर इच्छा पूरी करने में समक्ष है। यह एक ब्रम्हास्त्र की तरह है जो हर समस्या का समाधान है। यह एक रामबाण औषधि है जिससे सारी औषधियों से छुटकारा मिल जाता है। ध्यान एक साधारण मनुष्य से भगवान बनने का रास्ता है। सभी लक्ष्य, छोटे अथवा बड़े, ध्यान से प्राप्त किये जा सकते हैं। इसलिए ध्यान करना और कराना एक ऐसा कार्य है जो प्राथमिकता के आधार पर सभी को करना चाहिए। केवल इसी से सच्चे सुख, शान्ति और आनंद का अनुभव किया जा सकता है और सहज रूप से इस जीवन यात्रा का आनंद लेते हुए अपने जीवन के अंतिम लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है।

 

 सतीश चानना
दिल्ली
 संपर्क : +91 9871590900

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