" ध्यान मेरा मार्गदर्शक "

 

 

मेरा नाम कांता दुग्गड़ है।


मैं कटक, उड़ीसा में रहती हूँ।


मैं पाँच वर्षॊं से ध्यान कर रही हूँ।

 


आज मैं बहुत...बहुत खुश हूँ। अपने अंतर्मन में गहरा सुकून महसूस कर रही हूँ। मेरा मन-मयूर झूम-झूम कर नाच रहा है, प्रसन्न्ता, प्रफुल्लता और आनन्द की अनुभूति से ‘मैं’ सिर से पाँव तक सराबॊर हुए जा रही हूँ। चारॊं ओर बस आनन्द ही आनन्द बरस रहा है।

 

सुबह जब मैं पिरमिड ध्यान करके लौट रही थी तो कुछ दूर पैदल चलना पड़ा। बारिश की हल्की-हल्की बूँदें जब मेरे बदन पर गिर रही थी। उस अनुभूति हुई जैसे प्रकृति को देखने का मेरा दृष्टकॊण ही बदलता जा रहा है, प्रकृति को देखने का सौंदर्य को मैं अपलक निहार रही थी और ईश्वर से कह रही थी- " हे ईश्वर! तेरी भि क्या लीला है। कितनी सुन्दर व अद्‌भूत सृष्टि की रचना की है तुमने। तेरे सिवा इतनी अद्‌भूत सृष्टि की रचना करने का सामर्थ्य और किसमें है? तनिक गहराई से सोचा तो पाया, यह सृष्टि तो हमेशा से ही ऎसी ही थी पर इसे नये तरह से निहारने की दृष्टि मुझे किसने दी... गुरुवार तुम ने ही तो।

 

मै क्या थी? एक सहमी, डरी-डरी सी, निराशा से भरी, अबला नारी। मुझे ध्यान मिला, ज्ञान मिला और मैं निरन्तर आगे बढ़ती गयी। रास्ते में काफी मुशिकलें आयीं, संधर्ब भी सहने पड़े। कभी घबराई, कभी कुछ-कुछ डगमगायी पर साहस के साथ फिर से उठ खड़ी हुई और उसके बाद गिरी कभी नहीं क्यॊंकि दो हाथ जो हमेशा मुझे सम्भाले रहे। वे दो वरद हस्त मेरे सिर पर बने रहे, मुझे उत्साहित करते रहे। ऎसे उस परम मित्र को मेरा शत वन्दन।

 

लगभग पाँच वर्षॊं से मैं ध्यान कर रही हूँ। जब भी कॊई मुश्किल आई, तुम हर मुश्किल का समाधान बने। जब भी कॊई विपरित परिस्थिति आई उस पर विजय पाना सिखाया तुमने। ऎसे उस सम्बलदाता को कॊटि कॊटि साधुवाद।

 

स्वयं को प्यार करना सिखाया तुमने। अपने आपको निहारते हुए आनन्दित होना सिखाया तुम्हीं ने। प्यार बाँटना सिखाया तुम्हीं। अपनी भूलों को देखा पाने की दृष्टि दी तुम्हीं ने और औरॊं के गुणॊं को देखकर तारिफ करना भी सिखाया तुम्हीं ने।

 

पहले, तुम मुझे मुशिकलॊं को हल करने का रास्ता बताते थे पर अब मैं स्व्यं इस यॊग्य हो गयी हूँ कि मुशिकलॊं का हल निकाल सकती हूँ। इसीलिए कहती हूँ अपने पैरॊं पर खड़ा हॊना सिखाया तुम्हीं ने हर क्षण अप्रमत्त रहना सिखाया तुम्हीं ने, सदा युवा बने रहने का गुण भी सिखाया तुम्हीं ने।

 

अपने आप से मिलना सिखाया तुम्ही ने, खुद से बातें करना सिखाया तुम्हीं ने, विनम्रता का पाठ पढ़या तुम्हीं ने, शत्रु को मित्र बनाना सिखाया तुम्हीं ने, औरों को आगे बढ़ाने का महत्व बतलाया तुम्हीं ने।

 

तुम्हीं मेरे प्रभु, तुम्हीं गुरु, तुम्हीं मेरे मार्गदर्शक और स्व्यं मैं भी तुम ही हूँ। इसीलिए कहती हूँ मुझमें तुम हो, तुम में मैं हूँ। तुम और में दो नहीं सभी एक है सब एक है।

 

कांता दुग्गड़

कटक

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