ध्यान के चमत्कार

 

मैं श्रीनिवास राव (30) पूर्व गोदावरी डिस्ट्रिक्ट के काकिनाडा में रहता हूँ। आठ वर्ष पूर्व मैं पिरामिड स्पिरिचुअल सोसाइटीज़ मूवमेंट से जुड़ा। 1996 में मेरा पूजा पाठ की ओर काफ़ी झुकाव हो गया, तब मैं सोलह साल का था। आध्यात्मिक सत्य पाने की चाह में विभिन्न धार्मिक स्थलों पर गया। ग्रह शांति, पूजा पाठ भी करता रहा। आठ साल तक ब्रह्मकुमारी राजयोग भी किया। यहाँ मैंने यह जाना कि पूजा-प्रार्थना तो पहला कदम है, जब हमें ज्ञान प्राप्त हो जाता है तो इनकी आवश्यकता ही नहीं रहती। इसके बाद चार साल तक मैं अन्य अनेक विधियों को सीखता रहा जैसे प्राणिक हीलिंग, अरिहंत, रेकी के प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्तर, करुणा रेकी, रेकी मास्टर्स आदि। रामकृष्ण मिशन भी गया, उनके तरीके से भी ध्यान किया। कई गुरुओं से मिला, जो उन्होंने बताया वह सब भी किया पर मन शान्त नहीं हुआ। कुछ अधूरापन लगता रहा।

 

एक दिन पी.एस.एस.एम का एक लीफ़लेट मुझे मिला। उसमें लिखे पते पर मुझे एक पिरामिड मास्टर मिले। उन्होंने मुझे आनापानसति ध्यान की विधि बताई। यह इतनी आसान विधि थी कि मुझे विश्‍वास ही नहीं हुआ कि इससे कुछ होने वाला है। पिछले बारह सालों से मैं इतना कुछ कर चुका था कि लगा ही नहीं कि इस तकनीक से कुछ पाया जा सकता है। मुझे उन पिरामिड मास्टर ने ज़ोर देकर कहा कि मैं लगातार चालीस दिन ध्यान अवश्य करूँ, अगर संतुष्टि न मिले तो भले ही फिर इसे छोड़ दूँ।

 

चालीस दिनों के अन्दर ही मुझे अपने भीतर सुखद परिवर्तन महसूस होने लगे। ब्लडप्रेशर, शुगर तथा इयोसिनोफ़ीलिया से छुटकारा मिला, अपनी चिन्ताओं, स्ट्रेस तथा टेंशन से 80% मुक्ति मिल गई और मुझे कई आध्यात्मिक अनुभव होने लगे। मैं अपने माथे पर प्रकाश के पुंज देखता, शिरडी साई बाबा, रमण महर्षि जैसे आध्यात्मिक गुरुओं के दिव्य दर्शन होने लगे। उनसे अनेक ज्ञान की बातें तथा दिशा निर्देश भी प्राप्त हुए। ध्यान के दौरान मुझे शरीर में ऊर्जा के बहने का एहसास होने लगा। शारीरिक कम्पन के साथ-साथ एस्ट्रल ट्रेवल का भी अनुभव होने लगा।

 

इन सभी अनुभवों के बाद तो मुझे विश्‍वास हो गया कि इस सरल ध्यान विधि में कुछ खास बात है। और जानने की इच्छा होने लगी। मैंने और अधिक ध्यान करना शुरु किया। सुझाई गई आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ीं तथा पी.एस.एस.एम की अनेक गतिविधियों में भी भाग लेने लगा। अपने अन्दर मुझे एक बेहतर स्वास्थ्य, अद्‌भुत आनन्द तथा शांति महसूस होने लगी। मैं यह सोचता कि जो लोग इस संस्था में नहीं हैं वे इसी शांति व आनन्द को पाने के लिए पैसा खर्च करके भी भटक रहे हैं, उन्हें कैसे इस मार्ग पर लाया जाए। मुझे तो चालीस दिन में ही यह सब मिल गया है। अन्य लोगों को भी मुझे यह सुख पाने का तरीका बताना चाहिए।

 

मैंने विद्यार्थियों को ध्यान सिखाना शुरू किया। वो तो पहले ही दिन रोमांचित हो गए। मैं हैरान था। यह सब पाने में मैंने कितने साल लगा दिए, कितनी पध्दतियों को मैंने अपनाया और ये बच्चे पहले ही दिन यह अनुभव पा रहे हैं। पिछले तीन सालों से मैं ध्यान प्रचार कर रहा हूँ। जो लोग इस संस्था से जुड़े हैं वे अपने अनुभव बताते हैं। अपनी समस्याओं से निजात पाकर उन्होंने शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक उन्नति हासिल की है। मुझे इस सोसाइटी से जुड़ने की खुशी है। हाल ही में मैंने एक किताब लिखी है - ’ज्ञाननिधि’, जिसमें मैंने अपने अनुभव, शंकाओं व समाधानों का निर्वाण किया है। स्वाध्याय हेतु उपयोगी पुस्तकों की सूची के साथ-साथ उसमें मैंने 2012 के बारे में ध्यान में दखे अपने अनुभव को भी दिया है। उसमें मैंने शिरडी साई बाबा, जीसस, मुहम्मद आदि के संदेश सम्मिलित किए हैं और नवागंतुकों के मन में उठने वाली शंकाओं के उत्तर भी दिए हैं।

 

श्रीनिवास राव
पूर्व गोदावरी

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