ध्यान में मुझे यह सभी पत्रीजी ने सिखाया

 

मेरा नाम वरलक्ष्मी है, मैं विजयवाड़ा की रहने वाली हूँ। मेरे पति का नाम सुभाष चंद्र बोस है। 1998, 24 मई शारीरिक स्वास्थ्य लाभ के लिए मैं, विजयवाड़ा पिरामिड मास्टर मुखर्जी के द्वारा ध्यान में आई। पहले दिन ही मुझे तीसरी आँख खुलने का अनुभव हुआ। चौथे दिन ध्यान में पत्रीजी जंगल में सभी जानवरों को अपने गोद में लेकर प्यार करते हुए दिखाई दिए। सातवें दिन पत्रीजी को जब मैं गुंटुर में मिली तो जिसे ध्यान में देखा था उस महान आत्मा को आँखों के सामने प्रत्यक्ष देव जैसे दर्शन होने की अविस्मरणीय अनुभूति मिली।

 

उसके बाद से मैं, एक दिन में बीस घंटे ध्यान करने लगी। रात-दिन ध्यान साधना के द्वारा मैंने सम्पूर्ण स्वास्थ्य लाभ किया।

 

गुरु का मतलब आम आदमी है। यह देखते हुए मुझे 11 साल हो गए हैं और अब भी मुझे लगता है कि उन्हें समझना बहुत कठिन है। बहुत सारे अनुभव हुए हैं और बहुत सारे संदेश मुझे एस्ट्रल मास्टरों से प्राप्त हुए हैं। गीज़ा पिरामिड का रहस्य, धरती से पाताल मोक तक डाइमेन्शन बदल करके कैसे यात्रा करनी है, ध्यान में मुझे यह सभी पत्रीजी ने सिखाया।

 

यह हैं हमारे पत्रीजी !

मई 2000, विजयवाड़ा में तीन दिन के बुध्द पूर्णिमा यज्ञ की जिम्मेदारी पत्रीजी ने मुझे दी थी। इसलिए मैं गाँव-गाँव, शहर-शहर घूमकर लोगों को ध्यान के बारे में और यज्ञ के बारे में बता रही थी।

 

घर में आकर मैं बहुत थक गई थी। सुबह मैं दूध में जामन डालकर गई थी; मैं पईमा मास्टरों से बातें करने लगी कि उनका काम कैसा चल रहा है। उसी समय एक साधु भिक्षा आए। मैं गेट के अंदर से ही उसे पाँच रुपये देने लगी। इस पर वह तुरन्त बोले, " सीता जैसी महान साध्वी को पता था कि कुछ खतरा है फिर भी उसने लक्ष्मण रेखा को पार कर भिक्षा दी थी। अंदर से भिक्षा देने वाली माता तो लगता है, बस आप ही हो। मैं उसकी बात सुन आश्‍चर्यचकित हो गई। तुरन्त गेट खोलकर उसे अंदर बुलाया। अंदर आने के बाद उसने मेरे और मेरे पति के बीच की कई गोपनीय बातों को बताया। " आप यज्ञ कर रही हैं, आदमी के आँख के तेज से पत्थर भी फट जाता है। मैं आपको एक क्रिस्टल देता हूँ। अपने घर के सामने टाँगिए। " मैंने कहा कि यह तो सिर्फ तभी रक्षा करेगा जब मैं घर में रहूँ, बाहर जाने पर तो यह रक्षा नहीं करेगा ना, इसलिए मैंने क्रिस्टल लेने से मना कर दिया।

 

"मुझे पता है कि तुम जिद्‌दी हो पर अंदर से भी इतनी अड़ियल हो अब पता चल रहा है ", उस साधु ने कहा।

 

मैंने सोचा, " कौन है यह? यह तो ऐसे बर्ताव कर रहा है, जैसे मेरे बारे में सब कुछ जानता है। " अपनी तीसरी आँख से मैंने उस साधु के बारे में जानना चाहा तो हमारे बीच में एक परदा आ गया। फिर वह साधु बोला मुझे प्यास लग रही है, कुछ दे दीजिए। मैंने कहा कि मैं बहुत थक गई हूँ, मुझे और तंग न करो। यह कहकर मैं उसे बीस रुपये देने लगी। उन्होंने फिर प्रार्थना की अच्छा थोड़ा छाछ ही पिला दो। मैंने कहा मेरे पास अभी दही नहीं है, आप अभी चले जाओ। (मुझे सुबह जमाये दही का बिल्कुल भी ख्याल नहीं आया)।

 

तीन दिन के बाद ध्यान में वह साधु फिर दिखाई दिया। मैं हैरान रह गई कि यह क्यों दिखाई दे रहा है। थोड़ी देर में साधु का चेहरा पत्रीजी के चेहरे में बदल गया। मैं आश्‍चर्यचकित रह गई। मैंने कहा " आप आए थे मेरे घर? आप ऐसे दूसरे रूप में आएँगे तो कैसे पहचानूंगी? जो ऐसे आए हो वह चोर है या ज्ञानी वह कैसे पता चलेगा? " पत्रीजी ने कहा " जो त्रिकरण शुध्दि (सोच, वाक्‌ और कर्म की शुध्दि) के विश्‍वास के साथ कर्म करते है उसके घर के अंदर कोई चोर नहीं आ सकता। " आपने कहा था मेरे घर से कोई भी भूखा नहीं जाता। मैंने तो सोचा था अगर चार व्यक्ति भी आ जाएँ तो उनके लिए आपके घर भोजन मिलेगा, पर आपने तो मुझे भूखा ही लौटा दिया। " अतिथि देवो भवः " इसके मतलब को परोक्ष रूप में और प्रत्यक्ष रूप में अनुभव करा के ज्ञानोदय दिया। वाकई में महान हैं पत्रीजी।

*     *    *

सन्‌ 1999 में हम लोगों ने विजयवाड़ा से बद्रीनाथ तक ध्यान यात्रा की थी। उस यात्रा में हरिद्वार में भारत भवन में योगियों की मूर्तियों को देखने के लिए गए थे। उस समय मेरे हाथ में पत्रिकाएँ और पेम्फलेट थे, किसी व्यक्ति ने मेरे पास आकर बीस रुपये देकर एक पत्रिका ली। पहली बार एक आध्यात्मिक किताब को बेचकर मुझे ऐसा आनंद आया जो शायद करोड़ों के व्यापार में भी नहीं आए। कुछ ही देर में एक संन्यासी एक पेम्फलेट लेकर पत्रिका को 15 रुपये में देने के लिए कहा। मैंने नहीं दिया। पत्रिका के ऊपर लिखा था, " संन्यासी को मोक्ष नहीं है, संसारी को ही निर्वाण है। " संन्यासी ने इसका अर्थ पूछा। तब मैंने कहा कि " हाँ, सही ही तो है, संन्यासी को संसार के कष्ट के बारे में कैसे पता चल सकता है। आपको आश्रम देकर खाना खिलाया जाए तो दर्द क्या हैं। आप कैसे समझोगे? आपको बिल्कुल मोक्ष नहीं मिलेगा। " मैंने पत्रिका नहीं दी। उधर लिफ्ट में तीन-तीन लोगों को मिलकर ऊपर जाने का तरीका था। लिफ्ट छोड़कर दूसरा रास्ता भी नहीं था। हमें ऊपर जाने के बाद फिर से वही संन्यासी दिखाई पड़ा। मुझे यह ख्याल ही नहीं आया कि बाहर बैठा संन्यासी हमसे पहले ऊपर कैसे आया? इधर-उधर देखते हुए वह संन्यासी मेरे पास आया और पूछा, संन्यासी के पास पैसा होता है क्या? यह किताब मुझे मुफ्त में दे दीजिए। तब मैंने कहा कि हम किताब बेचने नहीं आए। मुफ्त में देने के लिए ही आए हैं। और मैंने वह पत्रिका उसे दे दी। उन्होंने दोनों हाथों से उस पत्रिका को पकड़ कर सिर से लगाया। " धन्योस्मि "; कहकर, नमस्कार करके वह चला गया।

 

यात्रा के एक महीने बाद पत्रीजी मेरे पास आए और पूछा, यात्रा का आपका अनुभव कैसा रहा? मुझे यह समझ नहीं आया, एक महीने बाद पत्रीजी मुझसे यह सवाल क्यों पूछ रहे हैं? ध्यान में आए अनुभव को मैंने बतया, लेकिन संन्यासी वाले प्रकरण को नहीं बताया। उस समय पत्रीजी ने कहा कि " किसी किसी के दिमाग में मिट्‌टी होता है, क्या कर सकते हैं? " यह बोलकर वे चले गए। मुझे भी गुस्सा आ गया, मेरे दिमाग में मिट्‌टी है? ऐसा क्यों कहा जब तक नहीं जानूंगी मैं पानी भी नहीं पिऊँगी। मैंने ऐसा प्रण लिया और ध्यान में बैठ गई। ध्यान में वही संन्यासी दिखाई दिया, कुछ देर के बाद हँसते हुए भगवान शिव प्रत्यक्ष हुए। मैं हैरान रह गई। क्या यह मेरी परीक्षा थी? उस संन्यासी को मैंने कितनी बातें सुनाई थी। मैं शिवजी को बहुत मानती हूँ। उस रात को मैंने तिरुपति से पत्रीजी को फोन किया तो पत्रीजी ने बताया, मैं एक कविता कहता हूँ सुनो-

 

" डाँट ही आशीर्वाद बन गया।
मिट्‌टी गायब हो गया,
जो रहस्य है, वह बाहर आ गया। "

 

भगवान परम शिव धन्योस्मि कहकर पत्रिका को मेरे पीछे पड़कर लिया तो पत्रीजी के द्वारा लाए गए " Spiritual India " और " ध्यान भारत " को हम कितने पैसे देकर खरीद सकते हैं? पत्रीजी के ऋण को हम कैसे चुका सकते हैं ?

 

ये हैं हमारे पत्रीजी !

 

वरलक्ष्मी
विजयवाड़ा

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