" बस, ध्यान करें, चिन्तामुक्त हो जाएँ ! "

 

मैं शशि भूषण सूद हूँ। चण्डीगढ़ में रहता हूँ। पिछले दो वर्ष से आनापानसति ध्यान कर रहा हूँ। इससे पूर्व भी मैं ध्यान से किसी न किसी रूप में जुड़ा रहा हूँ। ध्यान की हल्की फुल्की कई exercises भी करता था परन्तु बहुत नियमित रूप से मैं ध्यानाभ्यास नहीं कर रहा था। एक बार आनापानसति ध्यान में आने के बाद यह अभ्यास भी नियमित हो गया है। मेरी धर्मपत्नी श्रीमती किरण सूद भी मेरे इस अभ्यास में मेरी संगिनी हैं और इस तरह सही अर्थों में मेरी जीवन संगिनी बन गई हैं।

 

मैं सूद सभा, चण्डीगढ़ में वाइस प्रेसिडेंट हूँ। यूँ तो यह सभा सूद समुदाय की है परन्तु इसके प्रमुख लक्ष्यों में एक है जन सेवा। जनसेवा के कई प्रोजेक्ट हमारी सभा द्वारा किए जाते हैं और हमारा भवन चण्डीगढ़ के सैक्टर 44 में है। हमारे लिए यह सौभाग्य व गर्व का विषय है कि पिरामिड स्पिरिचुअल सोसाइटी का चण्डीगढ़ में पहला केन्द्र हमारे सूद भवन में है। यह केन्द्र सभी के लिए खुला है। 2009 में जब इस केन्द्र की स्थापना हुई, तब हमें अभी ध्यान की इस विधि के बारे में बहुत जानकारी नहीं थी, इसलिए शुरू में हमने बहुत रुचि नहीं दिखाई परन्तु तभी ब्रह्मर्षि पत्री जी का चण्डीगढ़ में आगमन हुआ और सूद भवन में ही उनका पहला कार्यक्रम हुआ। पत्री जी का वह प्रवचन सुनने के बाद हमें इस ध्यान विधि के बारे में पता चला, हम प्रभावित हुए। जीवन में ध्यान की उपयोगिता के बारे में हमें जानकारी मिली और हमने निश्‍चय कर लिया कि हम नियमित रूप से ध्यानाभ्यास किया करेंगे।

 

2009 में मेडिटेशन सेंटर गए ज़रूर परन्तु किसी न किसी कार्यवश यह नियम दैनिक दिनचर्या का हिस्सा नहीं बन पाया जबकि हम दोनों को ही वहाँ बैठना अच्छा लगता था। यह नियम टूट गया, पत्री जी का फिर से आगमन हुआ और हमारी इस इच्छा को बल मिला। हमने फिर से जाना शुरू किया। इस दौरान श्री जीवन कल्याण और श्री बालाकृष्ण जी की एक दिवसीय कार्यशालाएँ भी सूद भवन में हुईं जो हमें बहुत लाभकर और उपयोगी लगीं। बीच बीच में अन्य शहरों से आने वाले सीनियर मास्टर्स से भी मिलने का मौका मिला। बस फिर तो हमारी शाम की ध्यान-सभा नियमित हो गई। मुझे खुशी है कि हम दोनों का रूझान एक-सा है इसलिए भी यहाँ आना सुगम हो जाता है। अब तो स्थिति यह है कि एक प्रकार की addiction सी हो गई है। अब शाम को और कोई कार्यक्रम नहीं रखते, केवल ध्यान के लिए ही यह समय निश्‍चित हो गया है। सभी जानते हैं कि इस वक्त हम वहाँ मिलेंगे।

 

आनापानसति ध्यान करने में बहुत ही सरल व उलझनरहित है। हमें ध्यान करने से बहुत ही शांति व हल्कापन अनुभव होता है, वहाँ अन्य मास्टर्स से मिलकर, उनसे बात करके, अपने अनुभव share करके हमें बहुत अच्छा लगता है। यदि कभी शाम को वहाँ न जा पाएँ या कहीं शहर से बाहर गए हों तो हम जहाँ हों, वहाँ भी ध्यान के लिए बैठते ज़रूर हैं।

 

इस दौरान कई बार जीवन में कुछ समस्याएँ भी आईं, share market के उतार-चढ़ाव से कई बार बहुत चिन्ता भी हुई पर ध्यान के कारण सब कुछ हम बड़े सहज भाव से झेल गए। अब मन इतना शान्त हो गया है कि उतार-चढ़ाव मन को उद्विग्न नहीं करते बल्कि मन केन्द्रस्थ हो चुका है। पहले मेरे सहयोगी कहा करते थे कि मैं जल्दी ही आवेश में आ जाता हूँ पर अब सभी ने मुझमें एक ठहराव को अनुभव किया है। मुझे भी लगता है अब मैं कई बातों को ignore कर देता हूँ जबकि पहले उसी बात पर बहस हो जाती थी। मेरी विचार-प्रक्रिया भी सकारात्मक हो गई है। इसीलिए मेरा रक्तचाप भी अब सामान्य रहता है। लगता है हमें कोई विराट शक्ति खुद संभाल रही है, हमने तो अब surrender कर दिया है और सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा है।

 

ध्यान की अनुभूति एक अलग सी अनुभूति है। कभी किसी वजह से सुबह जल्दी आँख खुल जाए तो भी हम ध्यान में बैठ जाते हैं, ध्यान करते करते ही नींद भी आ जाती है। मन शान्त रहता है। मैं सभी पाठकों से कहना चाहूँगा कि आज की भागमभाग वाली दिनचर्या में तनावरहित होने के लिए ध्यान एक बहुत ही बढ़िया तरीका है। अपनी सारी चिन्ताएँ छोड़कर ध्यान करें, पुराना सब भूल कर नया जीवन शुरू करें, सोच को सकारात्मक रखें। बस फिर जीवन शांति, सुख व आनन्द का पर्याय बन जाएगा।

 

शशि भूषण सूद
चण्डीगढ़
 

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