" मैंने पूर्ण पथ प्रदर्शक पाया "

 

 

मेरा नाम विनय कुमार है। मैं 29 साल का हूँ और चण्डीगढ़ में रहता हूँ। मेरा बचपन काफी समस्याओं से घिरा हुआ था, इसी कारण मेरा झुकाव परमात्मा की तरफ हुआ और शुरू से ही धार्मिक प्रवृति का था। बचपन से ही मैं भगवान के बारे में जानना चाहता था। 1998 से मैं सुबह 3:45 पर उठ स्नान कर पूजा में लग जाता, कठिन तपस्या की लेकिन मुश्किलों ने कम होने का नाम न लिया।

 

सन्‌ 2004 में मेरी जिन्दगी ने एक नया मोड़ लिया और जिन्दगी में परेशानियों का बवण्डर आ गया, मुसीबतों का हल न दिखते हुए, मैं बहुत से पण्डितों से मिला और उनके बताए हुए उपाय अनुसार मैं एक दिन में 101 बार हनुमान चालीसा करने लगा। 41 दिनों बाद कुछ हल न निकला, फिर पण्डित के बताए अनुसार महामृत्युंजय का जाप करने लगा, पूर्ण होने पर मृत्युंजय यज्ञ करवाया, फिर भी कोई फर्क जिन्दगी में महसूस न हुआ। अब मैं यह देख हैरान हुआ कि, जिन्दगी में कोई परिवर्तन न हुआ उल्टा यह हुआ कि, ज्यादा देर बैठने से मेरी रीड़ की हड़डी में बहुत दर्द रहने लगा, मेरे घुटनों में, गर्दन में, कमर में, काफी दर्दे आ गईं, पेट बहुत फूल गया और जब भी मैं कुछ खाता मुझे उल्टी आ जाती, कुछ भी न पचता। बहुत से अच्छे डाक्टरों को मिला लेकिन सब व्यर्थ हुआ।

 

मेरी ज़िन्दगी में शिरडी के साई बाबा की भक्ति का बीज अंकुरित हुआ, और उनका ग्रन्थ श्री सांई सच्चरित्र मेरी ज़िन्दगी में मित्र की तरह मार्ग प्रदर्शन करता हुआ अवतरित हुआ। मेरी मुश्किलें तो हल न हुई, किन्तु उस कठिन समय में मुझे ये एहसास हुआ कि सांई बाबा मेरे साथ हैं और ये एहसास करवाया कि, ज़िन्दगी में आई हुई परेशानियाँ, मेरे अपने कर्मों की वजह से ही हैं। जब तक ये कर्म शेष हैं तब तक भोगना पड़ेगा।

 

साई सच्चरित्र में वर्णित है कि, जो शिरडी में जिस भावना से आता है, मैं उसे वैसा ही अनुभव देता हूँ। मैं इस बात को मन में लेकर शिरडी गया कि मुझे साई बाबा को देखना है और ऐसा ही हुआ। मेरा शिरडी से वापिस आने का दिन था, मन में ये विचार आया की साई बाबा तो मिले नहीं। थोड़ी देर में एक फ़कीर एक स्थान पर नज़र आया जोकि अपने पास बैठे कुत्ते को बहुत प्यार कर रहा था। मैंने उनसे जाकर पूछा कि, " क्या आप चाय पीएगें? तो उन्होंने कहा कि, " यदि मेरे कुत्ते को दूध पिलाओगे, तो मैं चाय पीऊँगा"। मैंने सोचा की अजीब फ़कीर हैं। खैर मैंने दूध और चाय की पर्ची कटाई और लाइन में लग गया, वह फ़कीर मेरे पास आया चाय और दूध ले गायब हो गया।

 

किन्तु मेरे दिमाग में खियाल भी नहीं आया कि यह साई बाबा होंगे, जब मैं रेलगाड़ी से वापस चण्ड़ीगढ आ रहा था, सोते हुए बाबा मेरे सपने में आए और बोले " मुझे पहचाना नहीं क्या? मेरे साथ भगवान विष्णु भी बैठे थे। " मेरे दिमाग में एकदम से वही दृश्य दोबारा आ गया, साई बाबा के साथ एक व्यक्ति पीठ किये बैठा था, वो भगवान विष्णु थे। मुझे अति प्रसन्नता हुई उस घटना के बाद मेरी जिन्दगी में बहुत से प्रत्यक्ष अनुभव हुए।

 

एक दिन मैंने श्री साई सच्चरित्र हाथ में लिया और साई बाबा से कहा कि भगवान को जानने के लिए, अध्यात्म में आगे बढ़ने के लिए मैं क्या करुँ? जैसे ही मैंने ग्रंथ खोला तो एक पंक्ति मेरे सामने आ गई, जिसमें वर्णित था कि, " अध्यात्म में आगे बढ़ने के लिए ध्यान नितांत आवश्यक है " लेकिन मैं ध्यान के बारे में कुछ भी नहीं जानता था। मैंने साई से प्राथना की कि मुझे ध्यान के लिए सगंत और ज्ञान दीजिए और ऐसा ही हुआ। मैं अपनी मर्जी से खुद ही ध्यान करने लगा, अभी दो दिन ही हुए थे कि मैं सड़क पर खड़ा था कि एक आदमी ने मुझे एक पैम्फलेट दिया और कहा कि इसे पढ़िए। आपके पास वक्त हो तो मेरे घर आइए, मैं ध्यान सिखाता हूँ। मुझे यह सब देख बहुत खुशी हुई। जिस व्यक्ति द्वारा मुझे ध्यान के बारे में पता चला उनका नाम रामराजू है।

 

ध्यान करते अभी सात दिन हुए थे, मैं दोपहर को ध्यन कर रहा था। गर्मी बहुत ज्यादा थी मैं फर्श पर ही लेट गया। मेरी आँखें बंद थी, फिर भी मैंने जबरदस्त प्रकाश देखा और ऊपर की ओर से सितारों की तरह मेरे सिर में कुछ बहा चला आ रहा है, वो सुन्दर एहसास शब्दों में लिखना नामुमकिन है। फिर मैंने अपने आप को जमीन पर सोए हुए देखा, मैं चकित हो दोबारा अपने शरीर में प्रवेश कर गया। मैं जल्दी से ध्यान से उठ बैठा, मैं हैरान था मेरी जिन्दगी बिल्कुल बदल गयी। अब मैं एक दिन में घण्टों ध्यान करने लगा। मुझे ध्यान में बहुत से अनुभव होने लगे, जोकि मैं सभी को नहीं बताता कि, कोई विश्‍वास नहीं करेगा इस लिए केवल रामराजू को ही बताता था। मेरी शारीरिक बीमारियाँ तो बिल्कुल ठीक हो गईं।

 

25 दिसम्बर 2008 को वह सौभाग्यशाली दिन आया जब मुझे " अंहिसा शांति ध्यान महायज्ञ " बैंगलोर जाने का और ब्रह्मर्षि पत्रीजी से मिलने का अवसर मिला। वहाँ कुछ ऐसे व्यक्तियों से मिला जिन्हें मैंने सिर्फ डिस्कवरी चैनल पर ही देखा था जैसे कि एलैक्स ओरबिटो जो बिना किसी औज़ार के हाथों से ही आप्रेशन कर देते और हाथों से ही उस आप्रेशन की जगह को बंद कर देते। बहुत से ऐसे ही महान व्यक्तियों से मिला, यह समझ में आया कि, सभी एक साथ, एक जगह, एक समय केवल ब्रह्मर्षि पत्रीजी के बुलाने पर इक्कट्‌ठे हुए और लोगों को ज्ञान और सज्जनसांगत्य का सुअवसर दिया। हैरानी इस बात की थी कि, यह सभी महान आत्माएँ पत्रीजी के बुलाने पर दुनिया के कोने-कोने से यहाँ तक चली आईं है तो, ब्रह्मर्षि पत्रीजी खुद कितने महान होंगे। सौभाग्यवश मुझे और कीर्ती पटेल को पत्रीजी के बहुत करीब रहने का अवसर मिला।

 

ध्यान महायज्ञनम में मेरे साथ दो व्यक्ति जो कि मेरे मित्र बन चुके थे, जम्मू व काश्मीर से आए थे। उन दोनों को ब्रह्मर्षि पत्रीजी ने मंच पर निमंत्रण दिया और ध्यान के बारे में अपने अनुभवों को बताने को कहा और उनके अनुभव सुनने के बाद पत्रीजी ने उन्हें पिरामिड और शाल से सम्मानित किया। राजेंद्र कौल जो कि जम्मू से थे, उन्होंने मेरा परिचय ब्रह्मर्षि पत्रीजी से करवाया और मेरे लिए आग्रह किया कि विनय को मंच पर आने का अवसर दें। पत्रीजी ने कहा ठीक है। मेरा मन भी था कि, मैं ध्यान के बारे में कुछ अवश्य बताऊँ, लेकिन छः दिनों तक कोई अवसर नहीं मिला। आखरी दिन में पत्रीजी के साथ पिरामिड वैली गया वहाँ दिल्ली प्रज्ञा चैनल से रिपोर्टर आए हुए थे। उन्होंने पत्रीजी का साक्षात्कार लिया, साक्षात्कार के बाद उन्होंने मेरी तरफ ईशारा करते हुए कहा यह स्वामीजी चण्डिगढ़ से आए है आप इनका साक्षात्कार ले सकते है। मैं एकदम हैरान हो गया, मुझे लगा कि पत्रीजी ने मुझे मंच पर नहीं बुलाया किन्तु मेरे मन की बात जान मुझे सीधा चैनल पर ही दिखा दिया| ये बात साबित हो गई कि वो अन्तर्यामी है।

 

मेरे दिमाग में साई बाबा की जीवनी से सम्बन्धित बहुत सी बातें थी जो मेरे दिल को छू गई थी। वैसे ही प्रत्यक्ष अनुभव मेरे पत्रीजी के साथ हुए। जो भी मेरे मन में विचार आता पत्रीजी तुरन्त उसका उत्तर किसी न किसी बहाने मुझे दे देते, जो भी सवाल मेरे मन में उठता उसका निदान तुरन्त कर देते, यह अति आश्‍चर्यजनक अनुभव थे। पत्रीजि ने कुछ व्यक्तियों से मेरा परिचय करवाया और आपस में वार्तालाप करने को कहा, जो कि अति शिक्षाप्रद सिध्द हुआ। पत्रीजी ने पिरामिड वैली में एक लड़की से मिलवाया और कहा इनसे मिलिए ये है " लोबसांग राम्पा। "

 

मैं और कीर्ती पटेल चकित हो गए कि, लोबसांग राम्पा ने तो किताब " You Forever " लिखी थी और वह उच्च आत्मा थे, और ब्रह्मर्षि पत्रीजी उनकी किताब पढ़कर ही Enlightened हुए, तो ये लड़की लोबसांग राम्पा कैसे हो सकती है? लेकिन उस लड़की को मिलने के बाद पता चला कि, लोबसांग राम्पा ने दोबारा जन्म लिया है। इस जन्म में उनका नाम अश्‍विनी है। कुछ समय उनके साथ बिताने पर उनकी आत्मिक महानता का अनुभव हुआ।

 

बैंगलोर में मेरा आखिरी दिन था, मैं पत्रीजी से विदा माँगने गया। पत्रीजी ने मुझे बिठाकर कुछ बातें की, ध्यान को सर्वजगत में बॉटने के लिए कहा और मुझे मेरी जिम्मेदारी का एहसास करवाया। जाते हुए अश्‍विनी से मेरा ख्याल रखने के लिए कहा।

 

अब मैंने बैंगलोर से अकेले शिरडी साई बाबा के मंदिर जाना था, और इसके बारे में मैं पत्रीजी को बता चुका था। रात की ट्रेन थी और मैं होटल के कमरे में लेटा हुआ था, एकदम पत्रीजी ध्यान में दोबारा आए और कहा कि, मैं लोगों को आगे ले जाना चाहता हूँ, किन्तु लोग आगे नहीं जाते। और दूसरा अनुभव यह हुआ कि, मेरे शरीर के अन्दर कोई जबरदस्त शक्ति आ गई, मुझे करीबन 15 मिनट तक शक्ति का एहसास हुआ। लेकिन मैं अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर पा रहा था, मेरे दोनों हाथों की अंगुलियाँ फँसी हुई थीं, आँखें बन्द थीं और शरीर में शक्ति का प्रवाह हो रहा था। 15 मिनट बाद मैं उठा और जल्दी से अश्‍विनी को फोन किया, अपना अनुभव सुनाया और इसका मतलब पूछा। अश्‍विनी ने कहा पत्रीजी आपको ऐसा इसलिए कहकर गए है, क्यों कि आप ने ध्यान में यह सीखा है कि परमात्मा कहीं बाहर नहीं अपने ही अन्दर है, ध्यान से उसे जानना है, और आप मूर्ती में भगवान को ढूँढने शिरडी जा रहे हैं। दूसरी बात आपके शारीरिक अनुभव के बारे में, तो मैं अभी आपसे मिलने आई थी और आप में 15 मिनट के लिए Walk in थी। ये दोनों ही मेरे लिए आश्‍चर्यजनक अनुभव थे।

 

मेरा शिरडी के लिए ट्रेन का आरक्षण था। मैं शिरडी गया| वहाँ एक दिन रहकर ध्यान किया। शिरडी से जब मैं ट्रेन में वापिस आ रहा था, तो मैंने पत्रीजी और साई बाबा को ट्रेन में बैठे हुए और मेरे बारे में कुछ बात करते हुए देखा। उस दिन से पत्रीजी हर रात को मेरे ध्यान में आते हैं, रोज नया अनुभव होता है। कभी कभार ही ऐसा होता है कि पत्रीजी न आए, यह मेरे लिए एक सुखद एहसास है। ध्यान से जीवन में आए अनुभवों को मैंने बताया हैं किन्तु ध्यान की शुरूआत के लिए, योग्य पथ प्रदर्शक की आवश्यकता अवश्य महसूस होती है, यदि पूर्ण पथ प्रदर्शक आपको मिल जाएँ तो आपको सही दिशा, व जीवन का लक्ष्य मिल जाता है। पत्रीजी द्वारा दी गई सही दिशा, सही ध्यान विधि को जैसे मैंने जाना और अनुभव किया, मैं चाहता हूँ कि आप सभी पाठक, उस ज्ञान को सभी में प्रसारित करें। जैसे कि ब्रह्मर्षि पत्रीजी ने 2012 तक का ध्यान जगत का लक्ष्य रखा, वह पत्रीजी का ही नहीं हम सब की यह जिम्मेदारी बनती है कि, दुनिया का जितना कोना हमने घेर रखा है, हम उस कोने को ध्यान और ज्ञान द्वारा खुशनुमा बनाएँ, और जहाँ तक हो सके हर-एक व्यक्ति को ध्यान में लाएँ।

 

ध्यान शब्द का अर्थ बिमारियों से निजात ही नहीं, मन की शान्ति और बुध्दि की कुशलता ही नहीं, बल्कि अपने आप को सही में जानना है। अपने आप को जानेंगे तो ब्रह्माण्ड को जानेंगे जैसे किरण को जानेंगे तो सूर्य का पता चलेगा। आत्मा को जानेंगे तो परमात्मा का पता चलेगा, जीवन में आने का मतलब सही अर्थों में पता चलेगा। दीए से दीया जलता है तो अन्धेरा दूर हो जाता है, आप मशाल बन जाए और अपने साथ सभी को प्रज्जवलित करें, बस यही मेरा, यही आपका लक्ष्य हो।

 

विनय कुमार
चण्डीगढ़
संपर्क : +91 9878776177

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