पाइमा के कुछ सदस्यों से एक भेंटवार्ता

 

 

मेरा नाम सौम्या है। मैं दंत चिकित्सा (Dentistry) का कोर्स कर रही हूँ। अभी PYMA की कार्यकर्त्ता हूँ।

 

अब से कुछ साल पहले शिरडी ध्यान महायज्ञ में मेरा आनापानसति ध्यान से परिचय हुआ। मेरी माँ मुझे वहाँ लेकर गई थीं। उससे पहले मैं डरी-सहमी सी रहती थी, मुझे बहुत याद भी नहीं रहता था, माइग्रेन का दर्द भी हो जाता था। जब से मैंने ध्यान करना शुरू किया, मेरी समस्याएँ धीरे-धीरे हल हो गईं, मुझमें बहुत से सकारात्मक परिवर्तन आए। अब मुझे सबसे मिलना अच्छा लगता है।

 

अब से दो साल पहले मेरा पाइमा से नाता जुड़ा। मैं सिंकदराबाद में थी जहाँ मैंने पाइमा की एक मीटिंग attend  की। वहीं मुझे इसके बार में पूरी जानकारी मिली। मैंने वहाँ पाइमा के यंग मास्टर्स को उत्साह्पूर्वक काम करते हुए और अपने अनुभव एक दूसरे से बाँटते हुए देखा था। मैं पाइमा प्रेसिडेंट श्री प्रदीप अनिरुध्द से बहुत प्रभावित हुई थी। मैंने देखा कि सभी यंग मास्टर्स अपनी पढ़ाई के साथ- साथ ध्यान भी करते थे ओर ध्यान का प्रचार भी कर रहे थे। उन्हें अपने भविष्य और अपने रास्ते के बारे में सब कुछ स्पष्ट था। मुझे भी उन्हें देखकर प्रेरणा मिली और मैंने पाइमा join कर ली।

 

‘कलांजलि’ के अन्तर्गत हम अलग अलग प्रकार के कलात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत करके पाइमा के लिए फण्ड भी इकट्‍ठा करते रहते हैं। विशेष दिनों पर स्कूलों में विशेष कार्यक्रम करते हैं, कभी प्रतियोगिताएँ करते हैं और कभी एग्ज़ीबिशन। कुछ न कुछ नया काम करते रहते है। हर बच्चे और युवा को हम ध्यान सिखाते हैं। संशय व तनाव से घिरे युवाओं को हम सरल व सुनियोजित जीवन देना चाहते हैं। मैनें स्वयं अपने जीवन में कई बदलाव देखे हैं, अब मुझमें आत्मविश्‍वास बढ़ गया है। मुझे ध्यान में मास्टर्स द्वारा दिशा निर्देश मिलते रहते हैं और मैं उत्साहपूर्वक काम करती रहती हूँ।  ध्यान प्रचार के लिए स्कूल कॉलेजों में जाते समय मैं पाइमा के brochure को भी लेकर जाती हूँ। एक बार मैं उस बी.टेक. कॉलेज में भी गई जहाँ से पत्री जी ने अपनी पढ़ाई की थी। बाद में प्रोग्राम अरेंज करने पर पत्री जी ने लगभग दो हज़ार छात्र-छात्राओं की क्लास ली। इस पूरे आयोजन में तीन हज़ार रुपए का खर्च आया पर काँलेज ने खुद ही उसे उठा लिया और इस तरह हमारे पास जमा किए हुए रुपए बच गए जिससे हमने तीन-चार जगह पत्री जी की और क्लासें आयोजित की। यह भी एक आश्‍चर्य था।

 

एक बार मैंने एकता ध्यान में भी भाग लिया था जो मुझे बहुत अच्छा लगा। छुट्‍टियों में जब मैं घर गई तो मुझे वहाँ भी एकता ध्यान करवाने की सूझी। हमारे घर के सामने एक बड़ा मैदान है जहाँ एन.सी.सी. का कैम्प लगता है। मैंने उनके संचालक से बात की और रोज़ एक हज़ार कैडेट्स को ध्यान कराने लगी। मुझे भी अच्छा लगा और कैडेट्स को भी। अब वे कैडेट्स भी हमारे पाइमा से जुड़ गए। जब पत्री जी हमारे शहर में आए तो मैंने उन्हें पाइमा की क्लास में आने का निमन्त्रण दिया। पत्री जी ने स्वीकार कर लिया और अगले दिन सुबह आने को राजी हो गए। रात-रात में ही हमें तैयारी करनी थी। हमने रात बारह बजे मीटिंग की। सारी योजना बनाई। रात भर टेंट लगवाने, कुर्सियाँ रखवाने में लगे रहे। सुबह- सुबह पत्री जी ने क्लास ली, उनकी यह क्लास बाकी सभी क्लासों से बेहतर थी। क्लास खत्म होने पर सबने मिलकर सब कुछ समेटा। कोई बड़ा-छोटा नहीं था।पत्री जी की क्लास का आयोजन हमारी बड़ी उपलब्धि थी। इसके बाद तो कई बार उनकी क्लास का आयोजन किया।

 

पाइमा में हम कई प्रकार के काम करते हैं। एक बार शाकाहार रैली के दौरान, शाकाहार को Promote  करने के लिए हमने सब्जियाँ भी बेचीं। बाज़ार से सस्ते दामों पर हमने सब्जियाँ व फल बेचे ताकि शाकाहार को बढ़ावा मिले। मैंने खुद भी ध्यान में आने के बाद मांसाहार को त्याग दिया। अब मैं जानती हूँ कि मांसाहार के क्या दुष्परिणाम होते हैं।

 

PYMA से जुड़ने के बाद मेरे संप्रेषण कौशल (communication skill) में बहुत सुधार हुआ है क्योंकि पहले तो कभी किसी से बात ही कम करती थी पर अब तो मैं हर वर्ग के लोगों से बातचीत करती हूँ। पैसा इकट्‍ठा करने के लिए भी हम कई प्रकार के काम करते रहते हैं – कभी newsletters को बेचना, कभी पाइमा लकी coin निकालना आदि इस तरह हजारों रुपए जमा करते हैं।

 

PYMA  International नाम से ध्यान का एक बड़ा सा आँफिस भी खोला गया है जहाँ ध्यान सम्बन्धी विविध गतिविधियाँ चलती रहती हैं। जब पी.एस.एस.एम. के बड़े कार्यक्रम होते हैं, उनमें भी हम योगदान करते हैं। शुरू में कुछ समय मैंने अपनी पढाई की तरफ कम ध्यान दिया और पाइमा के काम की तरफ ज़्यादा। पर जब मेरे नम्बर कम आए तो मुझे ध्यान में यही पता चला कि हमें बैलेंस बनाकर चलना है। जो भी काम करो उसमें सौ प्रतिशत ध्यान दो। ऐसा करने पर मैंने सभी परीक्षाओं में बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए। अब मैं बैलेंस बनाकर चलती हूँ – इसी से पूर्ण व्यक्तित्व बनता हैं। PYMA का तो नारा ही है Joy in Everything. जो भी करें, पूरी खुशी के साथ करें। इससे आप खुद तो खुश रहेंगे ही, आसपास का वातावरण भी खुशनुमा बना देंगे।

 

पिरामिड में बहुत शक्ति है। वह ऊर्जा का भण्डार होता है।इस विषय में सबको जागरूक करने के लिए हम सभी पाइमा सदस्य अलग-अलग प्रकार के पिरामिड बनाते रहते हैं इसके अतिरिक्त युवा लोगों में वैज्ञानिक दुष्टिकोण (Scientific Temper) भी लाना चाहते हैं| ध्यान सीखने के साथ अध्यात्म को वैज्ञानिक तरीके से समझना भी आवश्यक है। अध्यात्म और विज्ञान परस्पर सहयोगी हैं। जब हम पिरामिड ध्यान करते हैं तो वैज्ञानिक तौर पर हमें क्या फायदा होता है, यह जानना बहुत आवश्यक है।यह तो गहने शोध का विषय है।

 

हम लोगों ने पिरामिड पार्टी आँफ इण्डिय (PPI)  के लिए भी काम है। चुनावों के दौरान हमने प्रचार भी किया है। इसके द्वारा लिए हर तरह का काम किया, पैम्फ़लेट बाँटे, सब्जियाँ बेचीं, राजनेताओं से मिले। हमने सभी को ध्यान सीखने के लिए भी प्रेरित किया। अब हमें पूरे आंध्रप्रदेश के सकूल काँलेजों में ध्यान सिखाने की अनुमति मिल गई है।

 

पाइमा के कुछ निर्दिष्ट लक्ष्य हैं -2012 तक विश्‍व के युवाऔं तक ध्यान पहुँचाना। शाकाहार को प्रोत्साहित करना, miraculous thinking रखने वाली नई पीढ़ी का निर्माण करना, सामाजिक व आध्यात्मिक जीवन को वैज्ञानिक तौर पर समझना व समझाना।

 

मैं देश-विदेश के सभी युवाओं को पाइमा और पिरामिड ध्यान से जुड़ने के लिए आह्‍वान करती हूँ।

 

सौम्या
सिंकदराबाद
संपर्क : +91 8088344992, +91 8431226848
 

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