" ध्यान ही सही राह "

 

मैं वैभव खन्ना लुधियाना शहर का निवासी हूँ। मेरी उमर 22 वर्ष है, और मैं एक कम्पयूटर इन्जिनीयर हूँ। मैं अपने पिताजी के व्यापार में उनकी सहायता कर रहा हूँ। हमारे गुरु स्वामी तुरियानन्द जी महाराज जी हैं, और हमने उनसे ही नाम लिया हुआ है। छोटी उमर से ही हमें भजन व आरतियाँ गाना सिखा दिया था। धीरे-धीरे आयु व समझ बढ़ने के साथ-साथ मेरा ध्यान आध्यात्मिकता की ओर बढ़ने लगा। मेरे मन में इच्छा रहती थी कि मैं परमात्मा के बारे में थोड़ा और जानू। मैं कभी-कभी नाम सिमरन, आरती व प्रार्थना प्रतिदिन करता था। मेरे पिताजी ने मुझे श्री राजकुमार जी के बारे में बताया, जो कि हमारे व्यापार में ग्राहक व गुरु भाई हैं। उन्होंने मुझे उनके ध्यान प्रचार के बारे में बताया, जिससे मेरी इच्छा उनसे मिलने की हुई।

 

एक रविवार को वह आये हुए थे, वह ध्यान का प्रचार कर रहें थे। वहाँ पर मैंने अलग-अलग लोगों का ध्यान अनुभव सुना। मैं इतना प्रोत्साहित हो गया कि मैंने प्रण किया कि आज से मैं ध्यान करना शुरु करूगाँ। मैंने रचना जी से बात करी और उन्हें ध्यान सिखाने के लिए कहा। यह बात डेढ़ साल पुरानी है। यही से मेरा ध्यान करने का सफर शुरु हुआ। मेरे मन में बहुत बड़ा संशय था कि इस तरह ध्यान लगाने से मैं अपने गुरु का निरादर तो नहीं कर रहा, पर मेरे पहले ध्यान अभ्यास में मुझे इसका जवाब मिल गया। जिसमें मेरे ही गुरुजी ने मुझे प्रेरित किया और ध्यान करने को ही सही मार्ग बताया। साथ में उन्होंने यह भी कहा कि ध्यान लगाने से पहले अपने गुरु का ध्यान लगाऊँ या नमस्कार करके बैठूँ जिससे सारी जिम्मेदारी गुरु की हो जाती है। उसी दिन से मैंने इसी तरह ध्यान लगाना शुरु कर दिया।

 

इसी तरह ध्यान लगाने से मेरी जिंदगी में काफी बदलाव आ गया। मेरी सोच में बदलाव आया जिससे मेरे व्यापार में हमें काफी मुनाफा हुआ। मैं हरदम खुश रहने लगा चाहे कोई कुछ बुरा भी कह दे उसे माफ करने लगा। मुझे क्रोध आना काफी कम हो गया और मेरे ही दोस्त जो मुझसे पहले बात करके खुश नहीं होते थे वही मुझसे मेरा साथ माँगते है। इस दौरान मैने कई संत महात्मा के प्रवचन सुने और मेरे कई संशय दूर हुए। मैं आप सबसे अपने अनुभव बॉटना चाहूँगा। एक बार एक किसान ने अपनी जमीन पर फसल ऊगानी चाही, उसने अपनी जमीन पर एक महीना कडी मेहनत की। एक महीने बाद उसने देखा कोई फसल नहीं उगी। वह बहुत परेशान हो गया। उसने सोचा किसी समझदार इन्सान को लेकर आता हूँ। जब वह उसे लेकर पहुंचा तो उस बुजुर्ग ने किसान से पूछा कि तुमने यहाँ पर हल चलाया, किसान बोला चलाया। वह बोला पानी दिया बराबर वह बोला दिया। बुजुर्ग ने पूछा तुमने इसमे बीज बोए, किसान ने सिर पर हाथ मारा ओर बोला नहीं बोए।

 

यह कहानी सुनाने का मकसद हम अपने जीवन में दान, पुण्य, पाठ करते है जो कि कहानी में, खाद, हल और पानी के बराबर है। पर हम अपनी जिंदगी में बीच मतलब " ध्यान " डालना भूल जाते है। अगर हम ये नहीं डालेंगे हम अपनी मेहनत का सही फायदा नही उठा सकते। दान, पुण्य, सेवा हमारे फल हैं। हमारा शिंगार है। दूसरी चीज जो आप सबसे सांझा करना चाहूँगा, वो है कि हमारा मन भगवान के प्यार का भूखा है। जब हम कभी कुछ स्वाद पकवान खाते हैं, हम कह देते हैं, कि पेट भर गया पर मन नहीं भरा। हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि हमारी भूख है " ध्यान "। आप कभी ध्यान करके देखे, आप हमेशा खुश भी रहेंगे और काफी संतुष्टट भी रहेंगे जैसे की मैं रहता हूँ।

 

 

वैभव खन्ना
लुधियाना

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