" स्वयं पर भरोसा, हमारा संदेश है "

 

सिर्फ एक सत्य " ध्यान "
सत्य हमारी आन्तरिक तृप्ति है

 

मेरा नाम विपुल अगरवाल है। मैं 26 साल का हूँ और लुधियाना का रहने वाला हूँ, आजकल मैं दुबई में रह रहा हूँ। मैंने बचपन से ही काफी मुश्किलों का सामना किया है। 2003 में जब मैं लुधियाना आया था, तब मेरी जिन्दगी का कोइ लक्ष्य नहीं था। बहुत से काम कियें कोई भी रास्ता दिखाई नहीं देता था। लेकिन एक विश्‍वास था, प्रभु पर। कहते है कि जब तक आपको कोई सही रास्ता न मिलें तो आप अपनी मंजिल पर नहीं पहुँच सकते। कोई भी काम करता उसमें असफलता ही मिलती। जिससे मेरा आत्मविश्‍वास डगमगाने लगा। प्रभु पर भी विश्‍वास कम होने लगा।

 

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जितनी देर तक मेरी अन्तरात्मा आवाज न दें तो मैं कोई मंदिर, गुरुद्वारा, सत्संग में नहीं जाता था। एक दिन मेरे मामाजी (राजकुमार गुप्ता) ने मुझे ध्यान के बारे में बताया और उसे करने को कहा। मुझे सुनने में बहुत अच्छा लगा लेकिन मैंने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। फिर उन्होंने अपने पास बिठाकर मुझे पन्द्रह मिन्ट ध्यान करने को कहा। मैंने उनका मान रखने के लिए पन्द्रह मिन्ट ध्यान किया। पहली बार ध्यान करना मेरे को बहुत मुश्किल लगा पर जब मैं ध्यान कर उठा तो मैंने अपने शरीर में कुछ अच्छा सा महसूस किया।

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तब मैं इस बात को समझ नहीं पाया। मैंने हर रोज ध्यान करना शुरु कर दिया जैसे-जैसे मैं ध्यान करता गया वैसे ही मैं ध्यान में ही डूब गया और मेरी जिन्दगी ने एक नया मोड़ ले लिया। मेरे को ऐसा महसूस होने लगा कि मेरे में से Negative energy का अन्धेरा दूर होता जा रहा है और Positive energy की रोशनी मेरे में आ रही है। जो काम मैं करने से डरता था या कोई भी निर्णय नहीं ले सकता था। वो मेरे लिए सब आसान हो गये और Self confidence इतना बढ़ गया कि मैं जो भी सोच के करूंगा वो हो कर ही रहेंगा। मैंने ध्यान ज्यादा से ज्यादा करना शुरु कर दिया।

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मुझे अपने में बहुत सा बदलाव महसूस होने लगा जो आदमी गलत भी होता मुझे उसमें भी अच्छाई ही नज़र आती। मैं खुद हैरान था कि ध्यान में इतनी शक्ति है। जैसे कहावत है कि भगवान को करते है अच्छे के लिए करते है यह बात मेरे लिए भगवान बन कर मेरी जिन्दगी में आयें और जिन्होंने मुझे ध्यान का सही रास्ता दिखाया। फिर मेरे को ध्यान में अच्छे-अच्छे अनुभव होने लगें एक दिन सांई-बाबाजी हंसते-हंसते मेरे को आशीर्वाद देकर गये। एक दिन हनुमान जी बादलों पर चल रहे थे और मुझे अपनी शक्ति दे रहे थे।

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ध्यान में बैंगलोर के पिरामिड में बैठे कर मैंने ध्यान किया। लेकिन मैं अभी वहाँ पर गया नहीं हूँ। मुझे अपने सब प्रश्‍नों के उत्तर अपने अन्दर से ही मिलने लगे। ऐसे बहुत से अनुभव है जिन वर्णण करना नामुम्किन है। फिर एक दिन मुझे ब्रह्मर्षि पत्रीजी से मिलने का सुनहरी मौका मिला। जब मैं उनसे पहली बार मिला तो मेरे को उनसे मिल कर बहुत अपनापन लगा ऐसा लगा कि जैसे मैं इनको पहले से ही जानता हूँ। मिलते ही उन्होंने मुझसे कहा कि हम दुबई में क्लासें करना चाहते हैं !

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उनकी बात को सुन कर मैं तो एक दम चुप हो गया कि हम दुबई में क्लासें कैसे करवा सकते है दूसरे क्षण ही अन्दर से आवाज आई कि हम क्या नहीं कर सकतें। हम जरुर करेंगे और क्लासें भी बहुत अच्छी-अच्छी होगी, ऊर्जा पत्री सर की थी, करवाई हमसें क्योंकि उन्होंने हमें भी बहुत सारी energy दे दी थी।

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दुबई जाने के बाद पत्री सर का फोन आया कि हमने चार दिसम्बर को दुबई आने का प्रोग्राम बनाया है। हमने वहाँ पर चार दिसम्बर से नौ दिसम्बर तक चौदह क्लासें की, सारी क्लास में सौ से ऊपर लोग थे ! और वहाँ के लोगों को इतना अच्छा लगा कि बताना भी कठिन है। लोगों को बहुत से अलग अनुभव भी हुये।

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एक ध्यान अनुभव आप को बताता हूँ कि एक आदमी मेरे से बहुत नाराज था मैं उसको खोना भी नहीं चाहता था और अपनी बात उससे मनवाना चाहता था। मैंने ध्यान किया और ध्यान करने के बाद उसको मिलने के लिए गया। वहाँ जाकर उसको मिलकर मैं खुद हैरान हो गया कि वो पहले से बिल्कुल बदला हुआ था और मेरे को उल्टा कहता कि आप जैसे कहते है वैसे ही ठीक है, इतने प्यार से बात की पहले ऐसे कभी नहीं की मेरा ध्यान में विश्‍वास और भी बढ़ गया।

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मैंने तो ध्यान में बहुत कुछ पाया, जैसे मेरी तो जिन्दगी ही बदल गई हो। मैंने जाना कि ध्यान करने से परमात्मा की आत्मा से हर आवाज सुनाई देती है। जो वो हमें बताना चाहता है वो केवल ध्यान में ही सुनाई देती है मेरा तो सब लोगों को यही सन्देश है कि ज्यादा से ज्यादा ध्यान करों और अपने आप को पहचानों। अपने आप की पहचान ही अपना लक्ष्य बनाना चाहिए।

 

विपुल अगरवाल
लुधियाना

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