" ध्यान ही मोक्ष है "

 

मैं थानेश्‍वर शर्मा नेपाल का रहने वाला हूँ। मेरे माता-पिता बहुत सीधे साधे शुध्द ब्राह्मण हैं। मेरे पाँच भाई और पाँच बहनें हैं। में छोटी उमर में ही नेपाल छोड़ कर लुधियाना आ गया था।

 

तब से ही मैं गुप्ता परिवार के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। छोटी उमर से ही मेरा मन भजन कीर्तन में बहुत लगता था। लेकिन मन को शान्ति नहीं मिलती थी। मन को शान्त करने के लिए मैं हमेशा मन्दिर, गुरुद्वारा, और बहुत से तीर्थ स्थानों पर जाया करता था, पर फिर भी मन आशान्त ही रहता था।

 

शादी के बाद मैं अपने बच्चों को लेकर एक बार हरिद्वार गया। वहाँ पर सतपाल महाराज जी से दीक्षा भी ले ली। मैं पंद्रह साल से उनका शिष्य हूँ। लेकिन मैं केवल नाम की खोज में नहीं था। अन्दर से जो मेरी आत्मा की खोज थी, अपने आप को जानने की, वो मेरी कभी पूरी नहीं हुई।

 

यह तो प्रभु की कृपा से मुझे इतने अच्छे मालिक मिले हैं जिन्होंने मुझे ध्यान के बारे में बताया और एक दिन मैंने अपने घर में ध्यान शिविर लगाया। राजकुमार गुप्ता जी, रचना मैडम, मैडम पूर्णिमा, गिरिजा मैडम, सब लोग मेरे घर आए, उन्होंने ध्यान की विशेषता बताई और पिरामिड भी लगवाया।

 

उस दिन से मैं और मेरा परिवार रोज ध्यान करने लगे और बहुत से ध्यानानुभव भी होने लगे। पूर्णिमा वाले दिन मैं अपने अड़ोस पड़ोस और नेपाली मित्रों को बुलाकर ध्यान करवाता हूँ, और खीर खिलाता हूँ।

 

एक दिन सबके जाने के बाद मैं फिर ध्यान में बैठ गया और इतना मस्त हो गया कि कब दो बज गए मुझे पता ही नहीं चला। मैं इतनी गहराई में चला गया कि उस दुनिया में कोई विरला ही पहुँच सकता है| इतने में मुझे सुभाष पत्री जी दिखाई दिए और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे पूरे ब्रह्माण्ड़ की सैर कराने लगे। उसके बाद एक दरवाजे के अन्दर ले गए। वाह्‌ ! वो नराजा तो देखने योग्य था। जिसका वर्णन मैं इस लेख में नहीं कर सकता। अगर कोई सुनना चाहता हैं, मुझको अपने पास बुलाकर या मेरे पास आकर सारे ध्यानानुभव सुन सकता है। मैं भी सुनाने का इच्छुक हूँ।

 

मेरा सुबह का अलार्म 6 बजे का है लेकिन पत्री सर मुझे साढ़े पाँच सुबह आ कर उठाने लगे। कहने लगे कि उठ ध्यान कर, उजाला हो गया हैं, उनके एक हाथ में लाठी थी और एक हाथ में बाँसुरी। ध्यान में, मैं उनसे बहुत सवाल पूछता हूँ। मुझे सब सवालों के सही जवाब मिल जाते हैं।

 

उन्होंने मुझको बताया कि पिछले जन्म में तू मानव ही था, तेरा नाम अश्वत्थामा ऋषि था। मैंने पत्री जी से पूछा कि पिरामिड क्यों बना और पिरामिड लगाने का मकसद क्या है? पत्री जी ने उत्तर दिया कि पिरामिड माँ के आँसुओं से उत्पन्न हुआ है, पिरामिड लगाने से माँ की छत्र छाया और धन में वृध्दि होती है। इस लोक में भी और उस लोक में भी सहायक है। ध्यान हमें वैकुण्ठ तक ले जाता है, ध्यान करने से मुझे बहुत से फायदें भी हुये है। मेरी आँखों की रोशनी बहुत कम थी, अब काफी ठीक हो गई है, मुझे पथरी की शिकायत थी और बहुत दर्द भी था। अब बिलकुल ठीक हूँ।

 

पहले मैं सोचता था कि मैं दुनिया का सब से अभागा इन्सान हूँ कि मेरे पास कुछ भी नहीं है| परन्तु जब से ध्यान कर के मुझे अपनी आत्मा का ज्ञान हुआ है और मैंने अपने आप को जाना है, तब से मुझे ऐसा लगता है कि मैं ही दुनिया का सब से भाग्यवान इन्सान हूँ । मेरे पास दुनिया की सब दौलत है। क्योंकि मैंने अपने अन्दर सूक्ष्म रूप में बैठे परमात्मा के साक्षात दर्शन किए हैं। मैं अपने आप में ही खुशियों में उड़ रहा हूँ। मन भी शान्त हो गया है। ध्यान के द्वारा मोक्ष और स्वर्ग की अनुभूति हुई है।

 

अन्त में मैं गुप्ता परिवार का धन्यवाद करता हूँ, जिन्होंने मुझे यह राह दिखाई और मेरे जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ भर दीं| मेरी सब से यही प्रार्थना है कि आप भी अपने जीवन को खुशहाल बनाने के लिए हमेशा और हर दिन ध्यान करें और दूसरों को भी करवायें।

 

थानेश्‍वर शर्मा
लुधियाना

संपर्क  : +91 9814196414

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