" आनापानसति ध्यान ही... ध्यान का सही तरीका है। "

 

मैं सतीश नागवंश बीदर का निवासी हूँ।

 

मेरा जन्म बीदर के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। बचपन से ही नाचना, गाना, खेल कूद आदि मेरे शौक थे। जब थोड़ा होश आया तो मुझे कुछ खालीपन महसूस होने लगा।

 

मैं पन्द्रह साल की उमर में ही हैदराबाद आ गया और यहाँ मेरी मुलाकात रविन्द्र व नरेन्द्र जी से हुई। उन्होंने 1997 में मुझे ध्यान के बारे में बताया और ध्यान की शिक्षा दी। पहले दिन उन्होंने मुझे ध्यान में बठाया। मैं सोचकर बैठा था कि सिर्फ पाँच मिन्ट ही ध्यान करुँगा। परन्तु पाँच मिन्ट कब साढ़े पाँच घन्टों में परिवर्तित हो गयें पता ही नहीं चला।

 

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उस समय जो ध्यान का अनुभव हुआ उस अनुभव से मेरा जीवन ही धन्य हो गया। जब मैं अपनी दोनों आँखें बन्द करके हाथों में हाथ फँसाकर और अपनी साँस के साथ ध्यान में था तब मुझे एक अनुभव सा हुआ कि मैं शरीर से बाहर आ रहा हूँ और अपने ही शरीर को देख रहा हूँ। तब मुझे ज्ञान हुआ कि मैं शरीर नहीं अपितु एक आत्मा हूँ। जिसने आज यह शरीर धारण किया है, कल कोई और शरीर का रूप लेगी। इस अनुभव से मुझे पता चला कि शरीर क्या है, मैंने यह शरीर लिया है तो क्यों लिया है। मुझे इस शरीर में क्या करना है... क्या नहीं।

 

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इसी तरह मैं अपने ही शरीर के गोल-गोल घूम रहा था। घूमते-घूमते मैंने देखा कि धरती, आकाश, चाँद, सितारे, सूरज सब पीछे छूटते जा रहे है और मैं कहीं दूसरे ही लोक में आ पहुँचा हूँ। मुझे वहाँ कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था।

 

तभी मुझे अपने सामने एक मानव शरीर जैसा आकार दिखाई दिया। वह मानव ध्यान में बैठा था। मुझे देखकर वह उठ गया और मुझसे बातें करने लगा।

 

वह मुझसे कहने लगा कि आप बहुत महान है। मैंने कहा-क्यों? वह कहने लगा, " जो इंसान पहली बार ध्यान में बैठकर शरीर से आत्मा की ओर, आत्मा से परमात्मा की ओर आता है वो मेरे लिए बड़ा ही महान्‌ है। "

 

तब मैंने पूछा कि आप कौन है? वह कहने लगा, " मुझे नहीं पहचान सके? " मैंने कहा, " मुझे अपने और आपमें कोई अन्तर नहीं दिखाई दे रहा, जैसे मैं हूँ, वैसे ही आप हैं। " उसने कहा, " इस लिए आप महान्‌ हैं, क्योंकि जैसे तुम हो वैसे ही मुझे देख रहे हो। मुझे सबसे श्रेष्ठ आप का ध्यान लगा जिसके द्वारा आप यहाँ तक आ पहुँचे। " तब वह कहने लगे कि मैं "शंकर भगवान" हूँ। मैं इस जगह ध्यान कर रहा हूँ। तब मैंने कहा, "आप तो भगवान है; आप यहाँ क्या कर रहे हैं; आप को तो धरती पर रहना चाहिये। धरती पर तो लोग आपकी पूजा, अर्चना और भक्ति करते है।" उन्होंने कहा कि, "मैं यहाँ कुछ खोज रहा हूँ"।

 

वह यह कि जो आत्मा है वह क्या है? परमात्मा क्या है, भगवान कौन है? संसार, लोक-परलोक क्या है। मैं कुछ देख रहा हूँ और कुछ खोज रहा हूँ। "मैंने कहा आपकी खोज पूरी नहीं हुई इतने हजारों सालों से? उन्होनें जवाब दिया कि, "जो मैं खोज रहा हूँ उसका कोई अन्त नहीं है।"

 

तब मैंने कहा, "जब तक शरीर है, तब तक मैं धरती पर ही रहूँगा।" 

 

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उसी समय उस लोक में वहाँ पर ब्रह्मर्षि पत्रीजी आये और कहने लगे " सतीश जो आपने देखना था वो आप देख चुके, जो आपको पाना था वह पा चुके, जो आपको लेना था वह ले चुके, बस आप मेरे साथ धरती पर चलो। आपको अभी बहुत कुछ करना है। आपको सारे भारतवर्ष को ध्यान करवाना है। और ये जो रास्ता तुमने देखा है, यह रास्ता सबको दिखाना हैं। "

 

इतना कहकर पत्रीजी मुझे उस लोक से वापिस धरती पर ले आये। मैंने पत्रीजी को पहली बार अपने ध्यानानुभव में ही देखा था। इससे पहले मैं पत्रीजी के बारे में कुछ भी नहीं जानता था।

 

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और जब मैं वापिस अपने शरीर में आ गया तब मुझे पता चला कि मैं पांच घण्टे ध्यान में बैठा था। बस उसी दिन से मैंने प्रण किया मैं पूरा भारत घूमकर ध्यान प्रचार करुँगा। और लोगों को अपना ध्यान अनुभव बताऊँगा।

 

तब से आज तक आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तामिलनाडू, केरला, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश, गुजरात, वेस्ट बंगाल, बिहार, हरियाणा इत्यादि, समूचा उत्तर भारत इन सभी राज्यों में पिरामिड की सहायता से, पिरामिड ध्यान का प्रचार किया और पत्रीजी के साथ पिछले दस वर्षों से हूँ।

 

मेरा दूसरा अनुभव कुछ चमत्कारी ढंग का है। अभी मुझे ध्यान करते हुए थोड़ा ही वक्त हुआ था। उन दिनों मेरी माताजी की तबीयत कुछ ठीक नहीं रहती थी। उनके पेट में दर्द रहता था। उनका तीन बार आप्रेशन हो चुका था और डाक्टरों ने चौथी बार फिर आप्रेशन बताया। इतना सुनकर मेरी माँ उदास रहने लगी और कभी-कभी आत्मा हत्या के बारे में सोचने लगी।

 

एक बार मैं अपनी माँ के साथ चालीस मिनट ध्यान में बैठ गया। इस दौरान मेरी माँ को अनुभव आया कि मैं एक बहुत ही छोटा बालक बनकर अपनी माँ के पेट में चला गया हूँ और जहाँ उसको पीड़ा होती है वहाँ से कुछ निकाल कर बाहर फेंक रहा हूँ।


उस दिन से आज तक मेरी माँ को फिर कभी पेट में दर्द नहीं हुआ और वह बहुत खुश है। मेरा अपना अनुभव है कि ध्यान करने और करवाने वाले को कभी भी कोई शिकायत नहीं रहती, कोई मुश्किल पास नहीं आती।

 

सतीश नागवंश
बीदर

संपर्क : +91 9849543763

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